टाटा स्टील ने वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में अपना समेकित शुद्ध लाभ पिछले साल के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा कर लिया। नतीजों के बाद एक वीडियो इंटरव्यू में टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी टीवी नरेंद्रन और कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य वित्तीय अधिकारी कौशिक चटर्जी ने ईशिता आयान दत्त के साथ कई मुद्दों पर चर्चा की। उनके साथ पहली तिमाही के आउटलुक से लेकर, पश्चिम एशिया जंग का लागत पर असर और नीदरलैंड्स में उनके परिचालन पर पर्यावरण और नियामक की चुनौतियों पर भी बातचीत हुई। पेश हैं मुख्य अंश:
टाटा स्टील का चौथी तिमाही का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर दोगुना से भी ज्यादा हो गया है और अलग-अलग इलाकों में इस्पात कीमतें अब ऊपर की ओर जा रही हैं। पहली तिमाही के लिए आपका क्या नजरिया है?
नरेंद्रन: हमारा अनुमान है कि भारत में कीमतें तिमाही आधार पर लगभग 6,000 रुपये प्रति टन बेहतर रहेंगी। ब्रिटेन और नीदरलैंड में कीमतें क्रमशः लगभग 80 पाउंड और 80 यूरो ज्यादा होंगी। लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि लागत बढ़ रही है। इसलिए कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी का फायदा मुनाफे में नहीं दिखेगा। कुल मिलाकर, पहली तिमाही चौथी से बेहतर रह सकती है। लेकिन कीमतों से एबिटा तक का सफर पूरी तरह से आसान नहीं होगा।
पश्चिम एशिया संघर्ष से पैदा हुई महंगाई का अल्पावधि में क्या असर है?
नरेंद्रन: इसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ा है। उदाहरण के लिए, हम पश्चिम एशिया से चूना पत्थर खरीदते थे। लेकिन अब हम इसे कहीं और से मंगा रहे हैं। इससे लागत बढ़ गई है। माल ढुलाई की दरें और बीमा लागत भी बढ़ गई है। इसके अलावा, हम अपनी डाउनस्ट्रीम सुविधाओं में काफी मात्रा में प्रोपेन का इस्तेमाल करते हैं, और प्रोपेन की कीमतें बढ़ गई हैं। मोटे तौर पर, वेरिएबल लागत में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।
ब्रिटेन में इस्पात कीमतें बढ़ रही हैं। क्या अब आपको स्थिति में सुधार की बेहतर संभावना दिख रही है?
नरेंद्रन: सालाना आधार पर प्रदर्शन में सुधार हुआ है। लेकिन यह अभी भी (एबिटा के संदर्भ में) नकारात्मक है। इसकी मुख्य वजह यह है कि, भले ही हमने सभी खर्चों में कटौती कर दी थी, लेकिन कीमतें बहुत अच्छी नहीं थीं। लेकिन अब हालात बेहतर हैं। उम्मीद है कि पहली तिमाही चौथी से बेहतर होगी और दूसरी तिमाही पहली से भी बेहतर रहेगी। इसलिए तीसरी तिमाही निश्चित रूप से एबिटा के लिहाज से सकारात्मक होगी।
चटर्जी: लागत कम करने की पहल अभी भी जारी है। लेकिन बाहरी लागत भी बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए गैस की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। लेकिन मौजूदा सुधार प्रक्रिया, नीतिगत बदलावों और अब कीमतों के यूरोपीय स्तरों के बराबर या उनसे थोड़ा ऊपर होने के कारण कुल मिलाकर स्थिति संभालने लायक होनी चाहिए। हमें नीदरलैंड से आने वाले उस सबस्ट्रेट के लिए अमेरिका से कुछ छूट भी मिली है, जिसे अमेरिका को निर्यात करने के लिए ब्रिटेन में प्रोसेस किया जाता है।
इजमुइडेन को कोक और गैस संयंत्रों को लेकर पर्यावरण जांच का सामना करना पड़ रहा है। क्या इससे आपकी निवेश योजनाओं के लिए कोई जोखिम है?
नरेंद्रन: हम यह सुनिश्चित करने के लिए चर्चा कर रहे हैं कि अगले कुछ वर्षों में उन सीजीपी को नियंत्रित और नियोजित तरीके से बंद किया जा सके। हमने नियामक और सरकार को बताया है कि तकनीकी चुनौतियों को देखते हुए, हम यह काम 2028 और 2029 तक आसानी से कर सकते हैं।
चटर्जी: बदलाव के इस दौर में एक ब्लास्ट फर्नेस भी शामिल है। दूसरी ब्लास्ट फर्नेस इस बदलाव के बाद भी चालू रहने वाली है। इसलिए हमें भविष्य के नियमों के बारे में ज्यादा स्पष्टता चाहिए। दूसरी ब्लास्ट फर्नेस से अगले दस साल तक (जब तक बदलाव पूरा नहीं हो जाता) काम करते रहने की उम्मीद है। अब, अगर सीजीपी को पहले बंद करना पड़ा, तो इसका असर पड़ेगा। इसलिए हमें भविष्य के नियमों पर स्पष्टता चाहिए , कोई भी अंतिम निवेश फैसला लेने से पहले यह निश्चितता जरूरी है।
तो क्या आप मुनाफे को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं?
नरेंद्रन: वृद्धि अपने आप में कोई अंतिम मंजिल नहीं है, यह जरूरी है, लेकिन यह फायदेमंद और टिकाऊ होनी चाहिए। इसलिए, हम लगातार इस पर ध्यान देंगे कि हमें सबसे अच्छी, सबसे सही, फायदेमंद और टिकाऊ ग्रोथ कहां से मिल रही है।