अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसने जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) को खरीदने के लिए जो नया और सुधारा हुआ ऑफर दिया था, वह बेहतर होने के बावजूद खारिज कर दिया गया। कंपनी का कहना है कि उसका प्रस्ताव अदाणी ग्रुप से कुल वैल्यू में करीब 3,400 करोड़ रुपये ज्यादा और नेट प्रेजेंट वैल्यू में लगभग 500 करोड़ रुपये अधिक था।
वेदांता ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। कंपनी का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ियां हुईं और रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं।
अक्टूबर 2025 में वेदांता ने अपना रिजॉल्यूशन प्लान पेश किया था। इसमें प्रस्ताव था कि सुरक्षित कर्जदाताओं को तुरंत 3,770 करोड़ रुपये दिए जाएं और 365 दिन बाद 3,100 करोड़ रुपये और चुकाए जाएं। साथ ही, जेपी में 400 करोड़ रुपये का इक्विटी निवेश भी शामिल था।
इसके बाद 8 नवंबर 2025 को कंपनी ने ईमेल के जरिए एक एडेंडम भेजा। इसमें अपफ्रंट कैश बढ़ाकर 6,563 करोड़ रुपये कर दिया गया और इक्विटी निवेश को दोगुना करके 800 करोड़ रुपये कर दिया गया। हालांकि, कुल बिड वैल्यू 12,505.85 करोड़ रुपये ही रखी गई।
कंपनी का कहना है कि ये बदलाव कर्जदाताओं के लिए ज्यादा फायदे वाले थे, लेकिन इसके बावजूद कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।
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CoC ने आखिरकार अदाणी ग्रुप के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। अदाणी का ऑफर करीब 6,000 करोड़ रुपये तुरंत देने और बाकी रकम दो साल के भीतर चुकाने का था। वहीं, वेदांता ने भुगतान के लिए करीब पांच साल तक का समय मांगा था।
लेंडर्स का मानना था कि जल्दी भुगतान और कम समय ज्यादा अहम है। IBC के तहत भी पहले कंपनी का समाधान (resolution) जरूरी माना जाता है, भले ही रिकवरी थोड़ी कम क्यों न हो।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सिर्फ सबसे बड़ी बोली ही देखनी होती, तो वोटिंग की जरूरत ही नहीं पड़ती। असल में इस प्रक्रिया में कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। एम एस साहू, जो पहले इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्टसी बोर्ड ऑफ इंडिया के प्रमुख रह चुके हैं, के मुताबिक IBC का मकसद पहले कंपनी को बचाना होता है और रिकवरी बाद में आती है।
रविवार को अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि वेदांता को JAL को खरीदने के लिए सार्वजनिक तौर पर सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया था। उन्होंने कहा, “प्रक्रिया पारदर्शी थी। हमें लिखित में बताया गया कि हम जीत गए। लेकिन चीजें इतनी आसान नहीं होतीं, कुछ दिनों बाद फैसला बदल दिया गया।”
अग्रवाल ने अपने पोस्ट में 5 सितंबर 2025 की एक मीडिया रिपोर्ट भी शेयर की, जिसमें लेनदारों की मीटिंग का जिक्र था।
वेदांता का कहना है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने लेंडर्स की “कमर्शियल विजडम” को बिना ठीक से जांचे स्वीकार कर लिया। कंपनी का तर्क है कि अगर कोई फैसला मनमाना, अनुचित या लापरवाही भरा हो, तो उसे चुनौती दी जा सकती है।