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पश्चिम ए​​शिया संकट से छोटी-मझोली दवा कंपनियों के मुनाफे पर दबाव, लागत और सप्लाई बाधाओं से बढ़ी चिंता 

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एपीआई के अलावा दवा बनाने में उपयोग होने वाले अन्य प्रमुख कच्चा माल जैसे मेथनॉल, प्रोपलीन और अमोनिया की अपूर्ति में भी बाधा आ रही है

Last Updated- May 28, 2026 | 10:50 PM IST
Pharma

पश्चिम एशिया में संघर्ष को तीन महीने पूरे हो रहे हैं और इसके कारण आपूर्ति श्रृंखला में लंबे समय से चली आ रही बाधा भारतीय दवा विनिर्माताओं, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की लाभप्रदता पर 3 से 5 फीसदी और कार्यशील पूंजी पर 12 से 15 फीसदी का असर पड़ने की आशंका है।

ट्रेजिक्स के मुख्य कार्या​धिकारी और सह-संस्थापक हरेश कलकत्तावाला ने कहा, ‘उद्योग विश्लेषण के अनुसार कार्यशील पूंजी पर लगभग 12 से 15 फीसदी का प्रभाव पड़ा है, जिससे निवेश पर ​रिटर्न स्वतः गिर गया है। प्रभावी रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों को अपने व्यवसाय के स्तर को बनाए रखने के लिए पहले की तुलना में परिचालन में 12 से 15 फीसदी अधिक पूंजी लगाने की जरूरत पड़ सकती है।’

उन्होंने आगे कहा कि छोटी कंपनियों के लिए निवेश पर ​रिटर्न 5 से 5.5 फीसदी तक घट सकता है जिसके परिणामस्वरूप लाभप्रदता में 3 से 5 फीसदी की कमी आ सकती है। इन व्यवधानों से फार्मा कंपनियों पर पहले से मौजूद दबाव और बढ़ रहा है, जिसमें महंगे पेट्रोरसायन आधारित कच्चे माल, बढ़े हुए माल ढुलाई और युद्ध-जोखिम बीमा शुल्क और शिपिंग में लगने वाला लंबा समय शामिल है।

हिमाचल प्रदेश की एक एमएसएमई दवा फर्म के एक कार्या​धिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘ऊर्जा की लागत में भी काफी वृद्धि हुई है जिससे सॉल्वेंट, इंटरमीडिएट और अन्य महत्त्वपूर्ण फार्मा सामग्री महंगी हो गई है।’ उन्होंने कहा कि सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री (एपीआई), सॉल्वेंट और पैकेजिंग सामग्री की कीमतें कुछ मामलों में 200 फीसदी तक बढ़ गई हैं, जिसके चलते हिमाचल प्रदेश ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण से हस्तक्षेप करने की मांग की है।’

फार्मा से जुड़े एक अन्य कार्या​धिकारी ने बताया कि एपीआई आपूर्तिकर्ता मुंबई की बीएएसएफ इंडिया ने हाल ही में कुछ एक्सिपीएंट और कुछ एपीआई के दाम 20 फीसदी तक बढ़ाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा, ‘ईंधन की लागत में 20 से 30 फीसदी की वृद्धि के साथ प्रभावित मार्गों पर माल ढुलाई दरों में वृद्धि ने निर्यात-उन्मुख एमएसएमई दवा फर्मों की मु​श्किलें बढ़ा दी हैं।’ पिछले तीन महीनों में पश्चिम एशिया जाने वाले कुछ कंटेनर पर माल ढुलाई दर कई गुना बढ़ गई है, जिसका कारण नए मार्ग से मालवहन, उच्च युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम और शिपिंग से जुड़ी बाधाएं हैं।

एपीआई के अलावा दवा बनाने में उपयोग होने वाले अन्य प्रमुख कच्चा माल जैसे मेथनॉल, प्रोपलीन और अमोनिया की अपूर्ति में भी बाधा आ रही है।

औषधि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘मेथनॉल बड़ी समस्या नहीं है क्योंकि हमें हाल ही में पश्चिम एशिया से 2 से 3 शिपमेंट मिले हैं।’ हालांकि उन्होंने कहा कि भारतीय दवा विनिर्माताओं को प्रति माह लगभग 15,000 टन मेथनाल की आवश्यकता होती है।

क्रिसिल ने कहा कि कच्चे तेल और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर क्षेत्र पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न होने वाले व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं। दवा उद्योग उच्च माल ढुलाई और लॉजिस्टिक लागत, पेट्रोरसायन आधारित कच्चे माल और सॉल्वेंट की बढ़ती कीमतों तथा शिपिंग व्यवधानों और ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों के कारण दबाव महसूस कर रहा है। क्रिसिल ने कहा कि फार्मा निर्यातकों को रुपये में गिरावट से आंशिक रूप से लाभ हो सकता है।

हालांकि बड़ी चिंता अन्य कच्चे माल की आपूर्ति से जुड़ा है। उदाहरण के लिए अपर्याप्त प्रोपलीन आपूर्ति इबुप्रोफेन के उत्पादन को पूरी तरह से रोक सकती है, जिससे बड़े पैमाने पर दर्द और बुखार की दवाओं पर असर पड़ेगा। अ​धिकारी ने कहा, ‘हमने यह सुनिश्चित करने का काम किया है कि प्रोपलीन की पर्याप्त आपूर्ति हो।’

औष​धि विभाग ने दवा विनिर्माताओं के लिए अमोनिया की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय तथा उर्वरक विभाग से भी समर्थन मांगा है। दवा विनिर्माताओं को हर महीने लगभग 12,000 टन अमोनिया की आवश्यकता होती है।

कलकत्तावाला ने कहा, ‘खाड़ी और पश्चिम एशियाई क्षेत्र इन कच्चे माल का  प्रमुख आपूर्तिकर्ता है इसलिए लंबे समय तक भू-राजनीतिक व्यवधान भारतीय दवा विनिर्माताओं की लागत और आपूर्ति में अनिश्चितता को बढ़ा सकती है।’

इससे आवश्यक दवाओं के बनाने की लागत में वृद्धि हो सकती है और कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ सकता है, विशेष रूप से छोटे फार्मा निर्यातकों के लिए। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि बड़ी चिंता तत्काल राष्ट्रव्यापी दवा की कमी नहीं है बल्कि छोटे दवा विनिर्माताओं के लिए स्थिर मूल्य निर्धारण और निर्बाध आपूर्ति प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने में बढ़ती कठिनाई है।

अधिकारी ने कहा कि बड़ी कंपनियों ने पिछले साल दिसंबर में सरकार द्वारा न्यूनतम आयात मूल्य की शुरुआत के समय सस्ती आयात, विशेष रूप से बीटा-लैक्टम का, पहले से स्टॉक कर लिया था।

कलकत्तावाला ने कहा कि बड़ी दवा कंपनियों के पास वर्तमान में आपूर्ति श्रृंखला में एपीआई का लगभग 2 से 3 महीने का स्टॉक और फॉर्मूलेशन का 4 से 5 महीने का स्टॉक उपलब्ध हो सकता है। हालांकि उन्होंने कहा, ‘एमएसएमई फर्में कार्यशील पूंजी की बाधाओं और सीमित भंडारण क्षमता के कारण आम तौर पर 3 से 6 सप्ताह के स्टॉक के साथ काम करती हैं।’

छोटे फर्मों में बड़ी कंपनियों की तुलना में उत्पादों के दाम बढ़ाने की कम क्षमता, कम इन्वेंट्री और नकदी प्रवाह तंग होने के कारण स्टॉक पर दबाव और बढ़ने की आशंका है।

कलकत्तावाला ने कहा, ‘फिलहाल कमी जैसी स्थिति नहीं है लेकिन पश्चिम एशिया में लंबे समय तक व्यवधान धीरे-धीरे इन्वेंट्री कम कर सकता है।’

हरियाणा की एक फार्मा एमएसएमई ने कहा कि एमोक्सिसिलिन, एजिथ्रोमाइसिन और रिफैम्पिसिन जैसे एंटीबायोटिक्स एसीटोन और मेथिलीन डाइक्लोराइड जैसे सॉल्वेंट पर अपनी निर्भरता के कारण ज्यादा संवेदनशील हैं। यह मेटफॉर्मिन और एटोरवास्टेटिन जैसी उच्च-मात्रा वाली पुरानी दवाओं पर भी लागू होता है जहां प्रति किलोग्राम थोड़ी सी भी वृद्धि लागत बढ़ा देती है।

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First Published - May 28, 2026 | 10:50 PM IST

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