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दफ्तरों में आचरण सुधारना बनी ‘टेढ़ी खीर’, TCS से लेकर इन्फोसिस तक में क्यों बढ़ रहे हैं विवाद?

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भारतीय कंपनियों में कड़े कानूनों के बावजूद कार्यस्थल पर आचरण और सुरक्षा बड़ी चुनौती है। टीसीएस-इन्फोसिस जैसे उदाहरण बताते हैं कि केवल नीति नहीं, संस्कृति बदलना जरूरी है

Last Updated- May 01, 2026 | 9:22 PM IST
pocso act
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) और आनंद राठी वेल्थ में यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े हालिया विवादों ने एक बार फिर इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि कंपनियां कार्यस्थल पर व्यवहार को कैसे परिभाषित करती हैं, लागू करती हैं और उसकी निगरानी करती हैं।

हालांकि संगठन यौन उत्पीड़न की रोकथाम (पॉश) और कार्यस्थल पर सुआचरण सुनिश्चित करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर देते हैं, फिर भी नीति और व्यवहार में अंतर बना हुआ है। कई कंपनियां कहती हैं कि वे रोजमर्रा के व्यवहार को संबोधित करने के लिए अपने दायरे को व्यापक बना रही हैं, जिसमें आपसी बातचीत, शक्ति संतुलन और कार्यस्थल संस्कृति शामिल हैं, लेकिन कर्मचारी बताते हैं कि कार्यान्वयन अभी भी असमान है, विशेष रूप से विभिन्न टीमों और स्थानों में।

उदाहरण के लिए, बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों में दर्ज मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है। टीसीएस ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025 में यौन उत्पीड़न की 125 शिकायतें दर्ज कीं, जो उससे पिछले वर्ष की 110 शिकायतों से अधिक थीं। इनमें से 78 शिकायतों को सही पाया गया और 23 लंबित थीं। इन्फोसिस में वित्त वर्ष 2024 में 98 शिकायतें प्राप्त हुईं जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 103 हो गईं।

वित्त वर्ष 2024 के लिए कंपनी की वार्षिक आम बैठक के दौरान, टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन ने कहा था कि कंपनी इस तरह की घटनाओं के प्रति बिल्कुल भी सहनशील नहीं है और कर्मचारियों को उत्पीड़न का सामना करने पर आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित करती है। उन्होंने कहा, ‘…और जब वे आवाज उठाएंगी, तो आवाज की संख्या बढ़ने की संभावना है।’

हाल ही में हुए टीसीएस विवाद के बाद बेंगलूरु स्थित टैलेंट सॉल्यूशंस फर्म सीआईईएल एचआर सर्विसेज द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, आईटी उद्योग के लगभग 38 प्रतिशत कर्मचारियों ने कार्यस्थल पर अनुचित व्यवहार के बारे में चिंता व्यक्त करने में ‘बहुत सहज’ महसूस किया। हालांकि, लगभग 34 प्रतिशत ने संकेत दिया कि वे ऐसा करने में सहज महसूस नहीं करते हैं।

नीतियां बनाम व्यवहार

कंपनियां इस बात पर जोर देती हैं कि उनके पास सुदृढ़ प्रणालियां मौजूद हैं। विप्रो में अध्यक्ष और मुख्य मानव संसाधन अधिकारी सौरभ गोविल ने कहा कि निगरानी निरंतर बनी रहती है। उन्होंने कहा, ‘अनुपालन समिति के रूप में, हम हर तिमाही में अपनी प्रक्रियाओं की समीक्षा करते हैं – क्रियान्वयन, नीतियां, प्रक्रियाएं। हर छह महीने में, हम इसकी जानकारी लेखापरीक्षा समिति को देते हैं। पॉश समिति और लोकपाल स्वतंत्र हैं और कंपनी के किसी भी व्यक्ति को रिपोर्ट नहीं करते हैं।’

इसी प्रकार, इन्फोसिस ने उत्पीड़न या भेदभाव के प्रति अपने ‘शून्य-सहिष्णुता दृष्टिकोण’ को दोहराया और स्वतंत्र जांच, बहु-चैनल रिपोर्टिंग और ‘आवाज उठाने’ की संस्कृति का हवाला दिया। बिजनेस स्टैंडर्ड को दिए अपने बयान में , कंपनी ने कहा कि वह सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टों से अवगत है जिनमें दावा किया गया है कि पुणे में इन्फोसिस बीपीएम की महिला कर्मचारियों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।

मुंबई के गोरेगांव स्थित अपने कार्यालय में धार्मिक भेदभाव के आरोपों को लेकर हाल ही में सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई टिप्पणियों का जवाब देते हुए टेक महिंद्रा ने कहा कि उसकी आंतरिक समीक्षा में ये दावे ‘गलत और निराधार’ पाए गए हैं। कंपनी ने ‘एक समावेशी और सम्मानजनक कार्यस्थल बनाने की अपनी प्रतिबद्धता’ पर जोर दिया, जहां प्रत्येक व्यक्ति के साथ गरिमा और निष्पक्षता से व्यवहार किया जाता है, और कहा कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी नीतियों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करना जारी रखेगी कि “किसी भी प्रकार का जबरदस्ती या अनुचित व्यवहार न हो”।

आचरण के ‘सूक्ष्म नियम’

जानकारों का तर्क है कि केवल औपचारिक नीतियां ही पर्याप्त नहीं हैं। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) के एक वरिष्ठ अधिकारी, जिन्होंने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा, असली चुनौती नीतियों को दैनिक व्यवहार में लागू करने में निहित है।

उन्होंने कहा, ‘अधिकांश कंपनियों के पास नीतियां तो होती हैं, लेकिन कमी उन्हें वास्तविक व्यवहार में बदलने में है। बेहतर जीसीसी (जनरल कोऑर्डिनेटर) बैठकों में सार्वजनिक आलोचना न करने, देर रात संचार पर स्पष्ट सीमाएं लगाने और प्रबंधक-कनिष्ठ के बीच बातचीत को सोच-समझकर संभालने जैसे सूक्ष्म नियमों को परिभाषित करते हैं।’ अ​धिकारी ने कहा कि संगठनों की सबसे बड़ी गलती ‘प्रतिभाशाली होने के बावजूद ऐसे बदतमीज’ लोगों को बरदाश्त करना है जो उच्च प्रदर्शन तो करते हैं लेकिन सहकर्मियों के रूप में अच्छा व्यवहार नहीं करते। जीसीसी कार्यकारी ने कहा कि ऐसे लोग अक्सर फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।

सीआईईएल एचआर के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्या​धिकारी आदित्य नारायण मिश्रा का मानना ​​है कि ‘कार्यस्थल पर व्यवहार अंततः संस्कृति और नेतृत्व से निर्धारित होता है’। उन्होंने कहा कि दबाव या बहिष्कार के सूक्ष्म रूप भी समय के साथ विश्वास और टीम की प्रभावशीलता को कम कर सकते हैं।

विभिन्न स्थानों, विशेषकर छोटे शहरों में, एकरूपता सुनिश्चित करना एक कमजोर कड़ी बनी हुई है। उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि इसके लिए दोहरी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है: उत्पीड़न और नैतिकता जैसे मुद्दों पर वैश्विक स्तर पर अडिग रुख अपनाना, साथ ही संचार शैलियों और पदानुक्रमों के प्रति स्थानीय संवेदनशीलता का ध्यान रखना।

मिश्रा ने कहा, ‘निरंतर जागरूकता, स्थानीय स्तर पर संवेदनशीलता और सुसंगत प्रवर्तन महत्त्वपूर्ण हैं,’ और साथ ही उन्होंने कहा कि नेतृत्व को ‘सभी केंद्रों में एक समान माहौल बनाना चाहिए।’

एरिक्सन इंडिया के एक प्रवक्ता ने बताया कि उनकी कंपनी में कार्यस्थल पर आचरण वैश्विक ‘व्यापार नैतिकता संहिता’ द्वारा नियंत्रित होता है, साथ ही पॉश जैसे स्थानीय अनुपालन ढांचे भी इसमें सहायक होते हैं। कंपनी ने कहा कि वह गुमनाम हेल्पलाइन सहित कई रिपोर्टिंग चैनलों का उपयोग करती है और सभी स्थानों पर शिकायत प्राप्त होने से लेकर उसके निपटारे तक एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करती है। गंभीरता के आधार पर सजा में प्रशिक्षण से लेकर बर्खास्तगी तक शामिल है, और उत्पीड़न या धोखाधड़ी जैसे गंभीर उल्लंघनों को बाहरी अधिकारियों को भेजा जा सकता है।

संस्कृति, न कि केवल अनुपालन

कुछ स्थानों पर, पारंपरिक अनुपालन प्रशिक्षण पर पुनर्विचार किया जा रहा है ताकि इसमें केवल नीतिगत जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय परिदृश्य-आधारित शिक्षण, भूमिका निर्वाह और प्रबंधक कोचिंग को शामिल किया जा सके।

आईटीसी लिमिटेड ने कहा कि वह नेतृत्व की सहभागिता, व्यापक प्रतिक्रिया और चिंताओं को उठाने के लिए खुले चैनलों के समर्थन से, भर्ती के चरण से ही व्यवहार संबंधी अपेक्षाओं को एकीकृत करता है। कंपनी ने इस बात पर जोर दिया कि उसके मूल्यों के साथ तालमेल ‘विकास के लिए एक पूर्व शर्त’ है।

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब कंपनियां आचरण को केवल अनुपालन अभ्यास के रूप में मानने के बजाय इसे संगठनात्मक संस्कृति में समाहित कर लेंगी।

(रिपोर्ट: अभीक दास, शाइन जेकब, गुलवीन औलख, ईशिता आयान दत्त और शिवानी शिंदे)

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First Published - May 1, 2026 | 9:22 PM IST

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