FD Interest Rates: देश में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या आने वाले महीनों में बैंकों की सावधि जमा (FD) पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसकी वजह सिर्फ महंगाई का दबाव नहीं है, बल्कि बैंकिंग प्रणाली में जमा वृद्धि की धीमी रफ्तार, निवेशकों का म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार की ओर बढ़ता रुझान तथा वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता भी है।
हाल के वर्षों में निवेशकों की सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां बचत का बड़ा हिस्सा बैंक जमा में जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग बेहतर रिटर्न की उम्मीद में म्यूचुअल फंड, इक्विटी और अन्य बाजार आधारित निवेश विकल्पों को अपना रहे हैं। इसका असर बैंकों की जमा वृद्धि पर भी दिखाई दे रहा है। कई बैंक लगातार ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए विशेष FD योजनाएं और अतिरिक्त ब्याज दरों की पेशकश कर रहे हैं।
इसी बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक भी नजदीक है। बाजार की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि केंद्रीय बैंक महंगाई और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन बनाते हुए ब्याज दरों को लेकर क्या रुख अपनाता है। अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव जैसे वैश्विक भू-राजनीतिक हालात के बीच यदि महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो ब्याज दरों के ऊंचे स्तर पर बने रहने या कुछ क्षेत्रों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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बैंकिंग क्षेत्र के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक जमा वृद्धि और ऋण वृद्धि के बीच संतुलन बनाना है। पिछले कुछ समय में कर्ज की मांग अपेक्षाकृत मजबूत रही है, जबकि जमा उसी गति से नहीं बढ़ी है। ऐसे में कई बैंकों को ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए जमा दरों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निवेशकों का झुकाव बाजार आधारित उत्पादों की ओर बना रहता है और बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी पर दबाव बढ़ता है, तो कुछ बैंक चुनिंदा अवधियों की FD पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। हालांकि यह बढ़ोतरी व्यापक और आक्रामक होगी या नहीं, यह काफी हद तक RBI के अगले कदम पर निर्भर करेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनावों ने भी बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे हालात में कच्चे तेल समेत कई वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, जिसका असर घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है। यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों में राहत देना आसान नहीं होगा।
यही कारण है कि वित्तीय बाजारों में इस बात को लेकर चर्चा बढ़ रही है कि आने वाले समय में जमा पर मिलने वाले ब्याज में कुछ सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि फिलहाल किसी बड़े बदलाव की उम्मीद से पहले MPC के फैसले का इंतजार किया जा रहा है।
भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व मुख्य महाप्रबंधक (CGM) सुनील पंत का कहना है कि निवेशकों के सामने हमेशा कई एसेट क्लास उपलब्ध रहते हैं और वे सुरक्षा, रिटर्न तथा लिक्विडिटी जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर निवेश का विकल्प चुनते हैं।
उनके अनुसार किसी भी निवेशक के पास भविष्य की पूरी जानकारी नहीं होती, इसलिए निवेश संबंधी फैसले अक्सर भावनाओं, पहुंच और जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि भारत में आम लोगों के पास निवेश योग्य अतिरिक्त धन सीमित होता है और अधिकांश निवेशक स्वभाव से जोखिम लेने से बचते हैं। इसके अलावा बैंक शाखाओं की मौजूदगी लोगों को भरोसा देती है तथा यह धारणा भी मजबूत रहती है कि जरूरत पड़ने पर बैंकिंग प्रणाली को संस्थागत समर्थन मिलता है।
सुनील पंत का मानना है कि जब तक लंबे समय तक वास्तविक रिटर्न बहुत अधिक नकारात्मक नहीं रहता, तब तक आम लोग अपनी बचत का बड़ा हिस्सा बैंकों में जमा करना जारी रखेंगे।
FD दरों में संभावित बढ़ोतरी को लेकर उन्होंने कहा कि अधिक जोखिम लेने वाले निवेशक हमेशा ऐसे विकल्पों की तलाश करते हैं जहां ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना हो। यही वजह है कि कुछ निवेशक बाजार आधारित निवेशों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
हालांकि उनका कहना है कि निकट भविष्य में बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला तभी ले सकते हैं जब बाजार से लिक्विडिटी संकट के स्पष्ट संकेत मिलने लगें। अन्यथा अधिकांश बैंक पहले RBI की मौद्रिक नीति समिति के फैसले का इंतजार करना पसंद करेंगे।
उन्होंने कहा कि यदि अगले कुछ दिनों में कोई अप्रत्याशित आर्थिक या वित्तीय समस्या सामने नहीं आती है, तो बैंक MPC के रुख को देखने के बाद ही बड़े फैसले लेंगे। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना जरूर दिखाई देती है, लेकिन यह कब से लागू होगी और कितने बेसिस प्वाइंट की होगी, इस बारे में अभी कोई निश्चित अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।
ईजीपे के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी शम्स तबरेज का कहना है कि मौजूदा वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिस्थितियों में महंगाई का दबाव, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और बैंकिंग सिस्टम में जमा वृद्धि की सुस्ती जैसे कारक एक साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या बैंकों को फिर से FD दरों में बदलाव करना पड़ सकता है।
उनके मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में निवेशकों का रुझान बेहतर रिटर्न की तलाश में म्यूचुअल फंड और अन्य बाजार आधारित उत्पादों की ओर बढ़ा है। इससे बैंकों के लिए जमा जुटाना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसी स्थिति में बैंक अपने डिपॉजिट बेस को मजबूत करने के लिए चुनिंदा श्रेणियों और अवधियों में ब्याज दरों में सीमित बढ़ोतरी कर सकते हैं।
शम्स तबरेज का मानना है कि वरिष्ठ नागरिकों और खुदरा निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बैंक विशेष योजनाओं के माध्यम से बेहतर रिटर्न की पेशकश कर सकते हैं। हालांकि ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव का सीधा संबंध RBI की मौद्रिक नीति से रहेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो RBI सख्त रुख बरकरार रख सकता है। ऐसी स्थिति में बैंकों पर भी जमा दरों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने का दबाव बढ़ेगा। वहीं यदि केंद्रीय बैंक आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए भविष्य में नरम रुख अपनाने के संकेत देता है, तो बैंक ब्याज दरों को स्थिर रखने या सीमित बदलाव करने की रणनीति अपना सकते हैं।
लिक्विडिटी की स्थिति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यदि बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी बढ़ती है, तो बैंक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अधिक ब्याज दरों की पेशकश कर सकते हैं। दूसरी ओर पर्याप्त लिक्विडिटी होने पर ऐसी जरूरत कम पड़ती है।
इस बार RBI की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा सप्ताह का सबसे अहम आर्थिक घटनाक्रम मानी जा रही है। मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 3 जून से 5 जून तक होने वाली है। Business Standard के एक पोल के अनुसार, बाजार के जानकारों का मानना है कि MPC इस बार रीपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रख सकती है, क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और उससे जुड़े वैश्विक जोखिम नीति निर्माताओं के लिए प्रमुख चिंता का विषय बने हुए हैं।
बाजार की नजर सिर्फ ब्याज दरों के फैसले पर ही नहीं, बल्कि RBI के पूरे रुख पर भी रहेगी। केंद्रीय बैंक खाद्य महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक वित्तीय बाजारों की अस्थिरता और रुपये की चाल को लेकर अधिक सतर्क रुख अपना सकता है।
यदि RBI अपने बयान में महंगाई से जुड़े जोखिमों पर सख्त संकेत देता है, तो बैंकिंग सेक्टर में जमा दरों को लेकर प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है। इसके साथ ही यह भी देखना अहम होगा कि केंद्रीय बैंक भविष्य की नीति दिशा को लेकर क्या संकेत देता है।
इसी सप्ताह सरकार संशोधित कैलेंडर के तहत वार्षिक GDP आंकड़े जारी करेगी। साथ ही भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं का नया दौर, मई महीने के GST संग्रह के आंकड़े और PMI डेटा भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में यह पूरा सप्ताह आर्थिक मोर्चे पर काफी अहम रहने वाला है।