विदेश में रहने वाले भारतीयों (एनआरआई) से ज्यादा पैसा आकर्षित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की नई पहल का असर दिखने लगा है। देश के कई बैंकों ने विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) यानी एफसीएनआर(बी) जमा पर ब्याज दरें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। एचडीएफसी बैंक ने बुधवार को एफसीएनआर(बी) जमा पर ब्याज दरों में 2.6 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की। इसके बाद बैंक अब 3 से 5 साल की अवधि वाले एफसीएनआर(बी) जमा पर अधिकतम 6 प्रतिशत ब्याज दे रहा है।
एचडीएफसी बैंक के अलावा यस बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक ने भी अपनी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। ये बैंक 3 से 5 साल की अवधि वाली एफसीएनआर(बी) जमा पर 7.10 प्रतिशत तक ब्याज ऑफर कर रहे हैं। बैंकों का कहना है कि आरबीआई की नई व्यवस्था के कारण वे पहले के मुकाबले ज्यादा आकर्षक ब्याज दरें देने की स्थिति में हैं।
पिछले सप्ताह आरबीआई ने घोषणा की थी कि 3 से 5 साल की अवधि वाले नए एफसीएनआर(बी) जमा जुटाने पर विदेशी मुद्रा जोखिम (हेजिंग) की पूरी लागत वह खुद उठाएगा। यह सुविधा 30 सितंबर तक उपलब्ध रहेगी। आमतौर पर बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा पर विनिमय दर के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए हेजिंग करनी पड़ती है, जिस पर काफी खर्च आता है। अब यह खर्च आरबीआई उठाएगा, जिससे बैंकों की लागत कम होगी।
बैंकों के मुताबिक, हेजिंग लागत खत्म होने से वे एनआरआई ग्राहकों को मौजूदा स्तर से करीब 2 प्रतिशत ज्यादा ब्याज देने में सक्षम होंगे। यही वजह है कि कई बैंकों ने तेजी से अपनी जमा दरें बढ़ाई हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि इस योजना के जरिए भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आ सकती है। बार्कलेज का अनुमान है कि अगले कुछ महीनों में 25 से 30 अरब डॉलर तक का निवेश एफसीएनआर(बी) के जरिए आ सकता है। वहीं एमयूएफजी बैंक ने 20 अरब डॉलर का अनुमान लगाया है। एसबीआई रिसर्च का कहना है कि यह आंकड़ा 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
आरबीआई ने साफ किया है कि बैंक अपनी आंतरिक नीतियों के अनुसार एफसीएनआर(बी) जमा की ब्याज दर तय कर सकते हैं। हालांकि उन्हें मौजूदा नियामकीय सीमा का पालन करना होगा। केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा है कि यह स्वैप सुविधा किसी भी स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में जुटाए गए नए एफसीएनआर(बी) जमा पर लागू होगी, लेकिन आरबीआई के साथ स्वैप केवल अमेरिकी डॉलर में किया जाएगा।
इस योजना के तहत जुटाए गए एफसीएनआर(बी) जमा पर कम से कम एक साल की लॉक-इन अवधि होगी। यानी निवेशक एक साल से पहले पैसा नहीं निकाल सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और रुपये पर दबाव कम करने में मददगार साबित हो सकता है।