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महंगे तेल और कमजोर रुपये से बढ़ी चिंता, और चढ़ सकती है सरकारी बॉन्ड यील्ड

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बाजार को ब्याज दरें बढ़ने का डर, सरकार के बढ़ते खर्च और महंगाई की आशंका से बॉन्ड बाजार पर दबाव

Last Updated- June 01, 2026 | 9:40 AM IST
SEBI Indian Bond Market

Indian Bond Market: ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से भारत के सरकारी बॉन्ड बाजार में दबाव बढ़ता जा रहा है। महंगे कच्चे तेल, कमजोर रुपये और बढ़ती महंगाई की आशंकाओं के बीच निवेशकों को डर है कि रिजर्व बैंक आने वाले महीनों में ब्याज दरें बढ़ा सकता है। इसी वजह से सरकारी बॉन्ड यील्ड में लगातार तेजी देखी जा रही है।

पिछले तीन महीनों में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 34 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 7 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इंडसइंड बैंक का अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह बढ़कर 7.45 प्रतिशत तक जा सकती है। वहीं कोटक महिंद्रा बैंक का मानना है कि मार्च 2027 तक यह 6.8 प्रतिशत से 7.4 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है।

Indian Bond Market: क्यों बढ़ रही है बॉन्ड यील्ड?

जब निवेशकों को लगता है कि भविष्य में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं या सरकार को ज्यादा कर्ज लेना पड़ सकता है, तो वे बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न की मांग करने लगते हैं। इससे बॉन्ड यील्ड बढ़ जाती है।

इंडसइंड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री गौरव कपूर का कहना है कि सरकारी बॉन्ड यील्ड में आगे भी बढ़ोतरी का रुझान बना रह सकता है। उनके मुताबिक बाजार पहले से ही मौद्रिक सख्ती की संभावना को कीमतों में शामिल कर रहा है। उन्होंने कहा कि ईंधन और उर्वरक सब्सिडी बढ़ने से सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही सरकार के बड़े कर्ज कार्यक्रम का असर भी यील्ड पर पड़ सकता है।

आरबीआई की बैठक पर रहेगी नजर

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के नतीजे शुक्रवार को आने वाले हैं। कमजोर रुपये और महंगे तेल के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका है, जिससे आरबीआई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि ज्यादातर अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा। लेकिन निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्रीय बैंक का रुख कितना सख्त रहता है।

टाटा एसेट मैनेजमेंट और बंधन एसेट मैनेजमेंट कंपनी का अनुमान है कि मौजूदा चक्र में ब्याज दरों में 75 से 100 बेसिस प्वाइंट तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

भारत पर ज्यादा असर क्यों पड़ रहा है?

ईरान युद्ध और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता का असर दुनिया के कई देशों के बॉन्ड बाजारों पर पड़ा है, लेकिन भारत की स्थिति थोड़ी अलग है। देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और सरकार ईंधन व उर्वरक पर बड़ी सब्सिडी भी देती है। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से सरकार का खर्च बढ़ सकता है और वित्तीय स्थिति पर दबाव आ सकता है।

बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा

कोटक महिंद्रा बैंक का अनुमान है कि टैक्स कलेक्शन और सरकारी संपत्तियों की बिक्री से होने वाली आय उम्मीद से कम रहने और सब्सिडी खर्च बढ़ने के कारण चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.3 प्रतिशत के बजटीय लक्ष्य से बढ़कर 4.6 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। बैंक का यह भी मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो यह आंकड़ा 4.8 प्रतिशत तक जा सकता है। यही वजह है कि बॉन्ड बाजार में चिंता बढ़ रही है।

सभी विशेषज्ञ नहीं मान रहे दरें बढ़ने की संभावना

हालांकि सभी विशेषज्ञ ब्याज दरों में बढ़ोतरी को लेकर एक जैसी राय नहीं रखते। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट कंपनी और क्वांटम एसेट मैनेजमेंट का मानना है कि रिजर्व बैंक दरें बढ़ाने में जल्दबाजी नहीं करेगा। उनका कहना है कि मौजूदा महंगाई मांग बढ़ने की वजह से नहीं, बल्कि तेल और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी जैसी बाहरी वजहों से पैदा हो रही है।

क्वांटम एसेट मैनेजमेंट की डेट फंड मैनेजर स्नेहा पांडे का कहना है कि बॉन्ड बाजार फिलहाल वास्तविक महंगाई से ज्यादा महंगाई के डर को कीमतों में शामिल कर रहा है। उनके मुताबिक बाजार लंबे समय तक ऊंची महंगाई बने रहने की आशंका जता रहा है, लेकिन वास्तविक स्थिति उतनी गंभीर नहीं भी हो सकती।

रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई परेशानी

युद्ध के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से बड़ी निकासी की है। इसका असर रुपये पर भी पड़ा है और वह रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब पहुंच गया है। रुपये को संभालने के लिए रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा है। इसी बीच पांच साल की ब्याज दर स्वैप दर भी युद्ध शुरू होने के बाद 60 बेसिस प्वाइंट से ज्यादा बढ़ चुकी है। पांच साल के सरकारी बॉन्ड पर भी सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला है।

डीबीएस बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव का कहना है कि भारत की बॉन्ड यील्ड पर लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनाव, ऊंची वैश्विक यील्ड और कमजोर रुपये का असर साफ दिखाई दे रहा है। उनके मुताबिक जब तक इन मोर्चों पर राहत नहीं मिलती, बॉन्ड बाजार दबाव में बना रह सकता है। (ब्लूमबर्ग के इनपुट के साथ)

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First Published - June 1, 2026 | 9:26 AM IST

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