गैर-जीवन बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दिए जाने के बाद इस क्षेत्र में विदेशी बीमा कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ गई है। कई वैश्विक कंपनियां संयुक्त उद्यमों के जरिये भारत के इस क्षेत्र में दस्तक देने के लिए शुरुआती दौर की बातचीत कर रही हैं। दूसरी ओर कुछ पुरानी कंपनियां इस बार पूर्ण स्वामित्व के साथ भारतीय बाजार में वापसी करने की संभावनाएं तलाश रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी-स्विस बीमा कंपनी चब, दक्षिण अफ्रीका की कंपनी ओल्ड म्युचुअल और अमेरिकी निवेश फर्म टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट व बेन कैपिटल जैसी संस्थाएं भारत के बीमा बाजार में प्रवेश करने की संभावनाएं तलाश रही हैं। पहले ऐसी खबरें आईं थीं कि ब्लैकस्टोन इंक सामान्य बीमा क्षेत्र में प्रवेश करने की संभावनाएं तलाश रही है, मगर कंपनी ने ऐसी किसी योजना से इनकार किया है।
चब और ओल्ड म्युचुअल ने पहले भारतीय बीमा उद्यमों में हिस्सेदारी ली थी लेकिन कुछ साल पहले उन्होंने अपना निवेश समेट लिया था। चब ने सामान्य बीमा कारोबार में उतरने के लिए एचडीएफसी के साथ साझेदारी की थी लेकिन बाद में 2007 में वह बाहर निकल गई। ओल्ड म्युचुअल का 2001 से 2017 तक कोटक महिंद्रा बैंक के साथ जीवन बीमा संयुक्त उद्यम था जिसके बाद वह बाहर निकल गई।
इस बाबत जानकारी के लिए इन कंपनियों को भेजे गए ईमेल का खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया।
उद्योग प्रतिभागियों का मानना है कि भारतीय बीमा बाजार में विदेशी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ने की मुख्य वजह नियामकीय बदलाव और बेहतर होती बाजार स्थितियां हैं। बीमा उद्योग के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, ‘वैश्विक कंपनियों की दिलचस्पी में आई यह तेजी 100 फीसदी एफडीआई, निवेश के बेहतर नियमों और विदेशी कंपनियों के लिए प्रबंधन पर बेहतर नियंत्रण जैसे सुधारों को दर्शाती है। हालांकि लंबी अवधि के लिए वृद्धि की संभावनाएं दमदार हैं, लेकिन खुलासा संबंधी मानकों, अंडरराइटिंग के तरीकों, अधिग्रहण की उच्च लागत और स्वास्थ्य बीमा में अब तक मिली सीमित सफलता जैसी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं।’
विदेशी निवेशकों का झुकाव जीवन बीमा के मुकाबले गैर-जीवन बीमा की ओर अधिक दिख रहा है। इसकी मुख्य वजह अपेक्षाकृत सरल वितरण ढांचा है। जीवन बीमा अभी भी काफी हद तक एजेंसी नेटवर्क और बैंकएश्योरेंस चैनलों पर निर्भर है जिससे बाजार में प्रवेश करना काफी जटिल हो जाता है।
उद्योग के एक अन्य अंदरूनी सूत्र ने कहा, ‘सामान्य बीमा के मामले में काफी गतिविधियां दिख रही हैं। मगर जीवन बीमा के मामले में कंपनियां काफी सतर्क बनी हुई हैं क्योंकि वितरण चैनल काफी मायने रखता है। वेस्टब्रिज के निवेश वाली बीमा कंपनी द्वारा लाइसेंस हासिल करने के बाद विशेष रूप से अमेरिकी निजी इक्विटी एवं वेंचर कैपिटल फर्मों के बीच दिलचस्पी बढ़ने लगी है। उनमें से कई तो भारतीय बाजार में दस्तक देने के लिए गंभीरतापूर्वक विचार कर रही हैं।’
हाल में बीमा नियामक आईआरडीएआई ने वेस्टब्रिज कैपिटल के निवेश वाली किवी जनरल इंश्योरेंस को मंजूरी दी है। ऑस्ट्रेलिया के क्यूबीई इंश्योरेंस ग्रुप ने 324 करोड़ रुपये में रहेजा क्यूबीई जनरल इंश्योरेंस में शेष 51 फीसदी हिस्सेदारी का प्रिज्म जॉन्सन से अधिग्रहण करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं जो नियामक मंजूरी के अधीन है। यह एफडीआई नीति में बदलाव के बाद किसी घरेलू बीमा कंपनी पर पूर्ण स्वामित्व की चाहत रखने वाली पहली विदेशी बीमा कंपनी बन जाएगी।
महिंद्रा ग्रुप और कनाडा की मैनुलाइफ ने 3,600 करोड़ रुपये प्रत्येक की निवेश प्रतिबद्धता के साथ बराबर हिस्सेदारी वाले संयुक्त उद्यम के जरिये जीवन बीमा कारोबार में उतरने की घोषणा की है। ब्रिटेन की कंपनी प्रूडेंशियल पीएलसी ने एचसीएल ग्रुप के साथ साझेदारी के जरिये अलग से स्वास्थ्य बीमा कारोबार स्थापित किया है। इस बीच एंजेल वन ने लिववेल के साथ एक डिजिटल फर्स्ट जीवन बीमा उद्यम की योजना बनाई है।
खबरों के अनुसार, एक अन्य प्रस्तावित सामान्य बीमा उद्यम के तहत एम पलोनजी ग्रुप ने ट्रू नॉर्थ और फेडरल बैंक के साथ साझेदारी की योजना बनाई है।
दिसंबर 2025 में संसद ने बीमा में एफडीआई की सीमा को 74 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी करने को मंजूरी दी थी। वित्त मंत्रालय ने 2 मई को बीमा क्षेत्र में एफडीआई की संशोधित सीमा के लागू होने की औपचारिक अधिसूचना जारी की।
उद्योग विशेषज्ञों ने आईएफआरएस और जोखिम आधारित पूंजी (आरबीसी) जैसे वैश्विक लेखांकन ढांचों को अपनाने की संभावना को भी इस क्षेत्र की वृद्धि को रफ्तार देने वाला एक कारक बताया है।
एजिस के मुख्य कार्याधिकारी हैंस डे कुइपर ने हाल में बिज़नेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा था कि भारत के बीमा बाजार में वैश्विक कंपनियों की दिलचस्पी दमदार बनी हुई है। मगर अधिक मूल्यांकन और नियामक अनिश्चितता इच्छुक कंपनियों के लिए चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।