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स्वास्थ्य बीमा से करेंगे परहेज तो बचत उड़ेगी, कर्ज चढ़ेगा और बिगड़ जाएगा निवेश

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नीवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस ने हाल में एक सर्वेक्षण कराया तो पता चला कि बड़ी तादाद में युवा स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां बीच में ही छोड़ देते हैं

Last Updated- May 31, 2026 | 10:03 PM IST
health insurance Plans

नीवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस ने हाल में एक सर्वेक्षण कराया तो पता चला कि बड़ी तादाद में युवा स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां बीच में ही छोड़ देते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 24 से 34 उम्र के 55 फीसदी लोगों ने पॉलिसी खरीदने के तीन साल के भीतर ही छोड़ दी। उनमें से 34 फीसदी ने पॉलिसी यह मानकर छोड़ दी कि वे पूरी तरह सेहतमंद हैं। पॉलिसी छोड़ने वालों में 34 फीसदी पर पर्सनल लोन था और 17 फीसदी होम लोन चुका रहे थे। इससे पता लगता है कि मासिक किस्त और दूसरे तयशुदा खर्चों के बीच बीमा को ताक पर रख दिया जाता है। बीमा छोड़ने की सबसे बड़ी वजह उस पर होने वाला खर्च ही है क्योंकि पॉलिसी छोड़ने वाले 46 फीसदी लोगों ने यही वजह बताई।

बीमा को बेकार मानना गलत

युवा भारतीय अक्सर अपनी सेहत के बारे में गलतफहमी पाल लेते हैं। नीवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस में डिजिटल बिजनेस यूनिट के निदेशक निमिष अग्रवाल कहते हैं, ‘उन्हें लगता है कि आज बीमारी नहीं है तो लंबे अरसे तक उनकी सेहत अच्छी ही बनी रहेगी।’

भविष्य में सेहत को होने वाले खतरों को कम करके आंकना आम बात है। इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट नरेंद्र भरिंदवाल आगाह करते हैं, ‘बीमारी, संक्रमण, दुर्घटना, जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं और अचानक सर्जरी कभी कहकर नहीं आती और यह सब कम उम्र में भी हो सकता है।’

कई युवा स्वास्थ्य बीमा को निवेश योजना की तरह मानते हैं। ऐसे में अगर उन्होंने बीमा का दावा नहीं किया तो उनके लिए प्रीमियम डूबा हुआ निवेश बन जाता है। लेकिन स्वास्थ्य बीमा को वित्तीय सुरक्षा के लिए जरूरी मानना चाहिए, मर्जी वाला खर्च नहीं। स्टेवेल डॉट हेल्थ के सह संस्थापक अरुण राममूर्ति कहते हैं, ‘भारत में स्वास्थ्य बीमा नहीं हो तो अपनी जेब से तगड़ा खर्च करना पड़ जाता है।’

बीमारी का वित्तीय असर

बीमारी का वित्तीय असर अस्पताल के बिल पर ही खत्म नहीं हो जाता। बीमारी के दौरान आपकी आमदनी शून्य होती है और आपकी बचत पर भी इसका असर पड़ता है। युवा जब कमाना शुरू करते हैं तो सेहत की वजह से उन्हें ज्यादा झटके लग सकते हैं। डेंगू, वायरल संक्रमण, अपेंडिसाइटिस या गुर्दे में पथरी आदि की वजह से उन्हें अस्पताल में भारी खर्च करना पड़ सकता है। सड़क पर दुर्घटना हो जाए तो सर्जरी, जांच, इम्प्लांट और वापस सेहतमंद होने तक में लाखों रुपये खर्च हो सकते हैं।

राममूर्ति समझाते हैं, ‘अस्पताल में भर्ती होने पर 3 लाख से 5 लाख रुपये तक का बिल किसी की भी आपातकालीन बचत को एकदम खत्म कर सकता है।’ अगर आईसीयू में कुछ दिन ठहरना पड़े तो जेब को बड़ा झटका लग सकता है। कैंसर या दिल के दौरे जैसी गंभीर बीमारियों में 10 लाख रुपये या उससे भी ज्यादा रकम लग जाती है। अग्रवाल बताते हैं, ‘पॉलिसी खरीदने वाले युवाओं के दावों में औसत रकम 1.8 लाख रुपये होती है।’

लंबे समय के लिए किया गया निवेश निकालकर गंभीर बीमारी पर खर्च करना पड़े तो रिटायरमेंट के लिए की गई बचत और दूसरे वित्तीय लक्ष्य प्रभावित होते हैं। राममूर्ति बताते हैं, ‘कुछ मामलों में लोगों को क्रेडिट कार्ड, बिना जमानत के कर्ज या दूसरी महंगी उधारी का रास्ता पकड़ना पड़ सकता है।’ भरिंदवाल आगाह करते हैं कि चिकित्सा पर होने वाले खर्च से भारी कर्ज भी चढ़ सकता है और जो लोग पहले ही किराया, कार लोन, पर्सनल लोन या होम लोन चुका रहे हैं, उनकी मुश्किल बढ़ सकती है।

जवानी में ही लांघ लें वेटिंग पीरियड

ज्यादातर स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में कई तरह के वेटिंग पीरियड होते हैं। शुरुआती अवधि के लिए, कुछ खास इलाज के लिए, प्रसव के लिए या पहले से मौजूद बीमारी के लिए दावे करने से पहले ग्राहक को कुछ समय इंतजार करना पड़ सकता है। अगर कम उम्र में ही पॉलिसी खरीद ली जाए तो ग्राहक की सेहत अच्छी रहते हुए ही वेटिंग पीरियड निकल जाते हैं। भरिंदवाल कहते हैं, ‘जब तक इलाज की नौबत आती है तब तक वेटिंग पीरियड पूरे हो चुके होते हैं।’

चूंकि युवा ग्राहक के पहले से बीमारी शायद ही होगी, इसलिए जल्द बीमा लेना फायदेमंद होता है। राममूर्ति के मुताबिक यदि व्यक्ति कम उम्र में बीमा लेता है तो सेहत के लिए जोखिम शुरू होने तक बीमा पॉलिसी पूरी तरह कारगर हो जाती है। बीमारी होने के बाद पॉलिसी लेने पर या तो उस बीमारी का दावा देर में कर पाते हैं या बीमा का दायरा कम हो जाता है या प्रीमियम ज्यादा चुकाना पड़ता है।

उठाएं कर छूट का फायदा

स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदने वाले अगर पुरानी आयकर प्रणाली के अंतर्गत हैं तो उन्हें आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत प्रीमियम पर कर छूट का फायदा मिलता है। अग्रवाल बताते हैं, ‘खुद के, जीवनसाथी के और बच्चों के स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम के एवज में 25,000 रुपये तक की छूट मिलती है। अगर बीमा कराने वाले और जीवनसाथी की उम्र 60 साल से अधिक है तो 50,000 रुपये तक की छूट मिल जाती है।’

माता-पिता का स्वास्थ्य बीमा कराने पर चुकाए गए प्रीमियम के बदले कर छूट का दावा अलग से किया जा सकता है। माता-पिता की उम्र 60 साल से कम होने पर 25,000 रुपये तक और उससे अधिक होने पर 50,000 रुपये तक छूट मिल सकती है। एहतियातन स्वास्थ्य जांच कराने पर कर योग्य आय में अलग से छूट मिलती है। अग्रवाल कहते हैं कि इस तरह की छूट से कर योग्य आय कम हो जाती है और प्रीमियम कुल मिलाकर सस्ता पड़ता है।

प्रीमियम लोडिंग, एक्सक्लूजन से बचें

स्वास्थ्य बीमा देते समय अगर कंपनी को लगता है कि ग्राहक की सेहत को ज्यादा खतरा है तो वह प्रीमियम बढ़ा देती है। इसी को प्रीमियम लोडिंग कहते हैं। अग्रवाल की सलाह है कि स्वास्थ्य बीमा कम उम्र में खरीदने पर इस तरह की लोडिंग से बचने में मदद मिलती है क्योंकि ग्राहक की सेहत को उस समय नहीं के बराबर जोखिम होता है।

युवा ग्राहकों को पहले से कोई बीमारी होने की आशंका अक्सर नहीं होती है, इसलिए उन्हें सामान्य प्रीमियम पर बीमा मिल सकता है। देर से बीमा कराने पर प्रीमियम बढ़ सकता है और मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा या कोई अन्य बीमारी होने पर इसमें और भी बढ़ोतरी हो सकती है। भरिंदवाल कहते हैं, ‘इससे कुछ बीमारियों को बीमा दायरे से बाहर किया जा सकता है, बंदिशें लग सकती हैं या गहरी जांच-पड़ताल की जा सकती है।’ ऐसे में युवा स्वास्थ्य बीमा खरीदते समय प्रीमियम का बोझ कम कैसे रख सकते हैं?

बेस प्लान के साथ सुपर टॉप-अप

प्रीमियम का खर्च कम रखना हो तो स्वास्थ्य बीमा की एक बेस पॉलिसी खरीदकर सुपर टॉप-अप कराना बेहतर होता है। यूनिवर्सल सोम्पो जनरल इंश्योरेंस में चीफ टेक्निकल ऑफिसर आरती मलिक बताती हैं, ‘ग्राहक ने बीमा की जो सीमा चुनी है, अगर अस्पताल का बिल उससे ऊपर चला जाता है तो सुपर टॉप-अप काम आता है।’ सामान्य टॉप-अप के बजाय सुपर टॉप-अप ही कराना चाहिए क्योंकि डिडक्टिबल के लिए साल भर की एक सीमा तय कर दी जाती है। आरती समझाती हैं, ‘साल में जितने भी दावे बीमा के योग्य होते हैं, उन्हें एक साथ जोड़कर डिडक्टिबल का हिसाब लगाया जाता है।’

एक व्यक्ति 25 लाख रुपये की बेस पॉलिसी ले सकता है और दूसरा 10 लाख रुपये की बेस पॉलिसी लेकर 15 लाख रुपये का सुपर टॉप-अप करा सकता है। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार और सहजमनी डॉट कॉम के संस्थापक अभिषेक कुमार बताते हैं, ’10 लाख रुपये की बेस पॉलिसी और 15 लाख रुपये का सुपर टॉप-अप लेने वाले व्यक्ति के लिए प्रीमियम 25 लाख रुपये की इकलौती पॉलिसी लेने वाले व्यक्ति के मुकाबले 30 से 50 फीसदी कम रह सकता है।’

उनके मुताबिक 25 लाख रुपये की पॉलिसी इसलिए महंगी है क्योंकि इसमें पूरे 25 लाख रुपये का दावा आने की संभावना मान ली जाती है। सुपर टॉप-अप सस्ता इसलिए पड़ता है क्योंकि इसका काम बेस बीमा पॉलिसी से 10 लाख रुपये खर्च हो जाने के बाद ही शुरू होता है। यह भी देख लेना चाहिए कि दोनों पॉलिसियों में पहले से मौजूद बीमारियों और खास बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड कितना है। सुपर टॉप-अप में भी बेस पॉलिसी जैसे ही फायदे मिलने चाहिए और अस्पताल के कमरों की श्रेणियां भी वैसी ही होनी चाहिए।

चुनें नो क्लेम बोनस वाली पॉलिसी

पॉलिसीधारक जितने साल तक दावा नहीं करता है, उतने साल तक उसे नो-क्लेम बोनस मिलता जाता है। इससे रीन्यूअल के समय बीमा की रकम बढ़ जाती है मगर प्रीमियम पहले जितना ही रहता है।
आरती का कहना है, ‘ज्यादातर स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी उन सालों के बदले बिना प्रीमियम लिए बीमा रकम बढ़ा देती हैं, जिनमें कोई दावा नहीं किया गया है।’

कुछ पॉलिसियों में दावे होने के बाद भी बीमा रकम बढ़ा दी जाती है। चुनिंदा पॉलिसियां रीन्यूअल के समय प्रीमियम में छूट भी देती हैं मगर उनकी संख्या बहुत कम है। सालाना प्रीमियम या तो उतना ही रहता है या उम्र के साथ बढ़ता है मगर नो क्लेम बोनस के कारण बीमा की कुल रकम बढ़ती जाती है।

पॉलिसीधारकों को देख लेना चाहिए कि सालाना कितना फीसदी नो क्लेम बोनस मिलता है। यह 10 से 50 फीसदी तक हो सकता है। अभिषेक यह जांचने की सलाह भी देते हैं कि बीमा की रकम कहां तक बढ़ सकती है। कुछ पॉलिसियों में तो यह 500 फीसदी तक हो सकती है। यह भी समझ लेना चाहिए कि इस बोनस का दावे के समय क्या होता है। अभिषेक का कहना है कि कई पॉलिसियों में पहले से इकट्ठा नो क्लेम बोनस दावे के बाद बहुत कम हो जाता है।

भरें मासिक प्रीमियम

हर महीने प्रीमियम भरने का विकल्प जेब पर हल्का पड़ता है क्योंकि इसमें थोड़ी-थोड़ी रकम चुकानी होती है। इससे ईएमआई और दूसरे खर्चों से जूझ रहे ग्राहकों पर माली बोझ कम रहता है। मगर इंश्योरेंस समाधान की सह-संस्थापक और सीओओ शिल्पा अरोड़ा आगाह करती हैं, ‘अगर एक महीने भी प्रीमियम भरने से चूके तो पॉलिसी खत्म होने का खतरा रहता है।’ ऐसे में बैंक खाते से ही हर महीने किस्त कटवाने का विकल्प अच्छा रहता है।

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First Published - May 31, 2026 | 10:03 PM IST

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