कभी दिल की बीमारी को बुढ़ापे की बीमारी या किसी सदमे का नतीजा माना जाता था मगर अब ऐसा बिल्कुल नहीं रह गया है। भारत में 20 साल की उम्र गुजार चुके युवाओं को भी अब दिल की बीमारियों से जूझना पड़ रहा है। आजकल दिल की बीमारी के लिए बीमा कंपनियों के पास आने वाले दावों में हर तीन में से एक दावा 1.7 लाख रुपये से ऊपर का होता है। ये आंकड़े कर्मचारी बीमा एवं स्वास्थ्य लाभ कंपनी प्लम ने दिए हैं, जिसका कहना है कि मरीज आईसीयू में पहुंच जाए या सर्जरी की नौबत आ जाए तो दावा 5 लाख रुपये से भी ज्यादा का हो जाता है।
इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट नरेंद्र भरिंदवाल कहते हैं, ‘भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि इस समय लगभग 6 से 7 करोड़ भारतीयों को दिल की कोई न कोई बीमारी जरूर है।’ उनका कहना है कि भारत में हर साल इस बीमारी के 20-25 लाख नए मामले सामने आ जाते हैं।
दिल की बीमारी कम उम्र में ही हो जाए तो बीमा हासिल करना मुश्किल हो जाता है। स्टेवेल डॉट हेल्थ के सह संस्थापक अरुण राममूर्ति कहते हैं, ‘इसकी वजह से अंडरराइटिंग के समय जांच-पड़ताल ज्यादा होती है और ट्रेडमिल टेस्ट, ईको और एंजियोग्राफी जैसी कई चिकित्सा जांच भी करानी पड़ती हैं।’ बीमा मिल जाए तो भी ग्राहक दो से तीन साल बाद ही दिल की बीमारी से जुड़े दावे कर सकता है।
बीमा कंपनियां सामान्य स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी दे सकती हैं। भरिंदवाल आगाह करते हैं, ‘लेकिन वे रिस्क लोडिंग के जरिये ज्यादा प्रीमियम ले सकती हैं और दिल की बीमारी के दावों पर वेटिंग पीरियड भी लगा सकती हैं। दिल से जुड़े कुछ इलाजों को पॉलिसी से हमेशा के लिए बाहर रखा जा सकता है या एंजियोप्लास्टी और बाईपास सर्जरी आदि पर सब-लिमिट लगाई जा सकती है।’
राममूर्ति बताते हैं कि प्रीमियम 30 से 80 फीसदी तक बढ़ सकता है और इलाज के कुल बिल में 10 से 30 फीसदी तक को-पे के नाम पर ग्राहक को देना पड़ सकता है। अगर बीमारी ज्यादा गंभीर है या हाल-फिलहाल हुई है तो बीमा कंपनी स्टैंडर्ड स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी देने से इनकार भी कर सकती है।
स्पेशलाइज्ड इनडेम्निटी हार्ट पॉलिसी में दिल की बीमारी के साथ दूसरी बीमारी और सर्जरी आदि भी शामिल होती हैं। मगर ये उन्हीं के लिए काम की हैं, जिन्हें दिल की बीमारी हो चुकी है या जिनकी एंजियोप्लास्टी अथवा बाईपास सर्जरी हो चुकी है। राममूर्ति की सलाह है, ‘अगर स्टैंडर्ड पॉलिसी नहीं मिल रही हो, प्रीमियम बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया हो या ग्राहक ज्यादा जल्दी और खास तरह का बीमा कवरेज चाहता हो तो स्पेशलाइज्ड कार्डियक पॉलिसी पर विचार किया जा सकता है।’
स्पेशलाइज्ड हार्ट पॉलिसी दो तरह की होती हैं- इनडेम्निटी वाली और बेनिफिट देने वाली। दिल की बीमारी से जुड़ा जो भी खर्च अस्पताल में भर्ती होने पर किया जाता है, वह इनडेम्निटी पॉलिसी में वापस हो जाता है। अगर फिक्स्ड बेनिफिट प्लान लिया जाता है तो दिल की बीमारी का पता लगने पर एकमुश्त रकम ग्राहक को थमा दी जाती है। इस श्रेणी में ग्राहक या तो दिल की बीमारी के लिए खास प्लान चुन सकता है या गंभीर बीमारियों की बीमा पॉलिसी ले सकता है। गंभीर बीमारियों की पॉलिसी में उसे कई बीमारियों में बीमा का लाभ मिल जाएगा।
जिन लोगों को दिल की बीमारी पहले ही हो चुकी है, उनहें स्पेशलाइज्ड इनडेम्निटी पॉलिसी खरीदने पर थोड़ा ज्यादा प्रीमियम चुकाना पड़ सकता है। इसमें बीमा की रकम भी कुछ कम हो सकती है। एक बड़ी चिंता यह भी होती है कि इलाज के दौरान अपनी जेब से ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है।
इंश्योरेंस समाधान की सह संस्थापक और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (सीओओ) शिल्पा अरोड़ा समझाती हैं, ‘सबलिमिट, कॉपी की शर्त और नॉन-पेयेबल आइटम्स की वजह से पॉलिसी खरीदने वाले को अपनी जेब से ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है।’
जब स्वास्थ्य बीमा खरीदें तो बीमा की रकम कम से कम उतनी जरूर रखें कि आपके इलाज का पूरा खर्च निकल आए। यूनिवर्सल सोम्पो जनरल इंश्योरेंस की चीफ टेक्नीकल ऑफिसर आरती मलिक कहती हैं, ‘अगर पॉलिसीधारक टर्शरी केयर सेंटर में या दिल के वरिष्ठ डॉक्टर से इलाज पसंद करता है तो बीमा की रकम पर्याप्त होनी चाहिए।’ यह भी जरूर देख लें कि अस्पताल में कमरे के किराये या आईसीयू के खर्च पर कोई सब-लिमिट न हो। कमरे के किराये में सही लिमिट चुनना बहुत जरूरी होता है।
मलिक समझाती हैं, ‘अस्पताल में भर्ती होने पर जो कमरा चुना जाता है, इलाज से जुड़े सारे खर्च उसी के हिसाब से कम या ज्यादा होते हैं।’ यह ध्यान रखना भी जरूरी होता है कि दिल के इलाज में कौन सी बीमारी पर कितनी बंदिशें तय की गई है। को-पेमेंट की शर्त जरूर जांच लें और यह भी देख लें कि बीमा कंपनी के नेटवर्क में कितने ज्यादा अस्पताल है। अरोड़ा की सलाह है, ‘ऐसी पॉलिसियों से दूर रहें जो पहली नजर में तो बड़ी सस्ती दिखती हैं मगर जिनमें कई तरह की शर्तें और बंदिशें छिपी रहती हैं।’
आपकी कंपनी ने बीमा पॉलिसी कराई है तो उसे भी जांच लें। अरोड़ा का कहना है कि दिल की गंभीर बीमारियों में उनकी बीमा राशि अक्सर कम पड़ जाती है और नौकरी बदलने पर कंपनी का बीमा ही खत्म हो जाता है।