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क्या है Bond Yield, जिसके बढ़ने से सरकार से लेकर आम आदमी तक बढ़ती है टेंशन

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बॉन्ड एक तरह का कर्ज का साधन होता है। जब सरकार या कंपनी बाजार से पैसा जुटाना चाहती है, तो वह बॉन्ड जारी करती है

Last Updated- May 21, 2026 | 1:40 PM IST
bond yield

सरकार हो या बड़ी कंपनियां… जब उन्हें ज्यादा पैसे की जरूरत होती है, तो वे निवेशकों से कर्ज लेती हैं। इसी कर्ज की लागत को बॉन्ड यील्ड यानी बॉन्ड यील्ड कहा जाता है। यह वैश्विक वित्तीय बाजार का एक बेहद अहम संकेतक माना जाता है क्योंकि इससे पता चलता है कि सरकारों और कंपनियों के लिए पैसा जुटाना कितना महंगा या सस्ता हो रहा है।

सरल भाषा में समझें तो बॉन्ड यील्ड वह रिटर्न है जो किसी निवेशक को बॉन्ड खरीदने पर मिलता है। वहीं सरकार या कंपनी के लिए यही उनकी उधारी की लागत होती है। इसलिए जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो इसका मतलब होता है कि कर्ज लेना महंगा हो रहा है।

आखिर बॉन्ड क्या होता है?

बॉन्ड एक तरह का कर्ज का साधन होता है। जब सरकार या कंपनी बाजार से पैसा जुटाना चाहती है, तो वह बॉन्ड जारी करती है। निवेशक इन बॉन्ड्स को खरीदकर उन्हें पैसा उधार देते हैं। इसके बदले सरकार या कंपनी निवेशकों को तय समय पर ब्याज देती है और बॉन्ड की अवधि पूरी होने पर मूल रकम वापस कर देती है। भारत में सरकार द्वारा जारी बॉन्ड्स को Government Securities यानी G-Secs कहा जाता है। वहीं कंपनियों द्वारा जारी किए गए बॉन्ड्स को कॉरपोरेट बॉन्ड कहा जाता है।

बॉन्ड यील्ड कैसे काम करती है?

हर बॉन्ड पर एक तय ब्याज मिलता है जिसे Coupon कहा जाता है। लेकिन बॉन्ड की यील्ड बाजार में उसकी कीमत के हिसाब से बदलती रहती है। मान लीजिए किसी बॉन्ड की कीमत 1,000 रुपये है और उस पर हर साल 50 रुपये ब्याज मिलता है। यानी उसका Coupon Rate 5 फीसदी हुआ। लेकिन अगर बाजार में उस बॉन्ड की कीमत घटकर 900 रुपये रह जाए, तो वही 50 रुपये का ब्याज अब ज्यादा रिटर्न देगा। ऐसे में उसकी यील्ड बढ़कर करीब 5.56 फीसदी हो जाएगी।

वहीं अगर बॉन्ड की कीमत बढ़ जाती है, तो यील्ड घट जाती है। यही वजह है कि बॉन्ड की कीमत और यील्ड हमेशा उल्टी दिशा में चलती हैं।

बॉन्ड यील्ड बढ़ती क्यों है?

बॉन्ड यील्ड बढ़ने के पीछे कई वजहें होती हैं। सबसे बड़ी वजह महंगाई और ब्याज दरों की उम्मीद होती है। अगर निवेशकों को लगता है कि आगे महंगाई बढ़ेगी, तो वे ज्यादा रिटर्न मांगते हैं क्योंकि भविष्य में मिलने वाले पैसों की असली कीमत कम हो जाती है। इसी तरह अगर बाजार को लगता है कि RBI या अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, तो बॉन्ड यील्ड पहले ही बढ़ने लगती है। सरकार की ज्यादा उधारी भी यील्ड बढ़ा सकती है। जब सरकार ज्यादा बॉन्ड जारी करती है, तो बाजार में सप्लाई बढ़ जाती है और यील्ड ऊपर जा सकती है।

अमेरिका का असर भारत पर क्यों पड़ता है?

दुनिया भर में अमेरिकी 10 साल की ट्रेजरी यील्ड को सबसे अहम बेंचमार्क माना जाता है। जब अमेरिका में बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ती है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों पर भी दबाव आता है। ऐसे समय में विदेशी निवेशक भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश बढ़ा सकते हैं क्योंकि वहां ज्यादा सुरक्षित और बेहतर रिटर्न मिलता है।

बढ़ती यील्ड का असर आम लोगों पर कैसे पड़ता है?

बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर सिर्फ सरकार या कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर होम लोन, बिजनेस लोन, म्युचुअल फंड और शेयर बाजार तक पर पड़ता है। जब यील्ड बढ़ती है, तो सरकार और कंपनियों के लिए उधार लेना महंगा हो जाता है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ती है और बिजनेस विस्तार पर असर पड़ सकता है। डेट म्युचुअल फंड में भी गिरावट आ सकती है क्योंकि यील्ड बढ़ने पर पुराने बॉन्ड्स की कीमत घट जाती है। वहीं शेयर बाजार पर भी दबाव बढ़ सकता है क्योंकि Fixed Income Investments ज्यादा आकर्षक लगने लगते हैं।

यील्ड घटने का क्या मतलब होता है?

अगर महंगाई कम होने लगे, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बने या निवेशक सुरक्षित निवेश की तरफ जाएं, तो बॉन्ड यील्ड घट सकती है। यील्ड गिरने का मतलब आमतौर पर यह माना जाता है कि बाजार में पैसा सस्ता हो रहा है और वित्तीय स्थितियां आसान हो रही हैं।

निवेशकों को किन चीजों पर नजर रखनी चाहिए?

Bond Market को समझने के लिए निवेशक आमतौर पर RBI की Repo Rate, महंगाई, सरकार की उधारी, Crude Oil Prices, विदेशी निवेश और अमेरिकी 10 साल की Treasury यील्ड पर नजर रखते हैं। क्योंकि बॉन्ड यील्ड सिर्फ एक संख्या नहीं… बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था में पैसे की लागत और बाजार की दिशा का बड़ा संकेत मानी जाती है।

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First Published - May 21, 2026 | 12:49 PM IST

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