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Bashir Badra Death: उर्दू शायरी का बड़ा स्तंभ ढहा, आम जिंदगी को गजल की जुबान देने वाले बशीर बद्र नहीं रहे

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Bashir Badra Death: बशीर बद्र ने गजल को आसान बनाया और उसे अरबी-फारसी के भारी-भरकम शब्दों की जकड़ से निकालकर आम लोगों की जुबान में ढाला, उनके अनुभवों से जोड़ा

Last Updated- May 28, 2026 | 5:50 PM IST
Bashir Badra

‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’- बशीर बद्र

Bashir Badra Death: अपनी शायरी से देश-विदेश में अनगिनत लोगों को मुरीद बनाने वाले मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। बद्र पिछले 14 सालों से डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे। बशीर बद्र के साथ ही उर्दू शायरी के उस दौर का एक मजबूत स्तंभ ढह गया जिसने उर्दू गजल को आम आदमी की स्मृतियों और उसकी भावनाओं का हिस्सा बनाने में मदद की।

आम जिंदगी का खास शायर

बशीर बद्र अपनी पीढ़ी के उन विरले शायरों में से थे जिन्हें सुना भी जाता है, पढ़ा भी जाता है, गुनगुनाया भी जाता है और बहुत बड़े पैमाने पर जिनके शेरों को उद्धृत भी किया जाता है। अपने सरल लेकिन संजीदा शेरों के जरिये बद्र ने अपनी एक अलग पहचान कायम की। बद्र की शायरी में इश्क-मोहब्बत, रोजमर्रा की दिक्कतें, शहरी भागदौड़ और इंसानी रिश्ते बार-बार और अलग-अलग ढंग से आते हैं। वे लोगों को इस तरह छूते कि उनके शेर लोगों की जुबान पर हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो जाते।

500 से अधिक मुशायरों में की शिरकत

डॉ. बद्र ने अपने जीवन काल में 500 से अधिक मुशायरों में शिरकत की और पाकिस्तान, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम सहित दुनिया के अनेक देशों में लोगों को अपने शेर सुनाए।

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उन्होंने बहुत कम उम्र से ही शायरी में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। उनका एक मशहूर शेर है:

‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’

उन्होंने यह शेर शिमला समझौते की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर लिखा था। पाकिस्तान में जब एक मुशायरे में उन्होंने यह शेर पढ़ा था तो सुनने वाले काफी देर के लिए खामोश हो गए।

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मेरठ से भोपाल तक का सफर 

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी ने बशीर बद्र को याद करते हुए बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘इंदौर में एक आयोजन में मैंने और बशीर बद्र ने साथ में पढ़ा था। उससे कुछ ही समय पहले मेरठ में उनका घर जलाया गया था। उन्होंने बहुत मायूसी से वह पूरा वाकया सुनाया था।’ गौरतलब है कि भोपाल आने के पहले बद्र का परिवार मेरठ में रहता था। 1987 में मेरठ में हुए दंगों में जब उनका घर जला तो अपनी इस तकलीफ को उन्होंने एक शेर के माध्यम से प्रकट किया जो बाद में उनकी पहचान से जुड़ गया और जो आज भी प्रासांगिक है:

‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’

इस हादसे के बाद ही उन्होंने भोपाल का रुख किया और हमेशा-हमेशा के लिए भोपाल के होकर रह गए। राजेश जोशी कहते हैं, ‘बशीर बद्र एक प्रतिबद्ध शायर थे जिसने सांप्रदायिकता का हमेशा विरोध किया और आम लोगों की जिंदगी को अपनी शेरो-शायरी में जगह दी।’

बशीर बद्र ने गजल को आसान बनाया और उसे अरबी-फारसी के भारी-भरकम शब्दों की जकड़ से निकालकर आम लोगों की जुबान में ढाला, उनके अनुभवों से जोड़ा। शायद तभी उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई। पिछले 14 सालों से वह सार्वजनिक जीवन में नहीं थे लेकिन इसके बावजूद उनको याद करने वाले लगातार बढ़ते ही गए।

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First Published - May 28, 2026 | 5:42 PM IST

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