वैश्विक ब्रोकरेज कंपनी बर्नस्टीन ने भारत की आर्थिक वृद्धि की राह में कुछ प्रमुख संरचनात्मक जोखिमों की तरफ इशारा किया है। इस कंपनी ने आगाह किया है कि अगर इन प्रमुख नीतिगत बाधाओं से सलीके से नहीं निपटा गया तो भारत का प्रदर्शन उसकी क्षमता से कमतर रह सकता है। भारत रणनीति टिप्पणी नोट, जिसे ‘प्रधानमंत्री को खुला पत्र’ नाम दिया गया है, ब्रोकरेज द्वारा 2019 में भी ऐसा ही प्रयास किया गया था। उस समय बर्नस्टीन ने आम चुनाव के बाद सरकार के लिए छह प्राथमिकताओं की रूपरेखा पेश की थी।
बर्नस्टीन के रणनीतिकार वेणुगोपाल गर्रे और निखिल अरेला ने कहा, ‘वह एक अलग ही दुनिया थी। कोविड महामारी और एआई क्रांति से पहले व्यापार एकीकरण काफी हद तक बरकरार था और वैश्वीकरण के खिलाफ सोच केवल एक सैद्धांतिक विषय था।’ उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति में आड़े आने वाली कई बाधाएं अभी भी जस की तस खड़ी हैं।
हालांकि यह पत्र असामान्य है, लेकिन बाजार के जानकारों का कहना है कि ऐसी टिप्पणियां आमतौर पर नीति निर्माताओं के बजाय निवेशकों के लिए अहम होती हैं। मुंबई स्थित एक बाजार रणनीतिकार ने कहा,‘यह मूलतः एक रणनीति नोट का ही अलग रूप है। ब्रोकरेज फर्म वैश्विक निवेशकों के लिए दीर्घकालिक जोखिम और अवसरों को प्रस्तुत करने के लिए ऐसे प्रारूपों का उपयोग करती हैं।’
बर्नस्टीन ने स्वीकार किया कि भारत ने पूंजीगत व्यय पर ध्यान केंद्रित कर सही निर्णय लिया है, जिससे व्यापक स्थिरता और आय वृद्धि को समर्थन मिला है, लेकिन उसने मौजूदा लाभों को अत्यधिक महत्त्व देने को लेकर भी आगाह किया। रिपोर्ट में कहा गया है, अगर पिछले छह वर्षों ने यह दिखाया है कि नीतिगत तालमेल से भारत क्या कर सकता है, तो इसमें हालिया सफलता को भविष्य में भुनाने के लालच जैसा जोखिम भी जुड़ा है।
इस ब्रोकरेज कंपनी ने बुनियादी ढांचे, नवाचार क्षमता और विशेष रूप से एआई जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होने की कमी को उजागर किया। एआई के क्षेत्र में तेजी से हो रही प्रगति को देखते हुए रिपोर्ट में रोजगार से जुड़ी चुनौती के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है,‘जेन एआई अब उस ढांचे को चुनौती दे रहा है। इस पीढ़ी को आगे बढ़ाने वाले कई रोजगार के अवसर सीधे स्वचालन से प्रभावित होंगे।’
ब्रोकरेज कंपनी ने चेतावनी दी है कि भारत इन प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने वाला देश बनकर रह जाएगा, मगर उनसे मिलने वाले लाभ का उचित हिस्सा हासिल नहीं कर पाएगा।’ बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष घरेलू आईटी कंपनियों में आई भारी बिकवाली को देखते हुए वैश्विक निवेशकों के बीच बढ़ती चिंता इस बात को दर्शाती है।
बर्नस्टीन ने विनिर्माण क्षेत्र पर सतर्कता बरतते हुए कहा है कि ‘चीन+1’ बदलाव से भारत को सीमित लाभ ही मिले हैं और रोजगार अभी भी कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में केंद्रित है। गर्रे और अरेला लिखते हैं,‘चीन+1 के प्रभाव से भारत को मिले सीमित लाभ इस बात को उजागर करते हैं कि क्षमता निर्माण में कितना समय लगता है। साथ ही विलंबित कार्रवाई की कीमत भी बताते हैं। आपूर्ति श्रृंखलाएं अभी भी कमजोर हैं, उन्नत विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिभा सीमित है और क्रियान्वयन की समय सीमा अक्सर प्रतिस्पर्द्धी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में धीमी होती है।’
कृषि के संदर्भ में रिपोर्ट ने संरचनात्मक अक्षमताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि कार्य बल का आधा हिस्सा एक ऐसे क्षेत्र पर निर्भर है, जिसका जीडीपी में योगदान बहुत कम है। रिपोर्ट में सिंचाई एवं भंडारण में नए सिरे से सुधार और अधिक निवेश की जरूरत पर जोर दिया गया। बर्नस्टीन ने बढ़ते कल्याणकारी खर्च को दीर्घकालिक विकास पर संभावित नकारात्मक प्रभाव के रूप में भी चिह्नित किया। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘व्यापक, राजनीतिक रूप से निर्धारित नकद योजनाओं में फंसा हुआ रुपया न तो सड़कें बना रहा है और न ही अनुसंधान एवं विकास कर रहा है।’
बाजार के जानकारों का कहना है कि यह राजस्व खर्च से जुड़ी राजकोषीय प्राथमिकताओं पर चल रही व्यापक बहस को दर्शाता है जो खासकर राज्य स्तर पर निवेश आधारित विकास को बाधित कर रहा है। बर्नस्टीन ने कहा कि भारत की महत्त्वाकांक्षाएं उसके निवेश से कहीं अधिक हैं और अनुसंधान एवं विकास पर खर्च जीडीपी का लगभग 0.6-0.7 प्रतिशत है जो वैश्विक मानकों से काफी कम है।
ब्रोकरेज फर्म ने कहा, ‘नवाचार ढांचे के लिए निरंतर पूंजी, उच्च कौशल वाली प्रतिभा और संस्थागत दृढ़ता आवश्यक है।’ ऊर्जा और परिवहन से लेकर अनुसंधान एवं विकास और कराधान तक सभी क्षेत्रों में ब्रोकरेज फर्म ने अधिक निर्णायक नीतिगत कार्रवाई की मांग की और तर्क दिया कि क्रमिक विकास अब पर्याप्त नहीं हो सकता है। बाजार पर्यवेक्षकों ने कहा कि यह पत्र प्रारूप ब्रोकरेज कंपनी को वैश्विक निवेशकों के साथ जुड़ते हुए भारत के विकास मॉडल की स्पष्ट और निष्पक्ष आलोचना प्रस्तुत करने की अनुमति देता है।
एक वरिष्ठ बाजार विशेषज्ञ ने कहा, ‘यह सरकार को सलाह देने से अधिक निवेशकों को जोखिमों के बारे में संकेत देने से संबंधित है।’ वर्ष 2024 में उभरते बाजारों में सबसे पसंदीदा बाजारों में से एक होने के बाद भारत हाल ही में विदेशी ब्रोकरेज फर्मों की प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक गया है। ब्रोकरेज फर्म दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों के प्रति अधिक सकारात्मक रुख अपना रही हैं, जिन्हें एआई आपूर्ति श्रृंखला के प्रमुख लाभार्थी माना जाता है और जो अपेक्षाकृत अधिक आकर्षक मूल्यांकन प्रदान करते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पूंजी, प्रतिभा या महत्त्वाकांक्षा की कमी नहीं है, मगर अब उसे कठिन निर्णय समय रहते लेने की अधिक दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘कार्रवाई करने का अवसर अभी भी मौजूद है, लेकिन यह सिमटता जा रहा है।’
अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक यूआर भट्ट ने कहा, ‘पत्र में की गई सिफारिशें अच्छी और सराहनीय भी हैं, लेकिन हमारे सिस्टम में इनमें से कितनी ऐसी हैं जिन पर फौरन काम शुरू हो सकता है और उनका परिणाम भी दिखे, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।’