पश्चिम एशिया संकट के कारण उपजी ईंधन की किल्लत से निपटने के लिए वैकल्पिक रास्ते भी अपनाए जा रहे हैं। एलपीजी के लिए मारामारी के बीच लोगों ने इंडक्शन हीटर खरीदने शुरू कर दिए हैं, ताकि बिजली से खाना पकाया जा सके। बाजार में लगातार उभरती मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने शुक्रवार को अंतर-मंत्रालयी बैठक में इंडक्शन हीटर और बर्तनों का उत्पादन बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। यह जानकारी मामले से जुड़े दो वरिष्ठ अधिकारियों ने दी।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में ऊर्जा सचिव, विदेश व्यापार महानिदेशक (डीजीएफटी) के सचिव और उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के सचिव सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
एक अधिकारी ने कहा, ‘बैठक में चर्चा के दौरान अधिकारियों ने इंडक्शन हीटर और इसके लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का उत्पादन बढ़ाने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया।’ उन्होंने यह भी कहा कि इन उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है। इसलिए इनका उत्पादन बढ़ाए जाने की आवश्यकता है, ताकि बाजार में उपभोक्ताओं को अनावश्यक आर्थिक चोट न लगे और आसानी से ये बर्तन और चूल्हे उपलब्ध हो सकें।
पिछले कुछ ही दिनों में देश भर में इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री में जबरदस्त वृद्धि हुई है, क्योंकि एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ने के बाद लोग इलेक्ट्रिक चूल्हे पर खाना पकाने के विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। ऑनलाइन मार्केटप्लेस और उपकरण खुदरा विक्रेताओं ने इन उपकरणों एवं इनसे संबंधित बर्तनों के ऑर्डर में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है। उपभोक्ताओं के इंडक्शन स्टोव की तरफ बढ़ते रुझान के कारण कई प्रमुख ऑनलाइन मंचों पर कुछ ही दिनों में बिक्री में कई गुना की वृद्धि दर्ज की गई है।
इंडक्शन चूल्हे की खासियत यह होती है कि इस पर खाना पकाने के लिए विशेष प्रकार की कोडिंग वाले बर्तन ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसलिए जो लोग ईंधन के इस विकल्प को चुनते हैं, उन्हें वे बर्तन भी खरीदने पड़ते हैं। बर्तन और इंडक्शन स्टोव निर्माताओं ने अचानक बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ा दिया है। कई शहरों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि खुदरा विक्रेताओं के यहां लोकप्रिय मॉडल के इंडक्शन चूल्हे और इससे जुड़े बर्तनों का स्टॉक खत्म हो गया है।
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को खतरे में डाल रहा है और युद्ध के बीच हाल के हफ्तों में खाना पकाने वाली गैस यानी एलपीजी की उपलब्धता को लेकर देश भर में चिंताएं बढ़ गई हैं। भारत लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। पिछले एक दशक के दौरान लाखों परिवारों ने खाना पकाने के लिए इस स्वच्छ ईंधन को अपनाया है। यही वजह है कि इसके घरेलू उपयोग में लगातार और तेज वृद्धि दर्ज की गई है।
पेट्रोलियम प्लानिंग ऐंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के आंकड़ों से पता चलता है कि घरेलू एलपीजी की खपत 2016-17 में लगभग 2.1 करोड़ टन से बढ़कर 2024-25 में लगभग 3 करोड़ टन हो गई है। बढ़ती घरेलू मांग और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के कारण एलपीजी की खपत बढ़ी है। भारत अपनी मांग को पूरा करने के लिए एलपीजी के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
पीपीएसी के अनुमान बताते हैं कि देश की लगभग 55-60 प्रतिशत एलपीजी की आवश्यकता विदेशों से पूरी की जाती है। इसमें भी मुख्य रूप से पश्चिम एशिया और अमेरिका से अधिक गैस आती है। इस समय अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के कारण पश्चिम एशिया से आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पैदा हुआ है, क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाली एलपीजी के जहाज मुख्य रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज स्ट्रेट से गुजरते हैं, जिसे ईरान ने बाधित कर रखा है।
हालांकि रणनीतिक प्रयासों से एलपीजी लदे कुछ जहाज सफलतापूर्वक भारत आ गए हैं। कुछ अन्य धीरे-धीरे निकल रहे हैं। लेकिन घरेलू स्तर पर एलपीजी का संकट दिखाई देने लगा है। कई जगह लोगों की शिकायत है कि उन्हें गैस सिलिंडर नहीं मिल रहे हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत के निर्यात में 2025-26 में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें माल और सेवाओं दोनों का विस्तार हुआ है।