अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाएगा। इस वर्ष की थीम ‘प्राप्त करने के लिए दें’ है, जो इस बात पर प्रकाश डालती है कि महिलाओं का समर्थन करना और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना सभी के लिए व्यापक सामाजिक और आर्थिक लाभ के रास्ते खोल सकता है। यह मौका इस पर विचार करने का भी एक क्षण है कि हमारे देश ने लैंगिक समानता के मामले में कितनी प्रगति की है और अब यह कहां खड़ा है। तीन डेटा बिंदुओं का पता चलता है कि अभी लक्ष्य बहुत दूर है। प्रबंधन के मोर्चे पर महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है। उत्पादक और अनुत्पादक कार्यों के बीच दिन के 24 घंटों का असमान वितरण और उत्तर एवं दक्षिण में लैंगिक समझ में अंतर साफ दिखता है।
भारत में प्रबंधन क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी कम होती जा रही है और इस तरह के रुझान दर्शाने वाला यह चार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एकमात्र देश है। इसके उलट प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी के मामले में अमेरिका 2024 में रिकॉर्ड 42.9 प्रतिशत पर पहुंच गया, जबकि भारत 11.7 प्रतिशत पर फिसल गया, जो सात वर्षों में सबसे कम है। वर्ष 2020 में यहां यह हिस्सेदारी 17.2 प्रतिशत पर थी।
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पांच साल के अर्से में समय के उपयोग का विभाजन भी मुश्किल से बदला है। वर्ष 2019 और 2024 के बीच पुरुषों की सशुल्क रोजगार में हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत अंक बढ़ी है जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी में केवल 0.7 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है। अवैतनिक घरेलू काम में महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक काम करती हैं।
उत्तर भारतीयों की तुलना में दक्षिणी भारतीय लोगों में ऐसा कहने की संभावना बहुत कम होती है कि पत्नियों को पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए। फिर भी विरासत संभालने, रोटी बनाने और बच्चों की देखभाल जैसी पारंपरिक भूमिकाओं के लिए वे भी महिलाओं की तरफ ही देखते हैं।