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भारत की ग्रोथ स्टोरी मजबूत, लेकिन कच्चा तेल, महंगाई और ग्लोबल रिस्क से बढ़ा दबाव

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भू-राजनीतिक तनाव, खासकर पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPIs) की लगातार बिकवाली के कारण पिछले तीन महीनों में निफ्टी में करीब 6.6% की गिरावट आई है

Last Updated- April 21, 2026 | 8:38 PM IST
Economy Growth

भारत की लॉन्ग टर्म ग्रोथ की कहानी मजबूत बनी हुई है, लेकिन इसके सामने चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावटें देश की आर्थिक वृद्धि पर दबाव डाल रही हैं। पीएल कैपिटल ने अपनी ‘इंडिया स्ट्रैटेजी रिपोर्ट’ में कहा है कि भारत की विकास यात्रा अब एक मुश्किल दौर में पहुंच रही है। भले ही अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार मजबूत हैं, लेकिन बाहरी जोखिम बढ़ने के कारण कमाई के अनुमानों में कटौती की जा रही है।

निफ्टी पर दबाव, कमाई में हल्का सुधार

रिपोर्ट के मुताबिक, भू-राजनीतिक तनाव, खासकर पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPIs) की लगातार बिकवाली के कारण पिछले तीन महीनों में निफ्टी में करीब 6.6% की गिरावट आई है। हालांकि बाजार ने हाल ही में अपने निचले स्तर से अच्छी रिकवरी दिखाई है, लेकिन वैश्विक जोखिम और कमोडिटी की बढ़ती कीमतों की वजह से बाजार का रुख अभी भी अस्थिर बना हुआ है।

वैल्यूएशन के लिहाज से, निफ्टी फिलहाल एक साल के फॉरवर्ड अर्निंग मल्टीपल के लगभग 17 गुना पर कारोबार कर रहा है, जो इसके 15 साल के औसत 19.4 गुना से करीब 12.4% कम है। बेस केस अनुमान में वैल्यूएशन 17.5 गुना रहने की उम्मीद है, यानी ऐतिहासिक औसत से लगभग 10% की छूट। वित्त वर्ष 2028 की प्रति शेयर आय (EPS) 1,551 रुपये के आधार पर इसका टार्गेट प्राइस करीब 27,080 तय किया गया है।

कमाई के अनुमान में हल्का सुधार देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2026 में निफ्टी की प्रति शेयर आय (EPS) में लगभग 4% की बढ़ोतरी का अनुमान है। वहीं मध्यम अवधि में वित्त वर्ष 2026 से 2028 के बीच करीब 15% की सालाना वृद्धि की उम्मीद जताई गई है।

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कच्चा तेल बना सबसे बड़ी चिंता

भारत के व्यापक आर्थिक माहौल में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं, क्योंकि देश अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। अगर तेल की कीमतें बढ़ती रहती हैं, तो आयात बिल में हर साल 70 अरब डॉलर से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे महंगाई 5% से ऊपर जाने का जोखिम बढ़ जाता है। इसके साथ ही, सप्लाई चेन में रुकावट और अल नीनो के कारण कमजोर मॉनसून की आशंका भी महंगाई को और बढ़ा सकती है। फिलहाल भारत की GDP ग्रोथ करीब 6.5% है, लेकिन यह घटकर लगभग 6% तक आ सकती है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है और इनके पुराने (युद्ध-पूर्व) स्तर पर लौटने की संभावना कम मानी जा रही है। भारत रोजाना करीब 43 लाख बैरल तेल आयात करता है, जिसकी सालाना लागत लगभग 180 अरब डॉलर है। अगर कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो देश का आयात बिल 70 अरब डॉलर से भी ज्यादा बढ़ सकता है। हालांकि, सप्लाई स्रोतों में विविधता लाने और वैकल्पिक रास्तों की तलाश से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग अभी भी बड़े जोखिम बने रहेंगे।

जीडीपी के मुकाबले तेल और गैस आयात की हिस्सेदारी कम होने की वजह से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर पहले के झटकों की तुलना में थोड़ा कम रहने की उम्मीद है। हालांकि, बढ़ती माल ढुलाई और बीमा लागत के साथ-साथ सीमित रिफाइनिंग क्षमता के कारण तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। पीएल कैपिटल के विश्लेषकों का मानना है कि इससे आने वाले महीनों में महंगाई, मांग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

कॉर्पोरेट ग्रोथ मजबूत, मार्जिन पर हल्का दबाव

निकट अवधि में कॉर्पोरेट प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है और वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में सभी क्षेत्रों में मांग लगातार बनी रही। कंपनियों का रेवेन्यू, एबिटा और मुनाफा क्रमशः 11.3%, 6.3% और 5.7% बढ़ने का अनुमान है। ऑटोमोबाइल, मेटल्‍स, टेलीकॉम, एनबीएफसी, हेल्थकेयर और निर्माण क्षेत्र विकास में उल्लेखनीय योगदान दे सकते हैं। वहीं उपभोग, आईटी सेवाएं और मीडिया जैसे क्षेत्रों से स्थिर दहाई अंकों की वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि इनपुट कीमतें बढ़ने से मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है और ज्यादातर क्षेत्रों में मुनाफा कम हो रहा है।

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घरेलू मांग मजबूत, मौसम बना चुनौती

घरेलू मांग स्थिर बनी हुई है, जिसे ग्रामीण क्षेत्र की मजबूती और शहरी मांग में सुधार का सहारा मिल रहा है। जीएसटी के आसान बनाने, पिछली तिमाहियों में कम महंगाई और स्थिर ब्याज दरों ने उपभोग के रुझान में सुधार में मदद की है। लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, महंगाई और प्रतिकूल मौसम जैसे द्वितीयक प्रभाव भविष्य की मांग को सीमित कर सकते हैं।

स्काईमेट और अन्य मौसम एजेंसियों ने आगामी मॉनसून सीजन में अल नीनो की संभावना जताई है और बारिश दीर्घकालिक औसत के 94% यानी सामान्य से कम रहने का अनुमान है। पूर्वानुमान के अनुसार मॉनसून की गतिविधि सीजन के दौरान धीरे-धीरे कमजोर पड़ेगी और उत्तर, पश्चिम व मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सूखे का खतरा बढ़ेगा। आर्थिक नजरिये से यह खरीफ उत्पादन, जलाशयों के स्तर, खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग के लिए चिंता का विषय है।

इन सेक्टर्स पर रखें नजर

पूंजीगत व्यय (Capex) विकास का एक प्रमुख इंजन बना रहेगा। सरकार का निवेश डिफेंस, डेटा सेंटर, हाई-स्पीड रेल, रिन्यूएबल एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर जैसे क्षेत्रों में लगातार जारी रहेगा। भू-राजनीतिक तनाव के चलते डिफेंस सेक्टर पर खास फोकस है, जिससे कैपिटल गुड्स और डिफेंस सेक्टर में मजबूत ऑर्डर फ्लो देखने को मिल रहा है।

बैंकिंग सेक्टर में भी लोन ग्रोथ में सुधार हो रहा है, जो फिलहाल लगभग 14.3% के स्तर पर है। इसमें MSME, ऑटो लोन और NBFC सेक्टर का अहम योगदान है। हालांकि, बढ़ती महंगाई और सीमित लिक्विडिटी बैंकिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकते हैं। साथ ही, रीपो रेट और सरकारी बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर यह दर्शाता है कि मौद्रिक स्थितियां अभी भी सख्त बनी हुई हैं।

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भारत की नींव मजबूत

पीएल कैपिटल के को-हेड इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज अम्‍नीश अग्‍गरवाल ने कहा, “भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक व्यापक आर्थिक माहौल को बेहद अनिश्चित बना दिया है। हालांकि लंबी अवधि के नजरिये से भारत की विकास की बुनियाद मजबूत दिखती है, लेकिन महंगाई, ब्याज दरों की चिंता और विदेशी मांग से जुड़ी निकट अवधि की चुनौतियां आर्थिक विकास पर असर डाल सकती हैं। मौजूदा बाजार मूल्यांकन इन प्रतिकूलताओं को पहले से दर्शा रहा है, लेकिन अगर उथल-पुथल लंबे समय तक बनी रही तो कमाई के अनुमानों में और कटौती हो सकती है। बहरहाल, इंफ्रास्ट्रक्चर में बढ़ते निवेश, औद्योगिक उत्पादन और बैंकिंग सिस्टम की स्थिरता जैसे अनुकूल घरेलू फैक्टर टिकाऊ विकास की नींव बनाए रखेंगे।”

इन सेक्टर्स में सतर्कता बरतने की जरूरत

क्षेत्रवार नजरिये से कैपिटल गुड्स, डिफेंस, हेल्थकेयर, बैंकिंग, टेलीकॉम और मेटल्‍स के प्रति पॉजिटिव रुख बना हुआ है, जिसे मजबूत ऑर्डर बुक, घरेलू मांग और अनुकूल रुझानों का समर्थन प्राप्त है। घरेलू उपभोग पर निर्भर क्षेत्र जैसे पावर यूटिलिटीज, एनबीएफसी, ज्वेलरी और फार्मा भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। हालांकि वैश्विक जोखिमों और मार्जिन दबाव को देखते हुए आईटी सेवाओं, निर्यात-निर्भर क्षेत्रों, सीमेंट, रसायन और तेल एवं गैस में सतर्कता बरतने की जरूरत है।

रिपोर्ट कहती है कि भारत की मजबूत घरेलू बुनियाद, बेहतर होता इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और विकसित होते मैन्युफैक्चरिंग माहौल के चलते देश की विकास गाथा आगे भी अच्छी बनी रहेगी, लेकिन कुछ अल्पकालिक जोखिमों पर नजर रखनी होगी, जिनमें भू-राजनीतिक जोखिम, महंगाई का खतरा, अल नीनो का असर और वैश्विक अर्थव्यवस्था में समग्र सुस्ती शामिल हैं। ऐसे में नया विकास चक्र इस बात पर निर्भर करेगा कि ये जोखिम किस हद तक संतुलित होते हैं।

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First Published - April 21, 2026 | 8:38 PM IST

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