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आर्टेमिस 2 मिशन और भारत का कनेक्शन: चांद की रेस में कैसे साथ दे रहे हैं भारतीय दिग्गज?

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आर्टेमिस 2 मिशन में लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसे वैश्विक साझेदारों के माध्यम से भारत का रक्षा और एरोस्पेस क्षेत्र चंद्रमा की इस ऐतिहासिक यात्रा में अहम भूमिका निभा रहा है।

Last Updated- April 05, 2026 | 10:01 PM IST
Artemis 2
नासा के अंतरिक्ष यात्री और आर्टेमिस 2 के कमांडर रीड वाइजमैन द्वारा ओरियन अंतरिक्ष यान की खिड़की से ली गई पृथ्वी की एक तस्वीर | फोटो: NASA

आर्टेमिस2 मिशन लगातार आगे बढ़ता जा रहा है। इसका ओरियन अंतरिक्ष यान पांच दशकों में पहली बार चार अंतरिक्ष यात्रियों के साथ पृथ्वी के जाने-पहचाने माहौल को पीछे छोड़कर चंद्रमा की परिक्रमा करने जा रहा है। माना जा रहा है कि इस अभियान से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी और भी बढ़ेगी।

हालांकि, भारत प्रत्यक्ष रूप से इस मिशन का हिस्सा नहीं है मगर कुछ भारतीय आर्टेमिस 2 टीम का हिस्सा जरूर हैं। दस दिन की इस चंद्र यात्रा में भारत का जुड़ाव यहीं तक सीमित नहीं है। वर्ष 1972 के बाद इस पहले चंद्र मिशन में अमेरिका और यूरोप के 2,700 से अधिक आपूर्तिकर्ता शामिल हैं। दिलचस्प यह है कि इनमें कई कंपनियों के भारत में बड़े व्यावसायिक हित हैं। इससे भी अहम बात यह है कि शीर्ष चार कंपनियां लॉकहीड मार्टिन, बोइंग, नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन और एयरबस भारत के एरोस्पेस और रक्षा क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं और भारत को वैश्विक स्रोत और विनिर्माण केंद्र के रूप में उपयोग कर रही हैं।

भारतीय अंतरिक्ष संघ (आईपीएसए) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) ए के भट्ट ने कहा,‘यह मिशन अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के विस्तार के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है जो नए उद्योगों और प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देता है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि निजी क्षेत्र के आपूर्तिकर्ता उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं जो 50 साल पहले की स्थिति से बिल्कुल अलग है।’भट्ट ने कहा कि भारत से कोई बड़ा आपूर्तिकर्ता नहीं आया है।

ओरियन अंतरिक्ष यान के प्रमुख कॉन्ट्रैक्टर लॉकहीड मार्टिन की भारत के रक्षा क्षेत्र में कंपनी की गहरी रुचि है। कंपनी की भारत में तीन दशकों से अधिक की उपस्थिति है और इसकी भारतीय इकाई शाखा का आदर्श वाक्य भी है,‘भारत के लिए, भारत से, दुनिया के लिए’। पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद कंपनी ने भारतीय वायु सेना (आईएएफ) में अपने विशेष रूप से निर्मित एफ 21 लड़ाकू विमानों को शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा था। भारतीय वायु सेना के पास 12 सी-130 जे विमानों का बेड़ा है जिनकी बदौलत भारत दुनिया के उन 22 देशों में शामिल हो गया है जो सामरिक हवाई परिवहन अभियानों के लिए सुपर हरक्यूलिस विमान का चयन करते हैं। भारतीय वायु सेना का सी-130जे बेड़ा 40 से अधिक वर्षों में अमेरिका और भारत के बीच पहला बड़ा सैन्य अनुबंध है।

भारत का सी-130जे से संबंध केवल उसके सुपर हरक्यूलिस बेड़े तक ही सीमित नहीं है। टाटा लॉकहीड मार्टिन एरोस्ट्रक्चर्स लिमिटेड (टीएलएमएएल) संयुक्त उद्यम (जो सभी नए सुपर हरक्यूलिस विमानों में शामिल सी-130जे एम्पेनेज असेंबली का एकमात्र वैश्विक आपूर्तिकर्ता है) भी इसका गहरा जुड़ाव रखती है।

हैदराबाद स्थित टीएलएमएएल, ‘मेक इन इंडिया’ के उद्देश्यों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और 2010 में परिचालन शुरू करने के बाद से इसने लगभग 200 एम्पेनेज की आपूर्ति की है। एमएच -60 आर अमेरिकी सरकार की विदेशी सैन्य बिक्री के समर्थन में भारत में लॉकहीड मार्टिन का सबसे बड़ा कार्यक्रम है। एमएच-60आर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारतीय नौसेना को खूब ताकत देता है।

दूसरी ओर ओरियन यूरोपियन सर्विस मॉड्यूल (ईएसएम-2) अंतरिक्ष में चार अंतरिक्ष यात्रियों के जीवित रहने के लिए आवश्यक प्रणोदन, शक्ति, तापीय नियंत्रण और हवा एवं पानी प्रदान करता है। ईएसएम का निर्माण यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) की ओर से एयरबस द्वारा किया गया है। जब ओरियन चंद्रमा के पीछे से गुजरेगा तो आर्टेमिस 2 के चालक दल पृथ्वी से अब तक सबसे लंबी दूरी तक पहुंचने का अपोलो 13 का रिकॉर्ड तोड़ देंगे।

कंपनी ने पिछले सप्ताह एक बयान में कहा, ‘एयरबस पहले ही इस मिशन से आगे की योजना बना रही है। 2027 में ईएसएम-3, ओरियन और वाणिज्यिक अंतरिक्ष यानों के बीच मिलन और डॉकिंग क्षमताओं का परीक्षण करेगा जो अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतारने के लिए आवश्यक हैं। 2028 में ईएसएम-4 (जो आर्टेमिस 4 के चंद्र लैंडिंग में सहायक होगा) वर्तमान में कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र (केएससी) में अंतिम एकीकरण प्रक्रिया से गुजर रहा है।

एयरबस की भारत में महत्त्वपूर्ण उपस्थिति है। कंपनी के विभिन्न स्थानों पर 3,600 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। अपनी आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से 15,000 से अधिक नौकरियां चलाने वाली एयरबस वैश्विक निर्यात के लिए प्रति वर्ष 1 अरब यूरो से अधिक के घटकों और सेवाओं की सोर्सिंग कर भारत के आर्थिक विकास में योगदान देती है।

पिछले साल अक्टूबर में कंपनी के बोर्ड ने कथित तौर पर पहली बार नई दिल्ली में एक ऑफ-साइट बैठक आयोजित की थी। उस समय ऐसी खबरें आई थीं कि इंडिगो और टाटा समूह जैसी भारतीय दिग्गज कंपनियों ने पिछले साल संयुक्त रूप से अपने ऑर्डर बुक का नेतृत्व किया था।

बोइंग की बात करें तो भारत में इसकी उपस्थिति आठ दशकों से भी अधिक समय से और भी अधिक मजबूत है। नासा के स्पेस लॉन्च सिस्टम रॉकेट ने बोइंग द्वारा निर्मित कोर स्टेज के बल पर उड़ान भरी और उड़ान के लगभग साढ़े आठ मिनट बाद अलग हो गया जिससे ओरियन अंतरिक्ष यान चार चालक दल के सदस्यों के साथ चंद्रमा के चारों ओर 10 दिवसीय मिशन शुरू कर सका। भारत में बोइंग के 7,000 से अधिक कर्मचारी हैं और आपूर्ति श्रृंखला में 300 से अधिक कंपनियों सहित 13,000 अन्य लोग कार्यरत हैं। भारत से इसकी सालाना खरीद लगभग 1.25 अरब डॉलर की है। इसकी वेबसाइट के अनुसार कंपनी द्वारा निर्मित 65 से अधिक रक्षा विमान और 200 से अधिक हवाई जहाज वर्तमान में भारत में उड़ान भर रहे हैं। इसने अपने बेंगलुरु परिसर में 20 करोड़ डॉलर का निवेश भी किया है।

नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन भारत को विभिन्न रक्षा और नागरिक अनुप्रयोगों में सहयोग प्रदान करती है जिनमें हवाई यातायात नियंत्रण संचार प्रणाली और रडार, भारतीय सेना के लिए मानवरहित जमीनी वाहन और भारतीय नौसेना के लिए समुद्री नेविगेशन प्रणाली शामिल हैं। नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन ने ओरियन अंतरिक्ष यान के लॉन्च एबॉर्ट सिस्टम (एलएएस) के लिए लॉन्च एबॉर्ट मोटर और एटीट्यूड कंट्रोल मोटर का निर्माण किया।

थेल्स एलेनिया स्पेस ने ईएसएम के लिए थर्मोमैकेनिकल सिस्टम विकसित और निर्मित किए। पिछले वर्ष थेल्स ने एनआईबीई स्पेस (एनआईबीई लिमिटेड की एक सहायक कंपनी) के साथ एक उच्च-रिजॉल्यूशन ऑप्टिकल उपग्रह की आपूर्ति के लिए एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जो एनआईबीई की पृथ्वी अवलोकन तारामंडल परियोजना में पहला कदम था।

हालांकि, इस मिशन में योगदान देने वाले कई अन्य कंपनियों के भी भारत से संबंध हैं मगर भारतीय बाजार में नासा के इन प्रमुख भागीदारों की व्यापक उपस्थिति यह दर्शाती है कि देश का एरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र निश्चित रूप से विकास के पथ पर अग्रसर है।

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First Published - April 5, 2026 | 10:01 PM IST

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