भारत का नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) क्षेत्र आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार के लिए तैयार है। नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार अब केवल बिजली उत्पादन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत में नए रियल एस्टेट ग्रोथ कॉरिडोर तैयार करने जा रहा है। सरकार की मजबूत नीतियां, सौर (Solar) और पवन (Wind) ऊर्जा में बढ़ते निवेश, और नेट ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में उठाए जा रहे ठोस कदम इस रफ्तार की मुख्य वजह हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता कितनी और बढ़ने की संभावना ?
कॉलियर्स इंडिया की रिपोर्ट ‘The Green Shift: Renewable Prioritization Reshaping Indian Real Estate’ के अनुसार साल 2025 तक देश की स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता लगभग 251 गीगावॉट (GW) पहुंच चुकी है। नवीकरणीय और परमाणु ऊर्जा को मिलाकर गैर-जीवाश्म स्रोत कुल स्थापित क्षमता का करीब 51% हो चुके हैं। 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य की दिशा में भारत मजबूत स्थिति में दिख रहा है। इस समय करीब 146 GW की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं, जबकि 2030 तक सौर और पवन में 270–300 GW नई क्षमता जुड़ने का अनुमान है। इस ऊर्जा विस्तार का सीधा लाभ रियल एस्टेट सेक्टर को मिलने वाला है।
India’s renewable energy capacity (2025)
|
Source
|
Installed capacity (GW)
|
Share (%)
|
Under-construction capacity (GW)
|
Share (%)
|
| Solar |
135.5
|
54%
|
93.7
|
64%
|
| Wind (Onshore) |
54.5
|
22%
|
26.3
|
18%
|
| Others |
60.5
|
24%
|
25.8
|
18%
|
| Total |
250.5
|
100%
|
145.8
|
100%
|
Source: Niti Ayog, IRENA, Colliers
जमीन में 10–15 अरब डॉलर निवेश का अवसर
इस रिपोर्ट के अनुसार आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 110–120 अरब डॉलर निवेश आने का अनुमान है। सौर और पवन परियोजनाओं की कुल लागत का 10–12% हिस्सा जमीन के एकत्रीकरण और अधिग्रहण पर खर्च होता है। सोलर पार्क के लिए बड़े भू-भाग निजी डेवलपर्स या सरकारी नोडल एजेंसियां जुटाती हैं। विंड प्रोजेक्ट्स में जमीन मुख्यतः सबस्टेशन व इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए खरीदी, जबकि टरबाइन क्षेत्र लीज पर लिया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक केवल लैंड एग्रीगेशन में ही 10–15 अरब डॉलर निवेश का अवसर बन सकता है।
कितनी जमीन की जरूरत?
इस रिपोर्ट के अनुसार सौर और पवन क्षमता में 270–300 GW की बढ़ोतरी के साथ देशभर में लगभग 7 लाख एकड़ जमीन की मांग उत्पन्न होगी। इससे कई राज्यों में बड़े लैंड पार्सल्स की मांग बढ़ेगी और रियल एस्टेट कंपनियों के लिए वैल्यू क्रिएशन के मौके बनेंगे। कॉलियर्स इंडिया के सीईओ और एमडी बादल याग्निक ने कहा कि 2030 तक सौर और पवन परियोजनाओं के लिए लगभग 7 लाख एकड़ जमीन की जरूरत होगी, जिससे लैंड एग्रीगेशन में 10–15 अरब डॉलर निवेश के अवसर खुलेंगे। नवीकरणीय ऊर्जा नए ग्रोथ कॉरिडोर और निवेश गंतव्य भी विकसित करेगी।
Solar & wind energy outlook (2026-2030F)
|
Solar
|
Wind
|
Total
|
|
Capacity Additions
|
~270 GW
|
~20 GW
|
~270-300 GW
|
|
Land Requirement
|
~650,000+ acres
|
~15,000 acres
|
~700,000 acres
|
|
Overall Investments
|
USD 95-105 Billion
|
USD 5-20 Billion
|
USD 110-120 Billion
|
|
Investments in Land
(Part of overall investments)
|
USD 10-12 Billion
|
USD 1-2 Billion
|
USD 10-15 Billion
|
Source: Colliers
OEM कंपनियों से वेयरहाउसिंग मांग में उछाल
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021-25 के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा OEM कंपनियों ने शीर्ष 8 शहरों में 61 लाख वर्गफुट ग्रेड A इंडस्ट्रियल-वेयरहाउसिंग स्पेस लिया। इनकी हिस्सेदारी कुल मांग में 3% से बढ़कर 8% हो गई। कॉलियर्स इंडिया में रिसर्च हेड विमल नादर कहते हैं कि 2025 में OEM की वार्षिक लीजिंग 30 लाख वर्गफुट पहुंची। चेन्नई और पुणे पसंदीदा शहर बने। 2030 तक यह मांग 40–70 लाख वर्गफुट सालाना हो सकती है, जो कुल मांग का 10–15% होगा। यह वृद्धि सोलर पीवी मॉड्यूल, विंड टरबाइन, बैटरी स्टोरेज, सेमीकंडक्टर्स आदि के घरेलू निर्माण के विस्तार से जुड़ी है।
Trends in industrial & warehousing space uptake by renewable energy OEMs
|
Year
|
Leasing by renewable energy OEMs (million sq ft)
|
Share in overall leasing (%)
|
| 2021 |
0.8
|
3%
|
| 2022 |
0.2
|
1%
|
| 2023 |
1.0
|
4%
|
| 2024 |
1.1
|
4%
|
| 2025 |
3.0
|
8%
|
| 2026-2030F |
~4.0 – 7.0
|
10 – 15%
|
Source: Colliers
टियर-II/III शहरों में हाउसिंग, ऑफिस और टाउनशिप की मांग
इस रिपोर्ट के मुताबिक नवीकरणीय ऊर्जा में संभावित तेज निवेश केवल भूमि, औद्योगिक शेड और वेयरहाउस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह रियल एस्टेट के कई अन्य खंडों में भी मांग को बढ़ाएगा। नवीकरणीय ऊर्जा हब वाले क्षेत्रों में किफायती आवास, किराये के मकान और औद्योगिक टाउनशिप की आवश्यकता बढ़ने की संभावना है। साथ ही, विनिर्माण इकाइयों और संचालन व रखरखाव (O&M) केंद्रों की निरंतर वृद्धि से देश के टियर-II और टियर-III शहरों में कार्यालय स्थान, प्रशिक्षण सुविधाओं और स्थानीय सेवा पारिस्थितिकी तंत्र की मांग को भी बल मिलेगा।