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‘करण फ्राइज’ नई नस्ल की गाय: रोज 11 से 19 किलो दूध, डेरी सेक्टर में बड़ा बदलाव

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एनडीआरआई करनाल द्वारा विकसित सिंथेटिक नस्ल ‘करण फ्राइज’ को मिला पंजीकरण, स्वदेशी थारपारकर और होल्स्टीन फ्राइजियन का अनोखा मिश्रण

Last Updated- January 15, 2026 | 9:29 AM IST
Karan Fries cow breed
इस नस्ल में होल्स्टीन फ्राइजियन गाय की अधिक दूध देने की क्षमता और थारपारकर गाय की मजबूत व सहनशील विशेषताओं को जोड़ा गया है।

Karan Fried Cow Breed: ‘करण फ्राइज’ नाम शायद अनसुना सा लगे, लेकिन आने वाले समय में डेरी उद्योग में कुछ बड़ा बदलाव लाकर यह पशुपालकों और कृषि विशेषज्ञों को चौंका सकता है। यह गायों की एक सिंथेटिक नस्ल है, जो प्रत्येक सीजन (लगभग 10 महीने) के दौरान औसतन 3,550 किलो दूध देती है। इनमें सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली गायें सीजन के कुल 305 दिनों में लगभग 5,851 किलोग्राम तक दूध दे सकती है। इस तरह एक दुधारू सीजन में ये गायें प्रतिदिन कुल 11 से 19 किलो और दूध देती हैं, जिसकी अधिकतम उपज 46.5 किलो है। भारतीय प्रबंधन प्रणालियों के तहत यह उल्लेखनीय आनुवंशिक क्षमता को दर्शाती है।

नैशनल डेरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनडीआरआई), करनाल द्वारा होल्स्टीन फ्राइजियन और भारत की स्वदेशी जेबू नस्ल की थारपरकर गायों के बीच प्रजनन कराकर करण फ्राइज नाम की यह नई नस्ल तैयार की गई है। होल्स्टीन फ्राइजियन नस्ल पहले से ही अपनी बेहतर उपज के लिए विश्व स्तर पर विख्यात है जबकि थारपरकर गायें अपनी मजबूत और कठोर प्रकृति के लिए जानी जाती हैं।

भारत की स्वदेशी नस्लों की औसत दूध उपज 3 से 4 किलो प्रति दिन होती है, जबकि विदेशी नस्लों में यह 8.12 से 9 किलो प्रति दिन तक जाती है। स्वदेशी नस्लों की गायें आमतौर पर एक दूधारू सीजन में 1,000 से 2,000 किलो के बीच दूध देती हैं।

Karan Fries Cow Breed को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो द्वारा बुधवार को आयोजित एक कार्यक्रम में पंजीकरण प्रमाण पत्र दिया। इसके साथ एक और अधिक उपज वाली सिंथेटिक गाय की नस्ल ‘वृंदावनी’ तथा 16 अन्य पशुधन और कुक्कुट नस्लों को भी प्रमाण मत्र दिए गए। इस तरह देश में पंजीकृत पशुधन और कुक्कुट नस्लों की कुल संख्या 246 हो गई है, जिनमें 242 स्वदेशी और चार सिंथेटिक हैं।

इस कार्यक्रम में जिन 16 नई नस्लों को पंजीकरण प्रमाण पत्र मिला, उनमें से 14 स्वदेशी हैं, जिनमें झारखंड और उत्तर प्रदेश की मेदिनी और रोहिखंडी मवेशी, महाराष्ट्र की मेलघाटी भैंस, पालमू (झारखंड) और उदयपुरी (उत्तराखंड) जैसी बकरियां तथा नागालैंड के नागामी जैसे मिथुन शामिल हैं। इस सूची में माला चिकन (झारखंड), कुडू बत्तख (झारखंड), कुडू बत्तख (ओडिशा), कुट्टनड बत्तख (केरल), मणिपुरी बत्तख (मणिपुर), नागी बत्तख (असम) और राजदिघेली हंस (असम) जैसी कुक्कुट और जलपक्षी किस्में भी हैं। राजस्थान से एक सिंथेटिक भेड़ नस्ल अविशान को भी पंजीकृत किया गया है।

हरियाणा के करनाल में राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित करण फ्राइज नस्ल को स्वदेशी थारपारकर गायों और होल्स्टीन-फ्राइजियन बैलों के बीच प्रजनन प्रक्रिया से तैयार किया गया है। इसी तरह वृंदावनी नस्ल को उत्तर प्रदेश के बरेली में आईसीएआर-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) द्वारा विकसित किया गया है। यह नस्ल होल्स्टीन-फ्राइजियन, ब्राउन स्विस और जर्सी के साथ स्वदेशी हरियाना मवेशियों का मिश्रण है।

एनडीआरआई करनाल के एक बयान में कहा गया है, ‘कई पीढ़ियों के अंतःप्रजनन के बाद करण फ्राइज अब परिपक्व नस्ल हो गई है, जिसमें होल्स्टीन फ्राइजियन गाय की उत्पादकता को थारपारकर गाय की विशेषताओं को शामिल किया गया है।’

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First Published - January 15, 2026 | 9:21 AM IST

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