नई दिल्ली की तंग गलियों से लेकर कारखानों तक ईरान युद्ध की वजह से एलपीजी की किल्लत का असर लोगों के जीवन और उनकी आजीविका पर साफ दिखने लगा है। इस मुसीबत के कारण जो लोग अपने गांव-घर छोड़कर शहरों में गुजर-बसर करने आए थे उनके सामने वापस लौटने की नौबत आ गई है। हालात इस कदर बदल गए हैं कि कुछ कंपनियां श्रमिकों को टिकाए रखने या उन्हें बुलाने के लिए अपने स्तर पर तमाम प्रयास कर रही हैं।
टैक्सी चलाकर जीवन यापन करने वाले राकेश यादव कहते हैं कि साधारण भोजन भी महंगा हो गया है। उन्होंने कहा, ‘एक टाइम का जो खाना 100 रुपये में मिल रहा था, अब 120 रुपये में मिल रहा है। अगर कीमतें यूं बढ़ती रहीं तो मेरे पास गांव लौटने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।’कुछ लोगों के लिए यह नौबत आ भी चुकी है। खाने की डिलिवरी करने वाले गोपाल ऑर्डर लगातार कम होने और रोजाना कमाई 1,600 रुपये से घटकर 450 से 500 रुपये रह जाने के बाद कुछ समय के लिए अपने गृह नगर लौट गए थे।
उनका कहना है कि एलपीजी की कमी के कारण रेस्तरां बंद होने या कारोबार सुस्त होने के कारण उन्हें घर लौटने पर विवश होना पड़ा था। हालांकि, वह अब दिल्ली लौट आए हैं मगर काम कहीं मिल नहीं रहा है जिससे गुजारा करना एक चुनौती साबित हो रही है। जब गिग और संविदा कर्मचारी (कॉन्ट्रैक्ट वर्कर) अपने घर वापस लौटने लगे तो कारोबार-धंधे के लिए भी चुनौतियां और बढ़ गईं।
लॉजिस्टिक कंपनी एमिजा के संस्थापक एवं सीईओ अजय राव का कहना है कि कंपनी को अनुमानित कर्मचारियों की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत की कमी का सामना करना पड़ रहा है। वे कहते हैं,‘इस समस्या से निपटने के लिए हमने उपस्थिति बोनस और भर्ती शिविर आयोजित करने जैसे कई उपाय किए हैं।’
पश्चिम एशिया से एलपीजी का परिवहन ठप या कम होने से कारखानों के भोजनालय (कैंटीन) में खान-पान की किल्लत हो गई है। ये भोजनालय संविदा श्रमिकों के लिए काफी अहम होते हैं। ये श्रमिक ( जो आमतौर पर कम वेतन पर काम करते हैं) दिन में कम से कम दो बार कारखानों की कैंटीन में ही खा लेते हैं।
वाहन क्षेत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि कैंटीन सेवाओं में किसी भी तरह की रुकावट श्रमिकों की उपस्थिति और उत्पादकता को सीधे प्रभावित कर सकती है। 13 मार्च को सोसाइटी ऑफ इंडियन
ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सायम) ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को लिखे एक पत्र में यह मुद्दा उठाया था। इनमें कई श्रमिकों के पास घरों में घरेलू एलपीजी कनेक्शन की सुविधा नहीं है। इसके बजाय वे लगभग 4.0 से 4.5 किलोग्राम क्षमता वाले छोटे एवं अनौपचारिक सिलिंडरों पर निर्भर रहते है। दुकानदार इन छोटे सिलिंडरों को औपचारिक 14 किलोग्राम के सिलिंडरों से भरते हैं। एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इन स्थानीय रिफिल चैनलों को एलपीजी की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।
उन्होंने कहा,‘कार्य स्थल और घरों दोनों जगह खाना पकाने के ईंधन की उपलब्धता पर दबाव के कारण औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों के लिए अपना जीवन यापन करना मुश्किल हो सकता है। इससे उल्टा पलायन हो सकता है।’वाहन क्षेत्र के ही एक अन्य प्रतिनिधि ने कहा कि हालात कोविड-19 की तरह ही होते जा रहे हैं।
इस तरह के घटनाक्रम से श्रम की कमी और बढ़ सकती है और उत्पादन कार्यक्रम बाधित हो सकते हैं, खासकर श्रम पर अधिक निर्भर उन कार्यों में जहां संविदा श्रमिक उत्पादन तंत्र में अहम भूमिका निभाते हैं।
श्रमिक प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि यह केवल एक अस्थायी व्यवधान नहीं है बल्कि एक संरचनात्मक कमजोरी है। गिग वर्कर्स एसोसिएशन के आयोजन सचिव नितेश कुमार दास ने कहा कि गिग अर्थव्यवस्था इस तरह के झटकों को झेलने में समर्थ नहीं है। दास ने कहा,‘गिग कर्मी न केवल अपनी आय से हाथ धो रहे हैं बल्कि घोर संकट में फंसते जा रहे हैं।’
इस बीच, एक देखभाल सेवा कंपनी के एक अधिकारी ने बताया कि मुंबई में एलपीजी की कमी के कारण उनके नेटवर्क के 100 से अधिक श्रमिक (जिनमें से कई मथुरा के हैं) अपने घर लौट आए हैं। जीवन यापन की लागत में भारी वृद्धि हुई है, दिहाड़ी मजदूरों के लिए साधारण भोजन का इंतजाम कर पाना भी मुश्किल हो गया है क्योंकि थाली की कीमतें बढ़कर 150-200 रुपये तक हो गई हैं।
हालांकि, मुंबई के रियल एस्टेट क्षेत्र पर इसका सीमित प्रभाव पड़ा है। पैराडाइम रियल्टी के पार्थ के मेहता ने कहा,‘बड़े पैमाने पर पलायन की कोई खबर नहीं है क्योंकि बड़े निर्माण स्थलों पर ज्यादातर निर्माण मजदूर मेस सुविधाओं पर निर्भर हैं। डेवलपर काम निर्बाध रूप से जारी रखने के लिए सभी एहतियाती कदम उठा रहे हैं।’
राष्ट्रीय स्ट्रीट वेंडर्स एसोसिएशन के पूर्व सदस्य राजेश कुमार कहते हैं कि वेंडर कोविड जैसे संकट से बचने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। कुमार ने कहा, ‘उन्हें सिलिंडरों के लिए 200 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है या फिर अपनी दुकानें बंद करनी पड़ रही हैं।’
दिल्ली के मोहल्ले के बाजारों में यह आशंका दिखाई भी देने लगी है। टाउन वेंडिंग कमेटी के गिरेंद्र पंडित कहते हैं कि एक ही क्षेत्र में भी कुछ वेंडर पहले ही बिहार लौट चुके हैं और हो सकता है कि और लोग भी ऐसा करें।
ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं मगर वेंडर ग्राहकों को बनाए रखने के लिए कीमतें एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ा सकते। उदाहरण के लिए एक पकौड़ा 20 रुपये से अधिक में नहीं बिक सकता चाहे उसकी उत्पादन लागत कितनी भी अधिक क्यों न हो। भीकाजी कामा प्लेस में चाय विक्रेता भरत कहते हैं कि अब उन्हें 1 किलोग्राम सिलिंडर के लिए 300 रुपये देने पड़ रहे हैं जो कभी 90 रुपये में मिल जाता था। भरत ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के दौरों के बावजूद उन्हें कोई खास मदद नहीं मिल रही है। हालांकि, कई लोगों के लिए पारिवारिक और आर्थिक प्रतिबद्धताओं के कारण शहर छोड़ना आसान विकल्प नहीं है।
दूसरे लोग इतने सक्षम नहीं हैं। एक अन्य चाय विक्रेता सलीम अली खपत कम करना शुरू कर दिया है। वह कहते हैं,‘पहले मैं हफ्ते में दो सिलिंडर इस्तेमाल करता था। अब एक सिलेंडर मिलना भी मुश्किल हो गया है।’ उन्होंने कहा कि प्रति किलोग्राम के हिसाब से ईंधन भरवाना अब मुमकिन नहीं रहा क्योंकि कीमतें तीन से चार गुना बढ़ गई हैं। सलीम के अनुसार अगर यही सिलसिला जारी रहा तो उन्हें अपनी दुकान बंद कर बोरिया- बिस्तर समेटना पड़ेगा।’
एलपीजी सिलिंडर की कमी ने लगभग सबको परेशान कर दिया है। मेट्रो स्टेशन के पास मोमो विक्रेता शुभम कुमार कहते हैं कि एलपीजी सिलिंडर अब ‘सोने की तरह’ हो गया है। कुमार ने कहा कि किल्लत इतनी अधिक हो गई है कि कुछ दिन तो वह अपनी दुकान बंद ही रखते हैं।
गुरुग्राम के सेक्टर 41 में दफ्तरों के बाहर एक वेंडर अपने ग्राहकों के बीच बनी एक खाई का जिक्र कुछ यूं करता है। इस वेंडर ने कहा कि दफ्तर जाने वाले लोग बढ़ी हुई कीमतों को काफी हद तक बर्दाश्त कर रहे हैं मगर दिहाड़ी मजदूरों के लिए यह मुमकिन नहीं है। उन्होंने चाय की कीमतें 30 प्रतिशत बढ़ा दी हैं और ईंधन की राशनिंग शुरू कर दी है, यहां तक कि कभी-कभार आने वाले ग्राहकों को कुछ चीजें देने से भी इनकार कर रहे हैं। आंकड़े इस झटके को बखूबी स्पष्ट करते हैं।
इस वेंडर ने कहा, ‘कुछ समय पहले आधिकारिक तौर पर 860 रुपये थीं और बाद में संशोधित कीमतें 920 रुपये हो गईं। मगर अब अब बाजार में ये 3,000 रुपये तक पहुंच गई हैं। कुछ मामलों में तो 4,000 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि कारोबार टिकाए रखने की पूरी कोशिश रहेगी मगर जैसे-जैसे खर्च बढ़ेंगे मजदूर तेजी से पलायन करेंगे जिससे आधे ग्राहक खत्म हो जाएंगे।
दिल्ली में छात्रों के सबसे बड़े गढ़ मुखर्जी नगर में खाने पीने की किल्लत अब रोजमर्रा की चिंता बन गई है। सरकारी परीक्षा की तैयारी कर रहे एक छात्र ने कहा,‘फिलहाल हमारे पास खाने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है।’
कोचिंग के पढ़ाई कार्यक्रमों के कारण वे शहर में रुके हुए हैं मगर छात्रों के रहने-खाने का पूरा सिस्टम चरमरा गया है। भोजनालयों के बंद होने या मेनू छोटा करने के कारण वे बेहतर हालात वाली जगहों की ओर रुख कर रहे हैं। पेइंग गेस्ट हाउस एवं छात्रावास भी दबाव में हैं। नेस्टइन के मालिक-संचालक राघव गर्ग कहते हैं कि उन्होंने सेमेस्टर के बीच में विद्यार्थियों पर बढ़ी लागत का बोझ नहीं डाला है मगर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
गर्ग कहते हैं,‘पहले हम दिन में चार बार भोजन देते थे मगर अब यह घटकर तीन बार रह गया है।’ नेस्टइन में लगभग 150 छात्र और कामकाजी पेशेवर रहते हैं। एक समय ऐसा भी आया जब व्यावसायिक सिलिंडरों की इतनी गंभीर कमी हो गई थी कि निवासियों को कुछ दिनों के लिए शहर छोड़ना पड़ा था।
गर्ग ने कहा कि उन दिनों नेस्टइन ने चावल और दाल जैसे सीमित व्यंजनों से काम चलाया, साथ ही तंदूर में खाना पकाने जैसे वैकल्पिक तरीके भी आजमाए। नितिन लेखी (हॉस्पिटैलिटी ऑपरेटर) जैसे लोग अब तक मौजूदा स्टॉक से काम चला रहे हैं मगर उन्हें इस बात की चिंता सता रही है कि आगे क्या होगा। लेखी कहते हैं,‘वाणिज्यिक (कमर्शियल) सिलिंडर पहले 1,800 रुपये में मिलता था मगर अब यह 6,000 रुपये में मिल रहा है ।’ उन्होंने कहा कि सिलिंडर की खरीदारी एक चुनौती बन गई है।
(जॉर्जी कोइतरा, उदिशा श्रीवास्तव, दीपक पटेल, अनुष्का भारद्वाज, मोहम्मद कैफी आलम और प्राची पिसाल की रिपोर्टिंग)