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मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश मिलकर विकसित करेंगे सौर परियोजनाएं, छह-छह महीने होगी बिजली की सप्लाई

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मध्य प्रदेश में बिजली की अधिकतम मांग अक्टूबर से मार्च तक होती है और उत्तर प्रदेश में यह अव​धि आम तौर पर अप्रैल से सितंबर की होती है।

Last Updated- September 23, 2024 | 10:57 PM IST
ACME Solar

दो पड़ोसी राज्यों- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने साथ मिलकर 8 गीगावॉट क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजनाएं विकसित करने की योजना बनाई है। इन परियोजनाओं से दोनों राज्यों को छह-छह महीने बिजली दी जाएगी। जब ये परियोजनाएं शुरू होंगी तो दो राज्यों के बीच नवीकरणीय ऊर्जा साझेदारी वाली देश की पहली अनूठी परियोजना होगी।

इस योजना से जुड़े वरिष्ठ अ​धिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि दोनों राज्यों में बिजली की मांग अलग-अलग समय पर बढ़ती है। मध्य प्रदेश में बिजली की अधिकतम मांग अक्टूबर से मार्च तक होती है और उत्तर प्रदेश में यह अव​धि आम तौर पर अप्रैल से सितंबर की होती है। उत्तर प्रदेश में खरीफ फसलों की बोआई अ​धिक होती है और यह अवधि आम तौर पर जुलाई से अक्टूबर तक होती है। मगर मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में रबी फसलों की बोआई प्रमुखता से की जाती है और उसका सीजन नवंबर से मार्च तक होता है।

मध्य प्रदेश सरकार के ऊर्जा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव ने गुजरात में आयोजित आरई-इन्वेस्ट कार्यक्रम के दौरान बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘इसके पीछे विचार यह है कि दोनों राज्य 6-6 महीने यहां से बिजली खरीदेंगे। पहले चरण में हमने 2 गीगावॉट की परियोजना शुरू करने योजना बनाई है, जिसके लिए संभावित स्थान के रूप में मुरैना को चुना गया है। इसके लिए बोली अगले चार महीनों में मंगाई जाएगी और परियोजना अगले 12 महीनों में चालू हो जानी चाहिए।’

श्रीवास्तव ने कहा कि वित्त वर्ष की पहली और दूसरी तिमाही में इस सौर ऊर्जा संयंत्र से उत्तर प्रदेश को बिजली दी जाएगी। वित्त वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में यह संयंत्र मध्य प्रदेश को बिजली देगा। दोनों राज्यों के लिए बिजली की कीमत एक समान रहेगी और बोली प्रक्रिया के दौरान ही उसका खुलासा होगा।

श्रीवास्तव ने कहा कि मुरैना संयंत्र बनाने का ठेका बोली लगाने वाली किसी एक ही कंपनी या संस्था को देने की योजना है। उन्होंने कहा कि 2 गीगावॉट की इस परियोजना को अंतरराज्यीय पारेषण प्रणाली (आईएसटीएस) अथवा राष्ट्रीय ग्रिड में शामिल किया जाएगा। उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि 2 गीगावॉट की सौर परियोजना स्थापित करने में करीब 10,000 करोड़ रुपये का खर्च आता है। मगर श्रीवास्तव ने इस परियोजना की लागत के बारे में कुछ नहीं कहा।

साझा सौर परियोजना की शेष क्षमता दोनों राज्यों में स्थापित की जाएगी। श्रीवास्तव ने कहा, ‘हम सोलर पार्क के बारे में भी सोच सकते हैं। इसके लिए चर्चा चल रही है।’ श्रीवास्तव भारत के पहले सोलर पार्क रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्रोजेक्ट के लिए जिम्मेदार प्रमुख अधिकारियों में शामिल थे। रम्स परियोजना से दिल्ली मेट्रो और भारतीय रेल सहित देश के विभिन्न उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति की जाती है।

सोलर पार्क में अलग-अलग क्षमता वाली अलग-अलग परियोजनाएं लगाई जाती हैं, जिन्हें अलग-अलग डेवलपर ही बनाते हैं। सभी परियोजनाओं से बनी बिजली एक ही पारेषण प्रणाली के जरिये भेजी जाती है, जिससे सभी परियोजनाएं जुड़ी होती हैं। देश का बिजली ग्रिड चलाने वाली कंपनी ग्रिड इंडिया के आंकड़ों के अनुसार ड़े देखे तो पता चला कि मध्य प्रदेश में दिसंबर से मार्च के दौरान बिजली की सबसे ज्यादा मांग रहती है, जो 10 से 12 गीगावॉट होती है। उत्तर प्रदेश में अप्रैल से जुलाई के बीच गर्मियों के दौरान बिजली की सबसे अ​धिक मांग होती है।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में विस्तार के लिए महत्त्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किए हैं। मध्य प्रदेश ने 2030 तक 20 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। राज्य की मौजूदा अक्षय ऊर्जा क्षमता 9 गीगावॉट है। उत्तर प्रदेश ने 2026-27 तक 22 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश की मौजूदा अक्षय ऊर्जा क्षमता 6.8 गीगावॉट है।

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First Published - September 23, 2024 | 10:57 PM IST

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