लंबे समय से विवादों में रहे मध्य प्रदेश के धार जिले के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को उच्च न्यायालय के इंदौर पीठ ने शुक्रवार को मंदिर करार दिया। पीठ ने कहा कि पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट पर विचार करने के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचा है कि संरक्षित स्थान देवी सरस्वती का मंदिर है। पीठ ने एएसआई द्वारा 2003 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत मुसलमानों को परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।
उच्च न्यायालय के इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर पुरातात्विक व ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की अधिसूचनाओं व उसके वैज्ञानिक सर्वेक्षण और कानूनी प्रावधानों की रोशनी में फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में शीर्ष अदालत के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया।
खंडपीठ ने सामाजिक संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ और कुलदीप तिवारी व अन्य लोगों की दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाएं मंजूर करते हुए कहा, ‘भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला के रूप में तय किया जाता है।’
भोजशाला को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने 7 अप्रैल, 2003 को एक आदेश जारी किया था। इसमें हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार भोजशाला में पूजा करने की अनुमति दी गई थी, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार इस जगह नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी। इस फैसले को मुस्लिम पक्ष ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा की है।
मुस्लिम पक्ष के वकील अशहर वारसी ने कहा, ‘हम भोजशाला मामले में उच्च न्यायालय के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और इसे शीर्ष अदालत में जल्द से जल्द चुनौती देंगे।’ उन्होंने दावा किया कि भोजशाला परिसर में एएसआई का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और इसकी रिपोर्ट ‘त्रुटिपूर्ण’ थी तथा उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इस रिपोर्ट पर भरोसा किया है।
दूसरी ओर हिंदू पक्ष के एक याची जितेंद्र सिंह ‘बिसेन’ की तरफ से शुक्रवार को ही उच्चतम न्यायालय में कैविएट दाखिल की गई, जिसमें अनुरोध किया गया कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर कोई भी आदेश उसका पक्ष सुने बिना पारित नहीं किया जाए।
(साथ में एजेंसियां)