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दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कोर्ट केस से बरी हुए लोगों का नाम अब इंटरनेट पर नहीं दिखेगा

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दिल्ली हाई कोर्ट ने 'भूल जाने के अधिकार' को मौलिक अधिकार माना है। अब कोर्ट केस से बरी हुए लोगों के नाम गूगल सर्च से हटाए जाएंगे

Last Updated- June 01, 2026 | 10:31 PM IST
Delhi High Court
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

किसी आरोपी के बरी या आरोपमुक्त किए जाने, कार्यवाही रद्द अथवा समझौता होने जैसे मामलों में अब प्रभावित व्य​क्ति का नाम और पहचान इंटरनेट पर उजागर नहीं किए जा सकेंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि गूगल जैसे सर्च इंजन ऐसे मामलों में नाम आधारित खोज के माध्यम से न्यायिक अभिलेखों को अनिश्चित काल तक प्रदर्शित नहीं कर सकते, जो निजी प्रकृति के हों।

सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने माना है कि ‘भूल जाने का अधिकार’ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीशुदा निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। यह फैसला नागरिकों को उन व्यक्तिगत सूचनाओं की निरंतर ऑनलाइन उपलब्धता से सुरक्षा मांगने का मार्ग प्रशस्त करता है जिनसे अनुचित नुकसान होता है। अपने फैसले में न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने कहा कि निजता के अधिकारों को डिजिटल युग की जरूरतों और चुनौतियों से निपटने के लिहाज से विकसित होना चाहिए, जहां एक बार ऑनलाइन डाली गई जानकारी अनिश्चित काल तक सुलभ रह सकती है।

उन्होंने अपने फैसले में कहा, ‘ऐसे समाज में जहां डिजिटल रिकॉर्ड वस्तुतः हमेशा रह सकते हैं, भूल जाने का अधिकार निजता के महत्त्व को दर्शाने के साथ-साथ व्य​क्ति से संबंधित जानकारी को मिटाने की मांग करने का अ​धिकार देता है। यह व्यक्तियों को अतीत की ऐसी घटनाओं से पीछा छुड़ाने में मददगार होता है, जो अब प्रासंगिक नहीं हो रह गई हैं। इससे समाज में व्यक्ति की गरिमा और स्वायत्तता को बरकरार रखता है।’

अदालत का यह फैसला कुछ व्यक्तियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर आया, जिनमें पिछले कानूनी कार्यवाही से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री को हटाने, डी-लिंक करने या डी-इंडेक्स करने की मांग की गई थी। याचियों का तर्क था कि विवाद हल होने या आपराधिक मामलों में बरी होने के बाद भी इंटरनेट खोज उन्हें उन कार्यवाही से जोड़ती रहती है, जिससे उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

न्यायालय के समक्ष मामले में विभिन्न स्थितियां शामिल थीं, जिनमें बरी हुए आरोपी व्यक्ति, वैवाहिक विवादों के पक्षकार और न्यायिक कार्यवाही में ऐसे व्यक्ति जिनके नाम मुकदमे से केवल मामूली संबंध होने के बावजूद दिखाई दिए। याचियों को राहत देते हुए अदालत ने संबंधित प्राधिकारियों, विभिन्न ‘सर्च इंजन’ के संचालकों और कानूनी डेटाबेस मंचों को निर्देश दिया कि वे याचियों द्वारा उद्धृत निर्णयों, आदेशों और समाचार लेखों के संबंध में अपनी नाम-आधारित खोज सुविधा को निष्क्रिय करें तथा उन्हें खोज परिणामों से हटा दें यानी डी-इंडेक्स करें।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं या बच्चों के विरुद्ध अपराधों, सार्वजनिक विश्वास के उल्लंघन से जुड़े अपराधों, लोकसेवकों, निर्वाचित प्रतिनिधियों आदि द्वारा किए गए अपराधों में दोषसिद्धि से संबंधित मामलों में ‘डी-इंडेक्स’ करना उपयुक्त नहीं होगा।  अपने 144 पृष्ठों के फैसले में न्यायालय ने फैसला सुनाया कि याचियों को संबंधित न्यायालय से मूल निर्णय या आदेश में खुद की पहचान छिपाने का अनुरोध करने की स्वतंत्रता होगी। 

(साथ में एजेंसियां)

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First Published - June 1, 2026 | 10:31 PM IST

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