देश में लगातार बढ़ती महंगाई का असर अब लोगों के करियर और नौकरी से जुड़े फैसलों पर भी दिखने लगा है। रोजमर्रा के खर्च, मकान का किराया, बच्चों की पढ़ाई और आने-जाने का खर्च बढ़ने से बड़ी संख्या में कर्मचारियों को लगने लगा है कि उनकी मौजूदा सैलरी अब पहले जैसी राहत नहीं दे रही। यही वजह है कि लोग अतिरिक्त कमाई के रास्ते तलाश रहे हैं, बेहतर वेतन वाली नौकरियों की ओर देख रहे हैं और यहां तक कि महंगे महानगरों को छोड़कर छोटे शहरों में बसने पर भी विचार कर रहे हैं।
हायरिंग प्लेटफॉर्म Indeed की एक सर्वे रिपोर्ट में यह तस्वीर सामने आई है। सर्वे में 1,200 से ज्यादा कर्मचारियों और 1,000 से अधिक कंपनियों की राय शामिल की गई।
सर्वे के मुताबिक, 68 फीसदी कर्मचारियों का कहना है कि उनकी मौजूदा आमदनी उनके जीवन-यापन के खर्चों को आराम से पूरा नहीं कर पा रही है। यानी सैलरी बढ़ने की रफ्तार और खर्च बढ़ने की रफ्तार के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। करीब 32 फीसदी लोगों ने कहा कि उनकी आय किसी तरह खर्च निकालने लायक है। वहीं 24 फीसदी कर्मचारियों ने माना कि उनके लिए आर्थिक स्थिति संभालना मुश्किल होता जा रहा है। 12 फीसदी लोगों ने तो खुद को गंभीर वित्तीय दबाव में बताया। दूसरी ओर केवल 13 फीसदी कर्मचारियों का कहना है कि उनकी आय आरामदायक जीवन जीने के लिए पर्याप्त है।
महंगाई का असर लोगों की मानसिक स्थिति पर भी दिखाई दे रहा है। सर्वे में शामिल 41 फीसदी कर्मचारियों ने कहा कि वे आज से दो साल पहले की तुलना में ज्यादा वित्तीय तनाव महसूस कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाने-पीने की चीजों, मकान के किराए, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ते खर्च ने मध्यम वर्ग की बचत पर असर डाला है। ऐसे में लोगों के लिए सिर्फ एक नौकरी के भरोसे वित्तीय लक्ष्य पूरे करना मुश्किल होता जा रहा है।
बढ़ते खर्चों के बीच अब कई कर्मचारी सिर्फ अपनी सैलरी पर निर्भर नहीं रहना चाहते। सर्वे के मुताबिक, 14 फीसदी लोग नियमित रूप से फ्रीलांसिंग या किसी दूसरे काम के जरिए अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। वहीं 19 फीसदी लोग समय-समय पर साइड इनकम करते हैं। इसके अलावा 24 फीसदी कर्मचारी ऐसे हैं जो भविष्य में कोई अतिरिक्त कमाई का जरिया शुरू करने पर विचार कर रहे हैं। यानी लगभग 60 फीसदी कर्मचारी या तो पहले से अतिरिक्त आय कमा रहे हैं या फिर इसकी तैयारी कर रहे हैं। यह संकेत देता है कि अब लोग केवल वेतन बढ़ने का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि आय के अलग-अलग स्रोत बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
महंगे महानगरों में रहने की बढ़ती लागत भी लोगों की सोच बदल रही है। सर्वे में शामिल 39 फीसदी कर्मचारियों ने मकान और किराए के खर्च को सबसे बड़ी चुनौती बताया। इसके अलावा 27 फीसदी लोगों ने ट्रैफिक और लंबे सफर को परेशानी की वजह माना। इतने ही लोगों ने रोजमर्रा के बढ़ते खर्चों को भी चिंता का विषय बताया। इसी वजह से मेट्रो शहरों में रहने वाले 54 फीसदी कर्मचारियों ने कहा कि अगर उन्हें समान करियर अवसर मिलें तो वे टियर-2 और टियर-3 शहरों में जाने पर विचार कर सकते हैं। हैदराबाद के कर्मचारियों में यह रुझान सबसे ज्यादा देखा गया, जबकि मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु के लोग भी इस विकल्प के लिए तैयार दिखे।
कर्मचारियों की बदलती पसंद को देखते हुए कंपनियां भी अपनी भर्ती रणनीति में बदलाव कर रही हैं। सर्वे के अनुसार, 43 फीसदी नियोक्ताओं का मानना है कि टियर-2 और टियर-3 शहर अब भर्ती के लिहाज से पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में बड़े शहरों के बाहर भी रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कर्मचारियों के लिए सिर्फ ज्यादा वेतन ही सबसे बड़ी प्राथमिकता नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि भविष्य में नौकरी चुनते समय सबसे अहम बात क्या होगी, तो 41 फीसदी लोगों ने नौकरी की स्थिरता और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा। वहीं 30 फीसदी लोगों ने ज्यादा वेतन और बेहतर पैकेज को प्राथमिकता दी। इसके अलावा कम खर्च वाले शहर और बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस भी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरे।
सर्वे में एक दिलचस्प विरोधाभास भी सामने आया। 73 फीसदी कंपनियों ने माना कि बढ़ती महंगाई का असर उनके कर्मचारियों पर पड़ रहा है। वहीं 56 फीसदी नियोक्ताओं ने कहा कि कर्मचारियों की वेतन संबंधी अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। इसके बावजूद 77 फीसदी कंपनियों ने कर्मचारियों को बढ़ते खर्चों से निपटने में मदद करने के लिए कोई नया कार्यक्रम या विशेष सुविधा शुरू नहीं की है। इससे कर्मचारियों और कंपनियों की सोच के बीच का अंतर भी साफ नजर आता है।