मार्च 2020 में महामारी के कारण लगे लॉकडाउन ने भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को अचानक रोक दिया था। ठीक छह साल बाद एक उमस भरा मार्च महीना पुणे जिले के चाकण और पिंपरी-चिंचवड के औद्योगिक क्षेत्रों में उन यादों को ताजा कर रहा है। हजारों मील दूर चल रहा एक युद्ध, सिकुड़ती आपूर्ति श्रृंखला और उत्पादन में कटौती से कारोबार को लेकर अनिश्चितता दिख रही है, वहीं श्रमिक एक बार फिर अपने कार्यस्थल पर टिके रहने को लेकर असमंजस से घिरे हैं।
फरवरी के आखिर में अमेरिका-इजरायल ने जब पहली बार ईरान पर हमला किया तो यहां बहुत कम लोगों को अंदाजा रहा होगा कि इसके शुरुआती झटके दफ्तर, कैंटीन और दुकानों तक महसूस होंगे।
एक छोटे उद्यम के एक कार्यकारी ने कहा, ‘मार्च की शुरुआत में कैंटीन सुपरवाइजर ने संभावित कमी का हवाला देते हुए अतिरिक्त सब्जी देनी बंद कर दी। महीने के अंत तक श्रमिकों ने शिकायत की कि छोटे एलपीजी सिलिंडर की जमाखोरी हो रही है और वे उसे नहीं खरीद पा रहे हैं। मजबूरी में वे घर लौटने को विवश हो सकते हैं।’
श्रमिकों के लिए किसी भी तरह की रुकावट का जरा सा भी संकेत महामारी की उन बेचैन करने वाली यादों को ताजा कर देता है, जब उनमें से कई लोगों को मजबूरन अपने गृह राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार और असम लौटना पड़ा था। श्रमिकों के लिए व्यवधान का कोई भी संकेत महामारी की असहज यादों को फिर ताजा कर देता है, जिसने कई को उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में अपने गृहनगर वापस जाने के लिए मजबूर किया गया था।
उद्योग के अधिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि औद्योगिक क्षेत्र के 25 फीसदी से 40 फीसदी कामगार या तो क्षेत्र छोड़ चुके हैं या छोड़ने पर विचार कर रहे हैं।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के प्रवर्तकों की प्राथमिकता आपूर्ति श्रृंखला के दबाव, बढ़ती इनपुट लागत या फिसलते लक्ष्यों के हिसाब-किताब पर ध्यान देने से पहले, अपने कर्मचारियों की समस्या दूर करना होता है।
मूवटेक कन्वेयर्स के निदेशक संतोष मेडंकर ने कहा कि अगर स्थिति बिगड़ती है और ज्यादा श्रमिक काम छोड़ देते हैं तो उनकी भरपाई के लिए कामगारों को नियुक्त करना शुरुआती प्राथमिकताओं में से एक होगी।
उन्होंने कहा, ‘खाना पकाने की गैस की कमी के कारण न कि केवल मेरे कारखाने से बल्कि पूरे उद्योग से श्रमिक पलायन कर रहे हैं। इससे वित्त वर्ष 2026 की अंतिम तिमाही में आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा है। श्रमिकों के पलायन की भरपाई के लिए करीब 10 फीसदी अतिरिक्त भर्ती करनी होगी लेकिन इससे लागत बढ़ जाएगी।’
आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले छह वर्षों में अकेले पुणे में एमएसएमई ने 53 लाख से अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। उद्योग जगत की चिंताओं के बावजूद पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि एलपीजी की आपूर्ति में कोई व्यवधान नहीं आया है जिससे प्रवासियों पर असर पड़े और आपूर्ति स्थिर बनी हुई है।
इसमें यह भी कहा गया कि राज्य, तेल मार्केटिंग कंपनियों के साथ समन्वय में स्थानीय जरूरतों के आधार पर 5 किलोग्राम वाले एलपीजी सिलिंडर के लक्षित वितरण पर विचार कर सकते हैं।
पुणे का औद्योगिक क्षेत्र भारत के महत्त्वपूर्ण विनिर्माण केंद्रों में से एक है, जो वाहन और कलपुर्जे, कृषि उपकरण, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और भारी इंजीनियरिंग तक फैला हुआ है।
यह क्षेत्र बजाज ऑटो, टाटा मोटर्स, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, फोक्सवैगन समूह और मर्सिडीज बेंज इंडिया जैसी कंपनियों के लिए आधार के रूप में कार्य करता है।
इसके मूल में एमएसएमई का सघन नेटवर्क है जो बड़े उद्यमों को सहयोग देता है। इलाके में पिछले छह वर्षों में 13 लाख से अधिक इकाइयां पंजीकृत हुई हैं, जिनमें से अधिकांश सूक्ष्म-उद्यम हैं। ये सहायक विनिर्माता हैं जो वाहन कलपुर्जा, कृषि उपकरण, फैब्रिकेशन, हीटिंग सिस्टम और पाउडर कोटिंग जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं।
इन कारखानों से कर्मचारियों के छोड़कर जाने का असर महसूस किया जा रहा है, खास तौर पर चाकण, भोसरी और पिंपरी-चिंचवाड जैसे औद्योगिक क्लस्टरों में। इनमें से कई कंपनियां बड़े मूल उपकरण विनिर्माताओं की आपर्ति श्रृंखला का हिस्सा हैं।
सह्याद्रि इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक जयदेव अक्कलकोट ने कहा, ‘गैस की कमी के कारण विनिर्माण का काम धीमा हो गया है। इसके साथ ही स्टील और पॉलीमर जैसे कच्चे माल की कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ गई हैं।’
अक्कलकोट चाकण एमआईडीसी औद्योगिक एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने कहा, ‘मूल उपकरण विनिर्माता अभी भी मौजूदा अनुबंध के चलते कीमतों में बढ़ोतरी का विरोध कर रहे हैं। इससे मार्जिन पर दबाव पड़ रहा है।’
अन्य का कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और श्रमबल में अस्थिरता के कारण तैयार माल में लगभग 20 फीसदी की कमी आई है।
मूवटेक के मेडंकर ने कहा कि एक जरूरी हाई-ग्रेड गियर जर्मनी से मंगाया जाता है और उनकी फैक्ट्री तक पहुंचने से पहले असेंबली के लिए एक भारतीय यूनिट से होकर गुजरता है। शिपिंग में बढ़ती रुकावटों के चलते, ऐसे पुर्जे हासिल करना मुश्किल हो गया है। इस वजह से कंपनी को फिलहाल कामचलाऊ उपायों पर निर्भर रहना पड़ रहा है जबकि वह भविष्य में आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नवोन्मेष और शोध एवं विकास पर अपना निवेश भी बढ़ा रही है।
इस बीच मार्जिन पर दबाव के बावजूद कृषि उपकरण बनाने वाली एक कंपनी के निदेशक ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर कहा कि कीमतें बढ़ाने का कोई विचार नहीं है। अगर मॉनसून में देर होती है तो किसान अपनी खरीदारी टाल सकते हैं। उन्होंने बताया कि वाणिज्यिक गैस की कमी के चलते कंपनी बिजली और डीजल-आधारित हीटिंग पर निर्भर हो गई है।
उन्होंने कहा, ‘बिजली के साथ अपनी चुनौतियां भी आती हैं। इनपुट लागत बढ़ जाती है। वोल्टेज में उतार-चढ़ाव से पूरी यूनिट ठप पड़ सकती है। ऊर्जा के स्रोतों में रातोरात बदलाव करना आसान नहीं है।’
इस क्षेत्र में कई इकाइयां दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका को भी माल का निर्यात करती हैं। फिलहाल, विदेश में विस्तार के जरिये अपने ग्राहक आधार में विविधता लाने और अपने मुनाफे को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही कंपनियों ने अपनी कई योजनाएं रोक दी हैं।
कार्याधिकारियों ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का आह्वान किया और बार-बार होने वाली भू-राजनीतिक बाधाओं के मद्देनजर भारत के मौजूदा ऊर्जा मिश्रण की सुरक्षा के पुनर्मूल्यांकन तथा गैर-पारंपरिक स्रोतों की ओर तेज़ी से और बड़े पैमाने पर बदलाव करने पर जोर दिया।
कई लोग महत्त्वपूर्ण विनिर्माण घटक के स्थानीय विकास पर भी जोर दे रहे हैं ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके और देश का आयात बिल घट सके।