Strait of Hormuz Crisis: हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई बातचीत से कुछ समय के लिए उम्मीद जगी थी कि हालात सामान्य हो सकते हैं। लग रहा था कि तनाव कम होगा और तेल बाजार को राहत मिलेगी। लेकिन यह उम्मीद ज्यादा देर टिक नहीं पाई। बातचीत बेनतीजा रही और इसके बाद हालात और बिगड़ते नजर आने लगे। अब अमेरिका ने ईरान के पोर्ट्स से आने-जाने वाले जहाजों की नाकेबंदी की तैयारी कर दी है, जिससे तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह कदम पूरी तरह लागू होता है, तो इसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। इससे न सिर्फ तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, बल्कि पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास अनिश्चितता ने पिछले एक महीने में कच्चे तेल के बाजार को हिला कर रख दिया है। मार्च के मध्य से लेकर अप्रैल 2026 तक तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, जिसका असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर भी साफ दिख रहा है।
| पैरामीटर | वैल्यू (ब्रेंट) |
|---|---|
| मौजूदा कीमत | 98.56 डॉलर प्रति बैरल |
| बदलाव | -0.80 (-0.81%) |
| उच्चतम (Highest) | 119.24 डॉलर |
| न्यूनतम (Lowest) | 90.40 डॉलर |
| अंतर (Difference) | 28.84 डॉलर |
| औसत (Average) | 103.37 डॉलर |
| कुल बदलाव (%) | -4.97% |
Investing डॉट कॉम के आंकड़ों के अनुसार, मार्च की शुरुआत में कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमतें लगभग 70 से 80 डॉलर प्रति बैरल के बीच थीं। लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कीमतों में तेजी आई और यह 119 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। अप्रैल में कुछ राहत जरूर देखने को मिली, लेकिन बाजार अभी भी काफी अस्थिर बना हुआ है। फिलहाल WTI क्रूड 95 से 105 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में कारोबार कर रहा है। 12 अप्रैल को इसकी कीमत 104.73 डॉलर तक पहुंच गई थी, जबकि 8 अप्रैल को इसमें 16 प्रतिशत से ज्यादा की तेज गिरावट भी देखी गई थी।
| पैरामीटर | वैल्यू (WTI) |
|---|---|
| मौजूदा कीमत | 97.56 डॉलर प्रति बैरल |
| बदलाव | -1.52 (-1.53%) |
| उच्चतम (Highest) | 117.63 डॉलर |
| न्यूनतम (Lowest) | 84.37 डॉलर |
| अंतर (Difference) | 33.26 डॉलर |
| औसत (Average) | 99.37 डॉलर |
| कुल बदलाव (%) | 0.37% |
वहीं WTI क्रूड ने इस दौरान 117.63 डॉलर का हाई छुआ है और अभी यह करीब 95 से 100 डॉलर प्रति बैरल के बीच बना हुआ है।
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भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा अहम है क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 से 89 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। भारतीय क्रूड बास्केट 19 मार्च को 156.29 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर तक पहुंच गई थी, जिससे आयात बिल पर भारी दबाव पड़ा। हाल के आंकड़ों के मुताबिक, 9 अप्रैल को यह कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल रही, जो अब भी ऊंचे स्तर पर है। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
तेल बाजार में इस अस्थिरता की सबसे बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही में आई भारी कमी है। कैप्लर के डेटा के मुताबिक, 12-13 अप्रैल के आसपास सिर्फ 7 जहाज इस रास्ते से गुजरे, जबकि सामान्य स्थिति में 60 से 140 जहाज रोज गुजरते हैं। यानी ट्रैफिक अभी भी सामान्य का सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत ही है। हालांकि 11 अप्रैल को तीन बड़े तेल टैंकरों की आवाजाही से थोड़ी उम्मीद जगी है, लेकिन अब भी 400 से ज्यादा टैंकर इस क्षेत्र में फंसे या इंतजार में हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महत्व बेहद बड़ा है क्योंकि दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है, जबकि करीब 30 प्रतिशत फर्टिलाइजर गैस आधारित है और उसकी सप्लाई भी इस क्षेत्र से जुड़ी है।
उन्होंने बताया कि पहले यह रास्ता पूरी तरह सामान्य था और दुनिया भर के जहाज यहां से गुजरते थे। लेकिन अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनाव के बाद ईरान ने इसे एक तरह से “हथियार” की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसके चलते जहाजों को निशाना बनाए जाने का खतरा बढ़ा और तेल-गैस टैंकरों की आवाजाही लगभग रुक गई।
विशेषज्ञ के अनुसार, ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाने की बात और अमेरिका द्वारा ऐसे जहाजों को रोकने की चेतावनी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। अगर अमेरिकी नेवी वहां पूरी तरह तैनात होकर जहाजों की आवाजाही रोक देती है, तो यह पूरी तरह नाकेबंदी जैसी स्थिति होगी और इससे तेल की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं। हालांकि तनेजा का मानना है कि अमेरिका पूरी तरह ब्लॉकेड लागू नहीं करेगा, बल्कि यह कदम ईरान पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया है। उनके मुताबिक, यह एक “बार्गेनिंग चिप” है और बैकचैनल बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश हो रही है। अमेरिका खुद भी चाहता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल और गैस की सप्लाई जल्दी सामान्य हो जाए, क्योंकि लंबे समय तक रुकावट से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। साथ ही स्वयं अमेरिका पर इसका असर पड़ रहा है, आप अमेरिका में ही तेल के रेट देखिए. अमेरिकी उपभोक्ता सस्ता तेल चाहता है, उसे आदत ही नहीं है महंगा तेल की।
ईरान हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर 1 डॉलर प्रति बैरल टोल की बात कर रहा है। अगर यह व्यवस्था जारी रहती है, तो आगे चलकर इसे बढ़ाकर 2 डॉलर या उससे ज्यादा भी किया जा सकता है। इसका असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत समेत सभी बड़े आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और वैश्विक व्यापार का पूरा गणित बदल सकता है।
तनेजा के मुताबिक, अगर इस तरह की व्यवस्था शुरू होती है तो भविष्य में स्ट्रेट ऑफ मलक्का जैसे अन्य अहम समुद्री मार्गों पर भी ऐसी मांगें उठ सकती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए नई चुनौती खड़ी हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक प्राकृतिक समुद्री रास्ता है और इस पर संयुक्त राष्ट्र की संधि लागू होती है। ऐसे में किसी भी देश द्वारा टोल लगाना नियमों के खिलाफ है। हालांकि, इस संधि पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन अमेरिका और ईरान ने नहीं किए हैं।
विशेषज्ञ का मानना है कि भारत समेत सभी बड़े तेल आयातक देशों को इस कदम का खुलकर विरोध करना चाहिए और ईरान को स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि इस तरह की व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि अगर इसे रोका नहीं गया, तो यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत हो सकती है।
तनेजा के मुताबिक, भारत 40 से ज्यादा देशों से तेल आयात करता है, लेकिन दूर-दराज के देशों जैसे अमेरिका, ब्राजील या गुयाना से तेल आने में दो महीने तक लग सकते हैं। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में भारत की रिफाइनरियों तक जो तेल पहुंच रहा है, उसका बड़ा हिस्सा युद्ध से पहले खरीदा गया था और अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन अगर संकट लंबा चलता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ना तय है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की बैलेंस शीट कमजोर होती है, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल खरीदने में दिक्कत हो सकती है, क्योंकि क्रेडिट शर्तें सख्त हो जाती हैं। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
तनेजा के अनुसार, अगर होर्मुज से सप्लाई बाधित होती है, तो सऊदी अरब की पाइपलाइन जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है और भारत की कुल जरूरत का 15 प्रतिशत से ज्यादा इससे पूरा नहीं किया जा सकता।
तनेजा का कहना है कि अगर आज ही युद्ध खत्म हो जाए, तब भी तेल बाजार को स्थिर होने में कम से कम 3 से 4 महीने लगेंगे, जबकि LNG के मामले में और ज्यादा समय लग सकता है। उनके मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में कच्चे तेल की कीमतें 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा हालात में यह 80 से 90 डॉलर के बीच बनी रह सकती हैं।