प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के साथ हाल में मुलाकात की। इससे वेनेजुएला फिर भारत के ऊर्जा विचार-विमर्श में शामिल हो गया है। एनर्जी ट्रैकर्स के अनुसार छूट पर भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदे जाने के बावजूद मई, 2026 में भारत के लिए वेनेजुएला तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। यह घटनाक्रम कोई नई साझेदारी नहीं है, बल्कि पुरानी साझेदारी की वापसी है। यह साझेदारी बीते दशक में नाटकीय रूप से खत्म हो गई थी।
भारत ने 2013-14 में वेनेजुएला से लगभग 14 अरब डॉलर का सामान आयात किया। यह लगभग पूरी तरह से कच्चा तेल ही था। इससे यह लैटिन अमेरिकी देश भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण तेल साझेदार देशों में से एक बन गया। वर्ष 2010 के दशक में भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में वेनेजुएला की हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत होती थी। उस दौर में भारत के लिए वेनेजुएला कच्चे तेल का शीर्ष आपूर्तिकर्ता था। लेकिन वेनेजुएला का भारत के कच्चे तेल के व्यापार में 2016-17 के दबदबा कम होता गया और 2020-21 के बाद तेजी से खत्म होता गया।
इसका कारण यह था कि प्रतिबंधों, राजनीतिक अस्थिरता और शिपिंग में रुकावटों ने वेनेजुएला के तेल निर्यात को प्रभावित किया। इससे भारत के कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग न के बराबर रह गई। हालांकि निर्यात के मामले में भी स्थिति बहुत अलग रही है।
पूरे दशक में वेनेजुएला को भारत का निर्यात काफी कम रहा है। यह ज्यादातर सालाना 10 करोड़ डॉलर से 50 करोड़ डॉलर के बीच रहा। यह आयात बिल का छोटा सा हिस्सा था, तब भी जब कच्चे तेल का व्यापार लगभग खत्म हो गया था। वेनेजुएला से भारत को होने वाले निर्यात में विनिर्मित सामान, रसायन और संबंधित औद्योगिक उत्पादों का दबदबा बना रहा।
इससे पता चलता है कि भले ही तेल ने इस रिश्ते को परिभाषित किया, लेकिन गैर-तेल व्यापार तुलनात्मक रूप से सीमित व स्थिर रहा। आंकड़ों से जानकारी मिलती है कि भारत-वेनेजुएला व्यापार किस हद तक केवल कच्चे तेल के प्रवाह पर निर्भर रहा है और वेनेज़ुएला के तेल के बढ़ने, खत्म होने और हाल ही में फिर से शुरू होने ने दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को लगभग पूरी तरह से आकार दिया है।