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Super El Niño: 2026 में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ला सकता है सुपर एल नीनो, IMD भी अलर्ट

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भारत के लिए क्यों खतरनाक है सुपर एल नीनो? जानिए किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा

Last Updated- May 20, 2026 | 12:00 PM IST
Heatwave in India- भारत में गर्मी की लहर

दुनियाभर के वैज्ञानिक इस साल संभावित ‘सुपर एल नीनो’ को लेकर चिंतित हैं। शुरुआती संकेत बता रहे हैं कि यह मौसम संबंधी घटना उम्मीद से ज्यादा तेजी से विकसित हो सकती है और पिछले कई दशकों के सबसे ताकतवर एल नीनो में बदल सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर सुपर एल नीनो बना, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। भारत में कमजोर मानसून, सूखा, भीषण गर्मी और खेती पर बड़ा असर देखने को मिल सकता है।

आखिर क्या होता है एल नीनो?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। यह तब होती है, जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव दुनियाभर की हवाओं और मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है। इसके कारण कई देशों में मौसम अचानक बदल जाता है। कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं बाढ़ और तेज बारिश की स्थिति बन जाती है। एल नीनो नाम स्पेनिश भाषा से लिया गया है, जिसका मतलब ‘छोटा बच्चा’ होता है। यह नाम कई साल पहले पेरू के मछुआरों ने दिया था, जिन्होंने क्रिसमस के आसपास समुद्र का पानी गर्म होते देखा था। यह घटना आमतौर पर हर 2 से 7 साल में एक बार होती है और करीब एक साल तक रह सकती है।

‘सुपर एल नीनो’ क्यों ज्यादा खतरनाक माना जाता है?

जब समुद्र का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तब उसे ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है। यह सामान्य एल नीनो से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि इससे मौसम की चरम घटनाएं और तेज हो जाती हैं। पिछले सुपर एल नीनो के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में भयंकर सूखा, बाढ़, जंगलों में आग, फसल बर्बादी और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी देखने को मिली थी।

वैज्ञानिकों ने क्यों बढ़ाई चेतावनी?

अमेरिका की National Oceanic and Atmospheric Administration यानी NOAA ने चेतावनी दी है कि 2026 में एल नीनो काफी मजबूत हो सकता है। NOAA के मुताबिक, प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति तेजी से बन रही है। कई मौसम मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि यह 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े एल नीनो की बराबरी कर सकता है या उनसे भी ज्यादा ताकतवर हो सकता है। संस्था का कहना है कि इस साल के दूसरे हिस्से में एल नीनो के ‘मजबूत’ या ‘बहुत मजबूत’ बनने की संभावना करीब दो-तिहाई है। समुद्र के तापमान में शुरुआती बढ़ोतरी भी दिखाई देने लगी है। कई इलाकों में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से करीब 0.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया है।

इस बार चिंता ज्यादा क्यों बढ़ी?

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार ला नीना से एल नीनो में बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है। आमतौर पर यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, लेकिन इस बार इसकी रफ्तार ज्यादा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किसी बड़े और ज्यादा ताकतवर एल नीनो का शुरुआती संकेत हो सकता है। इसके साथ ही ग्लोबल वार्मिंग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में एल नीनो और बढ़ते वैश्विक तापमान का मेल दुनिया को रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की तरफ धकेल सकता है।

भारत के लिए क्यों बड़ा खतरा?

भारत की सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर है। देश की करीब 70 प्रतिशत बारिश जून से सितंबर के बीच आने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। जब एल नीनो मजबूत होता है, तो मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इससे उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में बारिश कम हो सकती है। हालांकि कुछ तटीय इलाकों में ज्यादा बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति भी बन सकती है।

1951 से 2022 के बीच भारत में जितने एल नीनो वर्ष आए, उनमें करीब 60 प्रतिशत सालों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। भारत के कई बड़े सूखे भी एल नीनो से जुड़े रहे हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD पहले ही चेतावनी दे चुका है कि 2026 का मानसून कमजोर रह सकता है और कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।

किन राज्यों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है?

महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य एल नीनो के दौरान सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में आते रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ तटीय राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है।

खेती और आम लोगों पर क्या असर होगा?

कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ता है। बारिश कम होने से फसल उत्पादन घट सकता है और किसानों की लागत बढ़ सकती है। धान, दालें, गन्ना और तिलहन जैसी फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। जब फसल उत्पादन कम होता है, तो खाने-पीने की चीजें महंगी होने लगती हैं। चावल, दाल, सब्जियां और खाने के तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।

पहले भी दिख चुका है बड़ा असर

2015-16 के सुपर एल नीनो के दौरान भारत में मानसून सामान्य से सिर्फ 86 प्रतिशत रहा था। उस समय कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन गई थी। वहीं 2023-24 के एल नीनो के दौरान देश में अनियमित बारिश, भीषण गर्मी और तापमान में तेज बढ़ोतरी देखी गई थी। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में आम और काजू की फसल को नुकसान हुआ था। वहीं कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में गर्म मौसम के कारण सेब की खेती प्रभावित हुई थी।

बिजली संकट भी बढ़ सकता है

एल नीनो के कारण तापमान बढ़ने से बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ती है। लोग ज्यादा कूलर और एसी इस्तेमाल करते हैं, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ जाता है। दूसरी तरफ कमजोर मानसून के कारण नदियों और जलाशयों में पानी कम हो सकता है। इससे हाइड्रो पावर उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यानी एक तरफ बिजली की मांग बढ़ेगी और दूसरी तरफ उत्पादन पर दबाव आ सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल वैज्ञानिक लगातार प्रशांत महासागर के तापमान और मौसम के पैटर्न पर नजर रख रहे हैं। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि एल नीनो कितना मजबूत होता है। लेकिन शुरुआती संकेतों ने दुनियाभर में चिंता बढ़ा दी है। अगर सुपर एल नीनो बना, तो इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेती, महंगाई, बिजली और पूरी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

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First Published - May 20, 2026 | 12:00 PM IST

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