भारत के लिए कच्चे तेल का एक संभावित नया स्रोत अब चीन की ओर जाता दिख रहा है। ट्रेडर्स, रिफाइनिंग अधिकारियों और शिप-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, वॉशिंगटन द्वारा फ्लोटिंग स्टोरेज और ट्रांजिट में मौजूद प्रतिबंधित ईरानी तेल की खरीद को मंजूरी दिए जाने के बाद इसका रुख बदल गया है।
भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के दो सीनियर ट्रेडर्स ने बताया कि भारतीय रिफाइनरियों के पास रूसी तेल की तुलना में ईरानी तेल की बहुत सीमित उपलब्धता है, और जो तेल उपलब्ध भी है, उसके साथ “काफी झंझट” जुड़े हुए हैं। भारत ने मार्च और अप्रैल में डिलीवरी के लिए स्टोरेज में मौजूद 100 मिलियन बैरल रूसी तेल में से 60% से ज्यादा के सौदे पहले ही कर लिए हैं, जबकि ईरान से इसका दसवां हिस्सा भी उपलब्ध नहीं है।
अमेरिका द्वारा 2018 के अंत में प्रतिबंध दोबारा लागू किए जाने से पहले ईरान, इराक और सऊदी अरब के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता था।
दोनों ट्रेडर्स के अनुसार, वॉशिंगटन ने फ्लोटिंग स्टोरेज में मौजूद 140 मिलियन बैरल ईरानी कच्चे तेल को 19 अप्रैल तक बिक्री और डिलीवरी के लिए उपलब्ध बताया है, लेकिन इसमें से 10 मिलियन बैरल से भी कम मात्रा भारत के हिस्से में आ सकती है।
ट्रेडर्स का कहना है कि सिर्फ एक महीने की सीमित समय-सीमा भारतीय सरकारी रिफाइनरियों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। इस अवधि में संभावित विक्रेताओं की पहचान, उनकी विश्वसनीयता की जांच और शिपिंग की व्यवस्था करना बेहद मुश्किल हो रहा है।
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एक सीनियर रिफाइनिंग अधिकारी ने कहा कि अब तेल की बिक्री काफी हद तक उन ट्रेडर्स के नियंत्रण में है, जो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े हुए हैं। प्रतिबंधों से पहले ईरानी तेल की सप्लाई पूरी तरह नेशनल ईरानियन ऑयल कंपनी (NIOC) के हाथ में थी, लेकिन अब उसका बिक्री पर बहुत कम नियंत्रण रह गया है।
ब्रिटेन स्थित एनर्जी इंटेलिजेंस की एक रिपोर्ट के अनुसार, अब यह बिक्री “संदिग्ध” हितों द्वारा नियंत्रित की जा रही है, जिन्हें IRGC का समर्थन प्राप्त है। ये फ्रंट कंपनियों के नेटवर्क के जरिए प्रतिबंधित तेल बेचने और जहाजों को किराये पर लेने का काम करते हैं।
वहीं, मुंबई स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास ने एक बयान में कहा, “फिलहाल, ईरान के पास अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए न तो कच्चा तेल उपलब्ध है और न ही अतिरिक्त मात्रा में तेल। अमेरिकी वित्त मंत्री की टिप्पणियां खरीदारों को आश्वस्त करने और बाजार की स्थिति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से प्रतीत होती हैं।”
भारतीय रिफाइनर— सरकारी कंपनियां हों या रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL)— ईरानी तेल खरीदने के इच्छुक थे, खासकर तब जब वॉशिंगटन ने 20 मार्च को स्टोरेज और ट्रांजिट में मौजूद ईरानी तेल पर 30 दिन की छूट दी। लेकिन ट्रेडर्स का कहना है कि सप्लाई चेन को संभालना काफी मुश्किल है। खासकर उस सीमित समय-सीमा में जिसमें 19 अप्रैल तक तेल की डिलीवरी और भुगतान करना जरूरी है।
सिंगापुर स्थित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञ वंदना हरि ने कहा कि कई वर्षों से ईरानी तेल का खुले तौर पर व्यापार नहीं हुआ है, जिससे इसके कच्चे तेल की गुणवत्ता को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
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वैश्विक ऊर्जा और भू-राजनीति विशेषज्ञ एएफ अलहाजी ने एक नोट में कहा कि फ्लोटिंग स्टोरेज और ट्रांजिट में मौजूद ईरानी तेल की कुल मात्रा वॉशिंगटन के दावे से आधी से भी कम है। उनके अनुसार, करीब 55 मिलियन बैरल तेल ट्रांजिट में है, जबकि लगभग 15 मिलियन बैरल फ्लोटिंग स्टोरेज में मौजूद है।
इस महीने की शुरुआत में, डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने जहाजों पर ईरानी तेल की खरीद-बिक्री की अनुमति देने वाली 30 दिवसीय छूट की घोषणा की। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि इस अल्पकालिक अनुमति से लगभग 140 मिलियन बैरल तेल की खरीद-बिक्री संभव हो सकेगी।
उद्योग जगत के आंकड़े उपलब्ध कराने वाली कंपनियां केप्लर और वोर्टेक्सा का अनुमान है कि स्टोरेज में ईरानी तेल की मात्रा लगभग 170 मिलियन बैरल है। लेकिन इसका एक तिहाई हिस्सा भारत की पहुंच से बाहर है क्योंकि यह चीन में स्टोर किया गया है।
एनर्जी इंटेलिजेंस के अनुसार, 40 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल चीन के शेडोंग प्रांत में टैंकों में रखा हुआ है, जहां चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियां (जिन्हें “टीपॉट” कहा जाता है) स्थित हैं। इसके अलावा, करीब 16 मिलियन बैरल ईरानी तेल मलेशिया के पास अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में फ्लोटिंग स्टोरेज में है, जबकि 10 मिलियन बैरल चीन के तट के पास समुद्र में रखा हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में प्रतिबंधित तेल के खरीदार मुख्य रूप से यही “टीपॉट” रिफाइनरियां रही हैं, जिनके चुनिंदा ट्रेडर्स– जिनमें चीनी ट्रेडिंग हाउस भी शामिल हैं– से करीबी संबंध हैं। एनर्जी इंटेलिजेंस के मुताबिक, चीन में जमीन पर संग्रहीत तेल का नियंत्रण भी चीनी ट्रेडर्स के हाथ में है।
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भारत को ईरान से कच्चे तेल की सप्लाई अक्टूबर 2016 में अपने चरम पर थी, जब यह 8,30,000 बैरल प्रतिदिन (bpd) तक पहुंच गई थी। इसमें 7,00,000 बैरल प्रतिदिन से ज्यादा हिस्सा ईरान लाइट और ईरान हेवी ग्रेड का था, जो भारतीय सरकारी रिफाइनरियों के लिए ज्यादा यील्ड देने के लिहाज से बेहतर माने जाते हैं।
केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 में अमेरिकी प्रतिबंधों के अंत के करीब ईरान भारत को फ्रेट पर छूट दे रहा था, जिससे 2018 में आयात बढ़कर रिकॉर्ड 5,10,000 बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इसमें इंडियन ऑयल, नायरा एनर्जी और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड की खरीदारी प्रमुख रही।
RIL 30 से 50 लाख बैरल ईरानी तेल खरीदने के लिए बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है। एक वरिष्ठ उद्योग अधिकारी ने बताया। इस पर RIL ने कोई टिप्पणी नहीं की।
एक अधिकारी के अनुसार, सरकारी रिफाइनरियों के लिए ईरानी तेल बेचने वाले विक्रेताओं की विश्वसनीयता की जांच करना मुश्किल साबित हो रहा है। वहीं, एक अन्य अधिकारी ने कहा कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि भुगतान डॉलर में NIOC को किया जा सकता है या अन्य ट्रेडर्स को। उन्होंने आगे कहा कि कुछ ट्रेडर्स पेमेंट चीनी युआन में मांग रहे हैं।
हरि ने कहा कि NIOC वित्तीय लेन-देन के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में है, इसलिए जब तक अमेरिका विशिष्ट छूट नहीं देता, तब तक डायरेक्ट पेमेंट संभव नहीं हो सकता है।
अमेरिकी आदेश के मुताबिक, ईरानी कच्चे तेल या पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़े कुछ लेनदेन की अनुमति दी गई है। ये लेनदेन तेल की बिक्री, डिलीवरी और जहाज से उतारने (अनलोडिंग) से जुड़े हैं। यह अनुमति उन सभी जहाजों पर लागू होती है, जिन पर 20 मार्च 2026 को रात 12:01 बजे (ईस्टर्न डेलाइट टाइम) तक तेल लादा जा चुका था, भले ही वे जहाज पहले प्रतिबंधित क्यों न रहे हों। इन लेनदेन को 19 अप्रैल 2026 को रात 12:01 बजे (ईस्टर्न डेलाइट टाइम) तक पूरा किया जा सकता है।
हालांकि, एक सरकारी रिफाइनरी के बड़े अधिकारी ने कहा कि यह आदेश डॉकिंग, मरम्मत और बीमा जैसे लेनदेन को तो कवर करता है, लेकिन भुगतान के मुद्दे पर स्पष्टता नहीं देता।