भारत में लगातार पड़ रही हीटवेव ने एक बार फिर इस सवाल को गंभीर बना दिया है कि इंसानी शरीर आखिर कितनी गर्मी सह सकता है। आमतौर पर लोग सिर्फ तापमान पर ध्यान देते हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हवा में नमी यानी ह्यूमिडिटी गर्मी को और ज्यादा खतरनाक बना देती है। इसी वजह से अब ‘वेट-बल्ब तापमान’ को लेकर चिंता बढ़ रही है। खासतौर पर तटीय शहरों और भीड़भाड़ वाले शहरी इलाकों में इसका खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जहां लंबे समय तक हवा में नमी बनी रहती है।
वेट-बल्ब तापमान ऐसा पैमाना है जो सिर्फ हवा की गर्मी नहीं बल्कि उसमें मौजूद नमी को भी मापता है। इससे पता चलता है कि मौसम इंसानी शरीर के लिए कितना खतरनाक हो सकता है। एशियन हॉस्पिटल के डॉक्टर सुनील राणा के मुताबिक, सामान्य तापमान यह बताता है कि हवा कितनी गर्म है, जबकि वेट-बल्ब तापमान यह बताता है कि नमी के कारण शरीर पर गर्मी का कितना असर पड़ेगा।
इसे मापने के लिए थर्मामीटर के बल्ब पर गीला कपड़ा लगाया जाता है। जब पानी सूखता है तो थर्मामीटर ठंडा होता है और तापमान कम दिखता है। लेकिन अगर हवा में नमी ज्यादा हो, तो पानी जल्दी नहीं सूखता और तापमान ज्यादा बना रहता है। यही स्थिति शरीर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक बन जाती है।
सामान्य गर्मी में शरीर पसीना निकालकर खुद को ठंडा करता है। लेकिन जब हवा में नमी बहुत ज्यादा होती है, तो पसीना आसानी से सूख नहीं पाता। इससे शरीर की प्राकृतिक कूलिंग प्रक्रिया रुक जाती है और शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है।
सीके बिरला हॉस्पिटल के डॉक्टर राहुल शर्मा के अनुसार, ऐसी स्थिति में दिल, दिमाग, किडनी और रक्त वाहिकाओं पर भारी दबाव पड़ता है। वहीं मारेंगो एशिया हॉस्पिटल के डॉक्टर नीरज गुप्ता का कहना है कि अगर शरीर समय पर ठंडा नहीं हो पाया तो डिहाइड्रेशन, चक्कर, थकान, हीट एग्जॉशन और हीटस्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
पहले माना जाता था कि इंसान 35 डिग्री सेल्सियस वेट-बल्ब तापमान तक जीवित रह सकता है, अगर वह छांव में हो और उसे पानी मिलता रहे। लेकिन नई रिसर्च बताती है कि 31 से 32 डिग्री वेट-बल्ब तापमान पर भी लंबे समय तक रहने से शरीर पर गंभीर असर शुरू हो सकते हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि अगर लंबे समय तक शरीर ऐसी गर्मी में रहे, तो हीटस्ट्रोक, दिल पर दबाव, शरीर के अंगों के फेल होने और यहां तक कि मौत का खतरा भी बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बुजुर्ग, छोटे बच्चे, बाहर काम करने वाले मजदूर, गर्भवती महिलाएं और दिल, डायबिटीज, मोटापा या किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोग सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं। इसके अलावा कुछ खास दवाइयां लेने वाले मरीज और भीड़भाड़ वाले शहरों में रहने वाले लोग भी ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि सिरदर्द, चक्कर आना, मांसपेशियों में दर्द, जी मिचलाना, थकान और दिल की धड़कन तेज होना जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत सावधान हो जाना चाहिए। वहीं सांस लेने में दिक्कत, बेहोशी, भ्रम, तेज बुखार या दौरे पड़ना गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में तापमान और नमी दोनों बढ़ रहे हैं। खासतौर पर तटीय इलाके और बड़े शहर इस खतरे के प्रति ज्यादा संवेदनशील माने जा रहे हैं। डॉक्टर सुनील राणा के मुताबिक, इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पानी की सप्लाई और शहरों की व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।
डॉक्टर राहुल शर्मा का कहना है कि अब सिर्फ तापमान के आधार पर हीटवेव का अंदाजा लगाना काफी नहीं है, क्योंकि नमी भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभा रही है। इसलिए लोगों को जागरूक करना, कूलिंग सेंटर बढ़ाना और कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना जरूरी हो गया है।
डॉक्टरों के मुताबिक, लोगों को प्यास लगने का इंतजार किए बिना लगातार पानी पीना चाहिए। दोपहर की तेज धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए और हल्के सूती कपड़े पहनने चाहिए। ज्यादा मेहनत वाले काम कम करने, पंखे, कूलर या एसी का इस्तेमाल करने और तरबूज, खीरा व खट्टे फलों जैसे पानी से भरपूर खाद्य पदार्थ खाने की सलाह दी गई है।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि बुजुर्गों और बच्चों का खास ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि उनके शरीर पर गर्मी का असर ज्यादा तेजी से होता है। डॉक्टरों का कहना है कि सही समय पर पानी पीना और शरीर को ठंडा रखना ही गर्मी से बचने का सबसे असरदार तरीका है।