नीति आयोग ने भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली की प्रमुख चुनौतियों के रूप में विद्यालयों की जर्जर स्थिति, सीखने के परिणामों में कमी, असमान बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की कमी और शासन की कमजोरियों को उजागर किया है। साथ ही इसने मिश्रित विद्यालय परिसरों, मजबूत बुनियादी शिक्षा पहल, बेहतर शिक्षक प्रबंधन और डिजिटल व एआई संचालित शिक्षा के व्यापक उपयोग जैसे सुधारों की सिफारिश की है।
सरकार की सार्वजनिक नीति के थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट ‘भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली: गुणवत्ता वृद्धि के लिए सामयिक विश्लेषण और नीति रोडमैप’ में कहा है कि विद्यालय के विभिन्न चरणों में निरंतरता का अभाव, छोटे और एकल शिक्षक विद्यालयों की बहुतायत और बुनियादी ढांचे की कमियों के कारण पहुंच और गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट में सामाजिक आर्थिक रूप से वंचित समूहों और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों से संबंधित मुद्दों सहित इक्विटी और समावेशन में कमियों का भी उल्लेख किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भारतीय स्कूल प्रणाली में हर स्तर पर फ्रैग्मेंटेशन है। इसकी वजह से स्कूली शिक्षा की निरंतरता और शिक्षा प्रदान करने की दक्षता बाधित होती है। ये चुनौतियां अलग नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में विद्यालयों के डिजाइन और वितरण में निहित हैं और पहुंच, बच्चों के स्कूल छोड़कर जाने और सीखने में लगातार कमियों का कारण बनती हैं।’
इस रिपोर्ट में स्कूली शिक्षा के विभिन्न चरणों में बच्चों के स्कूल छोड़ने को प्रमुख मसला बताया गया है। प्राथमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 90.9 प्रतिशत है, जो माध्यमिक स्तर पर घटकर 78.7 प्रतिशत और उच्च माध्यमिक स्तर पर 58.4 प्रतिशत हो जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इससे संकेत मिलते हैं कि स्कूल प्रणाली में प्रवेश करने वाले लगभग हर 10 में से 4 बच्चे उच्च माध्यमिक शिक्षा तक शिक्षा जारी रखने में असमर्थ हैं।’
रिपोर्ट के अनुसार भारत में 14.71 लाख विद्यालय हैं, जिनमें 1 करोड़ से ज्यादा अध्यापक हैं और वे 24.69 करोड़ छात्रों को पढ़ाते हैं। रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि सभी विद्यालयों में 68.1 प्रतिशत सरकारी विद्यालय हैं और 49.2 प्रतिशत छात्रों का नामांकन सरकारी विद्यालयों में होता है। वहीं निजी विद्यालय 23.1 प्रतिशत हैं, जिनमें 38.8 प्रतिशत नामांकन है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि महामारी के बाद बुनियादी साक्षरता और संख्या संबंधी संकेतकों में सुधार हुआ है, लेकिन विशेष रूप से ग्रामीण, आदिवासी और आर्थिक रूप से वंचित छात्रों के बीच वैचारिक समझ और अनुप्रयोग आधारित सीखने में कमियां बनी हुई हैं। इसमें छोटे और दूरदराज के विद्यालयों में असमान डिजिटल पहुंच की भी जानकारी दी गई है और कहा है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के विद्यालयों को अतिरिक्त समावेशी बुनियादी ढांचे और सहायता प्रणालियों की आवश्यकता है।
इसमें उल्लेख किया गया कि एक तिहाई से अधिक भारतीय विद्यालयों में 50 से कम छात्र हैं, जिनमें लगभग 5.1 प्रतिशत में 10 से कम नामांकन है, और 8 प्रतिशत विद्यालयों में 11 से 20 छात्र पढ़ते हैं। इसमें कहा गया है, ‘इन विद्यालयों के छोटे आकार के कारण इनका संचालन आर्थिक रूप से महंगा और प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो गया है। खासकर शिक्षकों को भर्ती करने और जरूरी बुनियादी ढांचे के मामले में स्थिति चुनौतीपूर्ण है।