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भारत के IPO बाजार में विदेशी कंपनियों की लिस्टिंग से बढ़ा OFS का दबदबा, अरबों डॉलर बाहर जाने का रुझान

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प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के अनुसार 2024 से अब तक मुंबई में अपनी भारतीय इकाइयों को लिस्ट कराने वाली छह विदेशी कंपनियों में से केवल एक ने ही नया फंड जुटाया है

Last Updated- June 04, 2026 | 11:22 PM IST
initial public offering (ipo)

भारत का आईपीओ बाजार देखने में भले ही बेहद लुभावना लगे, लेकिन यह होड़ किसी तेजी से बढ़ते बाजार में विस्तार के लिए धन जुटाने की नहीं, बल्कि अरबों डॉलर अपने मुख्यालयों को वापस भेजने की है। भारत में विदेशी कंपनियां सूचीबद्धता के लिए उत्साह दिखा रही हैं।

बाजार शोध फर्म प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के अनुसार 2024 से अब तक मुंबई में अपनी भारतीय इकाइयों को लिस्ट कराने वाली छह विदेशी कंपनियों में से केवल एक ने ही नया फंड जुटाया है। बाकी सभी कंपनियां लिस्टिंग के लिए पूरी तरह सेकंडरी ऑफरिंग या बिक्री पेशकश (ओएफएस) लेकर आईं। इस तरीके में मौजूदा शेयरधारक बिना कोई नया फंड जुटाए अपने शेयर जनता को बेच देते हैं।

आंकड़ों से पता चला है कि जिन विदेशी कंपनियों ने बहुत पहले से भारत में निवेश कर रखा है, उनकी मूल कंपनियों ने इस तरह की सेकंडरी पेशकश के जरिये लगभग 5 अरब डॉलर कमाए। इनमें से 80 फीसदी से ज्यादा रकम ह्युंडै मोटर और एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स को मिली। आसान शब्दों में कहें तो, इन सभी आईपीओ से कुल मिलाकर जितनी रकम जुटाई गई,  उसके हर एक डॉलर के बदले 59 डॉलर से अ​धिक रकम बाहर चली गई। यह सिलसिला जारी है। वॉलमार्ट की भारतीय पेमेंट कंपनी का नियोजित 1 अरब डॉलर का आईपीओ और मॉडर्न टाइम्स ग्रुप की स्थानीय गेमिंग इकाई का 33.5 करोड़ डॉलर का आईपीओ, दोनों में ओएफएस का तरीका अपनाया जाना है।

इस सप्ताह कोका-कोला ने कहा कि अपने भारतीय बॉटलर की प्रस्तावित लिस्टिंग के तहत यह अमेरिकी कंपनी अपनी हिस्सेदारी का कुछ अंश बेचेगी। बैंकिंग सूत्रों ने बताया कि कार्ल्सबर्ग के प्रस्तावित भारतीय आईपीओ में भी कोई नया फंड नहीं जुटाया जाएगा और यह भी ओएफएस ही होगा।

यह रुझान दर्शाता है कि कई विदेशी कंपनियों के लिए अपने कारोबार के विस्तार हेतु नई रकम जुटाने के मुकाबले, भारतीय निवेश से आंशिक रूप से और मुनाफे के साथ बाहर निकलने की संभावना अधिक आकर्षक हो गई है। इस रुझान को बैंकर और अर्थशास्त्री भारत में हाल के वर्षों में शेयरों के आसमान छूते मूल्यांकन का नतीजा मान रहे हैं।

लॉ फर्म शार्दूल अमरचंद के पार्टनर प्रशांत गुप्ता ने कहा, ‘ग्लोबल कंपनियां भारत में लिस्टिंग पर जोर दे रही हैं, क्योंकि इससे उन्हें तरलता मिलती है और साथ ही उनकी पैतृक कंपनी के बाजार पूंजीकरण पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।’ शार्दूल अमरचंद ने ही ह्युंडै और एलजी, दोनों को उनके ओएफएस-आधारित आईपीओ के लिए सलाह दी थी।

रुपये की मुश्किलें

ओएफएस का यह रुझान ऐसे समय आया है जब भारतीय रुपया मुश्किल समय से गुजर रहा है। 2024 से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक 13 प्रतिशत और इस साल 6 प्रतिशत गिर चुका है। इससे यह चिंता बढ़ गई है कि आईपीओ से जुड़ा पैसा वापस जाने से भारी मात्रा में विदेशी पूंजी के बाहर जाने की समस्या और भी गंभीर होती जा रही है। इस साल अब तक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अपनी होल्डिंग्स में से 23 अरब डॉलर से अधिक की बिक्री की है, जो 2025 के 18.9 अरब डॉलर की रिकॉर्ड निकासी से अधिक है।

मूल्यांकन का खेल

एलएसईजी के डेटा के अनुसार 2025 में भारत अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आईपीओ बाजार था, जिसमें 367 लिस्टिंग के जरिये 21.8 अरब डॉलर जुटाए गए। पिछले दो साल में इसके बाजार रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर पहुंच गए थे। लेकिन इस साल ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

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First Published - June 4, 2026 | 11:22 PM IST

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