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ज्यादा पेंशन का रास्ता साफ: कागजी खानापूर्ति पर हाईकोर्ट सख्त, EPFO को खुद करनी होगी रिकॉर्ड की जांच!

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने EPFO सब्सक्राइबर्स को बड़ी राहत दी है। अब कंपनी के अधूरे कागजों के कारण ज्यादा पेंशन नहीं रुकेगी, डिपार्टमेंट को अन्य सबूतों से वेरिफिकेशन करना होगा

Last Updated- April 24, 2026 | 6:54 PM IST
EPFO
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के उन लाखों सब्सक्राइबर्स के लिए एक बेहद सुकून देने वाली खबर आई है जो ‘हायर पेंशन’ यानी ज्यादा पेंशन पाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि अगर किसी कर्मचारी का एम्पलॉयर कुछ जरूरी डॉक्यूमेंट जैसे ‘फॉर्म 6A’ या ‘चालान’ जमा नहीं कर पाता है, तो सिर्फ इस तकनीकी आधार पर उसकी पेंशन नहीं रोकी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पेंशन पाना कर्मचारी का अधिकार है और किसी कंपनी की लापरवाही या रिकॉर्ड की कमी की सजा कर्मचारी को नहीं मिलनी चाहिए।

कागजों की चेकलिस्ट नहीं, हकीकत देखे EPFO

अक्सर देखा जाता है कि जब कर्मचारी ज्यादा पेंशन के लिए आवेदन करते हैं, तो EPFO की तरफ से डॉक्यूमेंट्स की एक लंबी लिस्ट थमा दी जाती है। इस मामले में भी कुछ कर्मचारियों ने अपनी वास्तविक सैलरी के आधार पर ज्यादा योगदान दिया था और जॉइंट ऑप्शन फॉर्म भी भरा था। उनके पास फॉर्म 3A (सालाना कंट्रीब्यूशन स्टेटमेंट) और EPF पासबुक जैसे पुख्ता सबूत भी थे। इसके बावजूद EPFO ने उनके आवेदन सिर्फ इसलिए खारिज कर दिए क्योंकि उनकी कंपनियों ने फॉर्म 6A और कुछ पुराने चालान उपलब्ध नहीं कराए थे।

हाईकोर्ट ने EPFO के इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि डिपार्टेमेंट को ‘चेकलिस्ट’ के पीछे भागने के बजाय जमीनी हकीकत देखनी चाहिए। अगर कर्मचारी के पास यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि उसने ज्यादा वेतन पर योगदान दिया है, तो एक-दो कागजों की कमी को ‘फाटक’ (Fatal) मानकर दावा खारिज करना गलत है।

EPFO की जिम्मेदारी अब और बढ़ी

इस फैसले के बाद EPFO की भूमिका अब केवल एक रिसीवर की नहीं रह गई है। अब डिपार्टेमेंट को एक सक्रिय जांचकर्ता की तरह काम करना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अगर कोई डॉक्यूमेंट गायब है, तो EPFO खुद कंपनी से संपर्क करे और रिकॉर्ड मांगे। इसके साथ ही डिपार्टेमेंट को अपने आंतरिक डेटाबेस, मेंबर लेजर और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की पड़ताल करनी होगी ताकि यह पता चल सके कि कर्मचारी की बात में कितनी सच्चाई है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला EPFO को सिर्फ कागज लेने वाली ‘पैसिव’ भूमिका से बाहर निकालकर उसे ज्यादा जिम्मेदार बनाता है। अब डिपार्टमेंट बिना ठीक से जांच किए किसी आवेदन को सीधे खारिज नहीं कर सकता। उसे हर मामले में सोच-समझकर, साफ वजह बताते हुए लिखित फैसला (reasoned order) देना होगा।

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कर्मचारी इन सबूतों का ले सकते हैं सहारा

अदालत ने कर्मचारियों को राहत देते हुए यह साफ कर दिया है कि अब सबूत देने के लिए वे सिर्फ कंपनी के कागजों पर निर्भर नहीं रहेंगे। पेंशन के दावे में आप अपनी सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट (जहां सैलरी क्रेडिट दिखे), अपॉइंटमेंट लेटर या कंपनी से हुआ कोई भी आधिकारिक पत्राचार दिखा सकते हैं।

कानूनी जानकारों के मुताबिक, खासकर पुराने मामलों में जहां पूरे रिकॉर्ड मिलना मुश्किल होता है, वहां इन सभी दस्तावेजों को साथ में देखकर फैसला किया जाना चाहिए, न कि किसी एक फॉर्म के न होने पर दावा खारिज कर दिया जाए।

कंपनियों पर बढ़ेगा जवाबदेही का दबाव

यह फैसला उन कंपनियों के लिए साफ चेतावनी है जो रिकॉर्ड रखने में लापरवाही करती हैं। कानून के मुताबिक ये जिम्मेदारी एम्पलॉयर की होती है, इसलिए उनकी गलती का नुकसान कर्मचारियों को नहीं झेलना चाहिए और EPFO इस आधार पर उनका हक नहीं रोक सकता। जानकारों का कहना है कि अब कंपनियों को अपने इंटरनल ऑडिट और डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम मजबूत करने होंगे, ताकि आगे ऐसे विवाद न हों। कुल मिलाकर, यह फैसला कर्मचारियों और डिपार्टमेंट के बीच संतुलन को फिर से ठीक करने की कोशिश है।

सामाजिक सुरक्षा के अन्य मामलों पर पड़ेगा असर

बॉम्बे हाईकोर्ट ने संकेत दिया है कि यह फैसला सिर्फ EPF पेंशन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रेच्युटी, फैमिली पेंशन और ESI जैसे दूसरे सामाजिक सुरक्षा मामलों पर भी असर डाल सकता है। कोर्ट का साफ कहना है कि ऐसी योजनाओं का मकसद लोगों को सहारा देना है, न कि उन्हें कागजी पेचीदगियों में उलझाकर उनका हक छीनना।

साथ ही, अदालत ने EPFO के पहले के खारिज किए गए आदेश रद्द कर दिए और मामलों को दोबारा जांच के लिए वापस भेज दिया है। डिपार्टमेंट को निर्देश दिया गया है कि 12 हफ्तों के भीतर पूरी प्रक्रिया खत्म करे और जो लोग पात्र हों, उन्हें पेंशन का फायदा दे।

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First Published - April 24, 2026 | 6:54 PM IST

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