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Explainer: चेक बाउंस पर कितना सख्त है कानून? जानिए धारा 138 के नियम, अधिकार और बचने के उपाय

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एक्सपर्ट्स के मुताबिक चेक बाउंस सिर्फ पैसों का विवाद नहीं, कानूनी मामला भी है। सही समय पर नोटिस, सबूत और समझौता ही आपको बड़े नुकसान से बचा सकते हैं

Last Updated- May 26, 2026 | 5:04 PM IST
Cheque bounce
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

आज के दौर में व्यापार करना हो, किसी को उधार देना हो या कोई बड़ा लेनदेन करना हो, ‘चेक’ पेमेंट का एक बेहद भरोसेमंद और आसान जरिया माना जाता है। लेकिन क्या हो जब कोई आपको लाखों रुपये का चेक काट कर दे दे और आप उसे बैंक में लेकर जाएं, तो पता चले कि सामने वाले का खाता खाली है।

इसे आम बोलचाल में ‘चेक बाउंस’ होना कहते हैं। चेक बाउंस होना सिर्फ एक कारोबारी नुकसान या आपसी भरोसा टूटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय कानून के तहत एक गंभीर अपराध भी है। भारत में इसके लिए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत काफी कड़े नियम बनाए गए हैं

यदि आपके साथ भी ऐसा हुआ है, या आप व्यापार में चेक का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको अपने अधिकारों, सख्त समय-सीमा और कानूनी बारीकियों के बारे में जरूर पता होना चाहिए।

चेक बाउंस होने पर आपके पास क्या अधिकार हैं?

अक्सर लोगों को लगता है कि चेक बाउंस होना पैसों के लेनदेन का मामला है, इसलिए यह सिर्फ एक सिविल विवाद (दीवानी मामला) है। लेकिन कानून के नजर में ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसपर Consortium Legal के मैनेजिंग पार्टनर, वरुण कटियार बताते हैं, “अगर किसी का चेक बाउंस हो जाता है, तो जिस व्यक्ति के नाम पर वह चेक जारी किया गया था, उसे नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई करने का पूरा हक होता है।”

कटियार आगे बताते हैं, “यह कानून सिर्फ चेक की रकम वापस दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई मामलों में चेक जारी करने वाले पर आपराधिक जिम्मेदारी भी तय करता है। इसके तहत शिकायत करने वाला व्यक्ति मुआवजा और केस लड़ने में हुए खर्च की मांग कर सकता है। साथ ही, अदालत केस चलने के दौरान अंतरिम मुआवजा देने का आदेश भी दे सकती है।”

इस कानूनी व्यवस्था को समझाते हुए बैकिंग लीगल एक्सपर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अमितराज कौशल कहते हैं, “धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामले बेहद अलग तरह के होते हैं, क्योंकि इनमें पैसों की देनदारी और आपराधिक कार्रवाई दोनों शामिल होती हैं। शुरुआत में यह पैसे की वसूली से जुड़ा सिविल मामला होता है, लेकिन अगर चेक जारी करने वाला व्यक्ति कानूनी नोटिस मिलने और भुगतान का मौका दिए जाने के बाद भी रकम नहीं चुकाता, तो मामला आपराधिक दायरे में पहुंच जाता है।”

कौशल के अनुसार, ऐसी स्थिति में आरोपी के खिलाफ मजिस्ट्रेट अदालत में आपराधिक मामला चलाया जा सकता है। अगर आरोपी दोषी पाया जाता है, तो उसे जुर्माना, मुआवजा देने या यहां तक कि जेल की सजा भी हो सकती है। वहीं, शिकायत करने वाला व्यक्ति अपने पैसे की वसूली के लिए अलग से सिविल रिकवरी केस या आर्बिट्रेशन का सहारा भी ले सकता है।

जबकि इसपर विभावंगल अनुकूलकरा प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्य का कहना है, “धारा 138 चेक पाने वाले व्यक्ति को मजबूत कानूनी सुरक्षा देती है। अगर चेक फंड न होने जैसी वजहों से बाउंस होता है, तो शिकायतकर्ता को आधिकारिक डिमांड नोटिस भेजने और चेक की रकम के साथ मुआवजे की मांग करने का अधिकार मिलता है। चूंकि इसमें आपराधिक कार्रवाई का भी नियम है, इसलिए शिकायत करने वाला व्यक्ति कानूनी रूप से काफी मजबूत स्थिति में आ जाता है।”

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चेक बाउंस होते ही तुरंत क्या करें?

अगर आपका चेक बाउंस हो गया है, तो घर बैठकर हाथ पर हाथ धरे रहने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए कानून में एक तय प्रक्रिया है, जिसे तुरंत शुरू करना होता है।

स्टेप 1: बैंक से रिटर्न मेमो लेना

तीनों ही एक्सपर्ट्स का मानना है कि सबसे पहला काम बैंक से संपर्क करना है। कटियार कहते हैं, “पहला कदम बैंक से ‘चेक रिटर्न मेमो’ (Cheque Return Memo) इकट्ठा करना है, जिसमें चेक बाउंस होने की साफ वजह लिखी होती है।”

स्टेप 2: 30 दिनों के भीतर लीगल नोटिस

रिटर्न मेमो मिलने के बाद कानूनी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ती है। मौर्य बताते हैं, “बैंक से रिटर्न मेमो मिलने के बाद शिकायतकर्ता को 30 दिनों के भीतर चेक जारी करने वाले व्यक्ति को लिखित लीगल नोटिस भेजना जरूरी होता है। इस नोटिस में आरोपी को बकाया रकम चुकाने के लिए 15 दिनों का समय दिया जाता है।”

स्टेप 3: अदालत में केस फाइल करना (30 दिनों की सख्त समय-सीमा)

अगर लीगल नोटिस मिलने के बाद भी सामने वाला व्यक्ति 15 दिनों के भीतर पेमेंट नहीं करता, तो आपके पास अदालत जाने का अधिकार होता है। मौर्य के मुताबिक, “अगर तय 15 दिनों के भीतर पैसे नहीं चुकाए जाते, तो इसके बाद अगले 30 दिनों के अंदर धारा 138 के तहत अदालत में मामला दर्ज कराना जरूरी होता है।”

इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में डॉक्यूमेंट्स को संभालकर रखना बेहद जरूरी होता है। कौशल सलाह देते हैं, “शिकायतकर्ता को मूल चेक, बैंक मेमो, बिल, लोन से जुड़े डॉक्यूमेंट, एग्रीमेंट और लेनदेन से जुड़े सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने चाहिए। अगर नोटिस भेजने में देरी हो जाए, डॉक्यूमेंट अधूरे हों या नोटिस में कोई गलती हो, तो इससे पूरा केस कमजोर पड़ सकता है।”

आम गलतियां जो मजबूत केस को भी कर देती हैं कमजोर

कई बार लोग सही होने के बावजूद अदालत में केस हार जाते हैं या उनका मामला सालों तक लटका रहता है। इसकी बड़ी वजह वे छोटी-छोटी गलतियां होती हैं, जो कानूनी जानकारी की कमी के कारण अनजाने में हो जाती हैं।

पहली गलती: टाइमलाइन (समय-सीमा) का पालन न करना

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, चेक बाउंस के मामलों में समय का पालन सबसे अहम होता है। कटियार बताते हैं, “लोग सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि वे कानून में तय समय-सीमा का पालन नहीं करते। कई बार लोग लीगल नोटिस भेजने या अदालत में शिकायत दर्ज कराने में देरी कर देते हैं, जिससे पूरा मामला कमजोर पड़ जाता है या खारिज होने की नौबत आ जाती है।”

दूसरी गलती: कागजी सबूतों की कमी और मौखिक वादे

भारत में आज भी कारोबार का बड़ा हिस्सा आपसी भरोसे और मौखिक समझौतों पर चलता है, लेकिन कानून की नजर में यही सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। मौर्य के मुताबिक, “अगर आपके पास लिखित सबूत, कर्ज से जुड़े डॉक्यूमेंट, डिलीवरी प्रूफ या बैंक रिटर्न मेमो नहीं है, तो इससे केस काफी कमजोर हो सकता है। लोग अक्सर मौखिक समझौतों पर भरोसा कर लेते हैं, जो बाद में उनके लिए भारी नुकसान का कारण बनता है।”

तीसरी गलती: नोटिस के ड्राफ्ट और पते में गड़बड़ी

इस कानूनी कमजोरी को समझाते हुए कौशल कहते हैं, “अगर लीगल नोटिस सही तरीके से तैयार नहीं किया गया हो, आरोपी का पता गलत लिखा हो या नोटिस पहुंचने का सबूत मौजूद न हो, तो इससे पूरा केस कमजोर पड़ सकता है। कई बार लोग अदालत से बाहर भावनात्मक या गुस्से में बातचीत करने लगते हैं, जिससे बाद में समझौते की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है।” 

वह यह भी बताते हैं कि बिना किसी लिखित एग्रीमेंट के ब्लैंक सिक्योरिटी चेक लेना या देना एक बड़ी व्यावहारिक गलती साबित हो सकती है।

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क्या आरोपी के पास भी हैं कानूनी अधिकार? 

भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत ‘फेयर ट्रायल’ है, यानी दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा और बराबर मौका मिलना। इसलिए धारा 138 में जहां शिकायतकर्ता को मजबूत कानूनी अधिकार दिए गए हैं, वहीं आरोपी भी पूरी तरह बेबस नहीं होता।

कौशल इस पहलू को समझाते हुए कहते हैं, “चेक बाउंस के मामलों में आरोपी के पास भी कई अहम कानूनी अधिकार और सुरक्षा होती हैं। आरोपी अदालत में यह दलील देकर अपना बचाव कर सकता है कि जिस रकम के लिए चेक दिया गया था, वह कोई कानूनी रूप से मान्य कर्ज या देनदारी थी ही नहीं।”

कौशल के अनुसार, आरोपी इन आधारों पर अपना बचाव कर सकता है:

  • प्रक्रिया में हुई गलतियां भी आरोपी के बचाव का आधार बन सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर शिकायतकर्ता ने तय 30 दिनों के भीतर लीगल नोटिस नहीं भेजा हो या अदालत में केस दर्ज कराने में देरी की हो, तो इससे मामला कमजोर पड़ सकता है।
  • दबाव या जबरदस्ती भी आरोपी के बचाव का आधार बन सकती है। अगर यह साबित हो जाए कि चेक डराकर, धमकाकर या जबरन लिया गया था, तो अदालत इसे आरोपी के पक्ष में एक अहम तथ्य मान सकती है।
  • सिक्योरिटी चेक के गलत इस्तेमाल का तर्क भी आरोपी अदालत में रख सकता है। अगर चेक सिर्फ गारंटी या सुरक्षा के तौर पर दिया गया था और बाद में उसका गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया, तो यह आरोपी के बचाव का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
  • अगर चेक की रकम पहले ही किसी दूसरे माध्यम से चुका दी गई हो या दोनों पक्षों के बीच पहले से समझौता हो चुका हो, तो आरोपी इसे भी अपने बचाव के तौर पर अदालत में पेश कर सकता है।

इसके अलावा, कानून आरोपी को कई अहम अधिकार भी देता है। आरोपी को जमानत लेने, अपनी पसंद का वकील रखने, गवाहों से जिरह करने और केस में किसी भी समय समझौता करने का पूरा कानूनी अधिकार होता है।

अदालत के बाहर समझौता: कानूनी झंझट बचाने का सबसे आसान रास्ता

चूंकि चेक बाउंस के ज्यादातर मामले पैसों के लेनदेन से जुड़े होते हैं, इसलिए भारतीय अदालतें भी चाहती हैं कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद सुलझा लें। कटियार कहते हैं, “चेक बाउंस के मामलों में अदालत के बाहर समझौता पूरी तरह कानूनी रूप से सही और संभव है। जैसे ही दोनों पक्ष किसी उचित समझौते पर पहुंच जाते हैं, शिकायतकर्ता अदालत में उसे दर्ज कराकर किसी भी समय केस वापस ले सकता है। चूंकि यह मूल रूप से पैसों के लेनदेन का मामला होता है, इसलिए इसे बेवजह आपराधिक विवाद बनाए बिना सुलझाना बेहतर माना जाता है।”

अदालतों के रुख पर बात करते हुए मौर्य बताते हैं, “अदालतें भी दोनों पक्षों को आपसी समझौते के लिए बातचीत करने के लिए कहती हैं। केस की सुनवाई के दौरान पक्षकार पेमेंट की शर्तें तय कर सकते हैं, किस्तों में रकम चुकाने पर सहमत हो सकते हैं या आपसी सहमति से सेटलमेंट की राशि में बदलाव भी कर सकते हैं। समझौता हो जाने पर शिकायतकर्ता अदालत के सामने केस को कंपाउंड करने या वापस लेने का विकल्प चुन सकता है।”

हालांकि, अदालत के बाहर समझौते को लेकर कौशल एक अहम कानूनी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। उनके मुताबिक, “समझौता पूरी तरह कानूनी और स्वीकार्य है। इससे लंबे मुकदमे, खर्च और व्यापारिक रिश्तों में पैदा होने वाली कड़वाहट से बचा जा सकता है। दोनों पक्ष शिकायत दर्ज होने से पहले, ट्रायल के दौरान या अपील के स्तर पर भी समझौता कर सकते हैं। लेकिन यह बेहद जरूरी है कि समझौता हमेशा लिखित और सही तरीके से डॉक्यूमेंट में दर्ज हो। उसमें भुगतान की शर्तें, तारीखें और अगर कोई पक्ष समझौते से मुकर जाए तो उसके कानूनी परिणाम क्या होंगे, यह साफ-साफ लिखा होना चाहिए। इससे दोनों पक्षों का समय और कानूनी खर्च बचता है, कारोबारी रिश्ते बने रहते हैं और जेल जाने जैसी स्थिति से भी बचाव हो सकता है।”

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क्या है एक्सपर्ट्स की सामूहिक सलाह?

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 को बेहद सख्त कानून माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य कारोबार और लेनदेन में चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना है, ताकि कोई व्यक्ति फर्जी या बिना रकम वाले चेक देकर दूसरे को धोखा न दे सके। तीनों एक्सपर्ट्स की राय का सार यही है कि चेक बाउंस होने की स्थिति में घबराने के बजाय तुरंत अपने सभी डॉक्यूमेंट सही रखें और कानून में तय समय-सीमा, खासकर 30 दिनों के भीतर लीगल नोटिस भेजने के नियम का सख्ती से पालन करें। वहीं, अगर किसी कारण आपका चेक बाउंस हो गया है, तो गुस्से या अहंकार में मामला बढ़ाने के बजाय लिखित तौर पर अदालत के बाहर समझौता करना अक्सर सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक रास्ता साबित होता है।

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First Published - May 26, 2026 | 3:58 PM IST

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