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Leave Encashment Tax Rules: नौकरीपेशा लोगों को बची छुट्टियों के पैसे पर कितनी मिलेगी टैक्स छूट?

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एक्सपर्ट के मुताबिक, रिटायरमेंट या नौकरी बदलने पर मिलने वाले लीव एनकैशमेंट पर टैक्स के नियम अलग हैं। जानिए किसे पूरी छूट मिलेगी और किसे टैक्स देना होगा

Last Updated- June 02, 2026 | 4:19 PM IST
Income TAX
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

ITR Filing 2026-27: नौकरीपेशा जिंदगी में अक्सर लोग काम के दबाव या फ्यूचर प्लानिंग के चक्कर में अपनी सालाना छुट्टियां पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाते। ये बची हुई छुट्टियां धीरे-धीरे जमा होती रहती हैं और रिटायरमेंट या नौकरी बदलते समय एक बड़ी रकम के रूप में कर्मचारी को मिलती हैं। इसे फाइनेंशियल और कॉरपोरेट की भाषा में ‘लीव एनकैशमेंट’ कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेहनत की कमाई और बची हुई छुट्टियों के बदले मिलने वाले इस पैसे पर टैक्स का क्या नियम है?

असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने इसपर बेहद कड़े और स्पष्ट नियम तय किए हैं। अगर आप भी सैलरीड क्लास में आते हैं, तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि इस रकम का कितना हिस्सा आपकी जेब में जाएगा और कितने हिस्से पर सरकार टैक्स वसूल लेगी।

सरकारी और प्राइवेट कर्मचारियों के लिए हैं अलग-अलग नियम

जब बात ‘लीव एनकैशमेंट’ पर टैक्स छूट की आती है, तो इनकम टैक्स का कानून सरकारी और प्राइवेट कर्मचारियों को अलग-अलग चश्मे से देखता है। केंद्र या राज्य सरकार के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह नियम बेहद सीधा और राहत भरा है। सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेंट के समय मिलने वाली लीव एनकैशमेंट का पूरा पैसा टैक्स के दायरे से बाहर हो जाता है। यानी उन्हें इस पर एक भी रुपया टैक्स नहीं देना पड़ता।

लेकिन प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों, लोकल अथॉरिटी के स्टाफ और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) में काम करने वाले लोगों के लिए कहानी थोड़ी अलग है। प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों को ‘लीव एनकैशमेंट’ पर पूरी छूट नहीं मिलती, बल्कि कानून के तहत एक सीमित दायरे में ही टैक्स से राहत दी जाती है।

इस बारे में क्लियरटैक्स की टैक्स एक्सपर्ट CA चांदनी आनंदन बताती हैं, “सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेंट के समय मिलने वाली लीव सैलरी पूरी तरह टैक्स-फ्री होती है, लेकिन प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए ‘लीव एनकैशमेंट’ की छूट धारा 10(10AA) के तहत तय नियमों के दायरे में आती है।”

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खास फॉर्मूले से तय होती है प्राइवेट सेक्टर की टैक्स छूट

प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए टैक्स में छूट का कैलकुलेशन का एक खास तरीका है। इसके तहत चार अलग-अलग स्थितियों या पैसों का आकलन किया जाता है और उनमें से जो भी रकम सबसे कम होती है, केवल उसी पर टैक्स में छूट मिलती है।

इसमें पहली स्थिति यह है कि आपको असल में एम्प्लॉयर से कितनी रकम ‘लीव एनकैशमेंट’ के रूप में मिली है। दूसरी स्थिति सरकार द्वारा तय की गई 25,00,000 रुपये की कानूनी सीमा है। तीसरी स्थिति यह देखी जाती है कि कर्मचारी के रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ने के ठीक पहले के 10 महीनों का औसत वेतन कितना था।

चौथी और आखिरी स्थिति में बची हुई छुट्टियों के बदले मिलने वाली नकद राशि का कैलकुलेशन किया जाता है। इसके लिए माना जाता है कि कर्मचारी की नौकरी के हर साल में अधिकतम 30 दिन की छुट्टी बची हुई है।

इन चारों कैलकुलेशन में से जो भी आंकड़ा सबसे छोटा निकल कर आएगा, उतना ही पैसा टैक्स-फ्री होगा और उससे ऊपर की बची हुई पूरी राशि पर कर्मचारी को अपनी टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स चुकाना होगा।

SK पटोदिया एंड एसोसिएट्स LLP में एसोसिएट डायरेक्टर (डायरेक्ट टैक्सेस) मिहिर तन्ना कहते हैं, “कई कर्मचारी कैलकुलेशन करते समय अपनी कंपनी की लीव पॉलिसी, जैसे साल में 45 दिनों की छुट्टी, को आधार बना लेते हैं। लेकिन टैक्स नियमों के मुताबिक छुट्टियों की एलिजिबिलिटी के कैलकुलेशन में हर साल अधिकतम 30 दिनों की छुट्टी ही मानी जाती है।”

₹25 लाख की लिमिट का असल गणित और सैलरी की परिभाषा

प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए 25 लाख रुपये की यह टैक्स छूट की सीमा पूरे जीवनकाल के लिए तय की गई है। यानी अगर आपने एक बार इस सीमा का पूरा या कुछ हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है, तो भविष्य में उपलब्ध छूट उसी हिसाब से कम हो जाएगी। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी कर्मचारी ने पहले नौकरी छोड़ते समय ‘लीव एनकैशमेंट’ पर टैक्स छूट ली थी, तो उस समय मिली छूट की राशि मौजूदा 25 लाख रुपये की सीमा से घटा दी जाएगी।

चांदनी आनंदन के मुताबिक, 25 लाख रुपये की बढ़ी हुई सीमा प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए अधिकतम टैक्स छूट की कैप की तरह काम करती है। इसका सबसे ज्यादा लाभ उन कर्मचारियों को मिलता है जिन्होंने लंबे समय तक नौकरी की है और जिनकी सैलरी अधिक है, क्योंकि अब उनके ‘लीव एनकैशमेंट’ का बड़ा हिस्सा टैक्स से फ्री रह सकता है।

इस पर मिहिर तन्ना बताते हैं कि इस टैक्स छूट के कैलकुलेशन में ‘सैलरी’ से मतलब केवल बेसिक सैलरी, डियरनेस अलाउंस (अगर वह रिटायरमेंट बेनिफिट्स का हिस्सा हो) और टर्नओवर के आधार पर तय कमीशन से होता है। इसके अलावा, नौकरी की अवधि गिनते समय केवल पूरे वर्षों को ही माना जाता है। यदि सेवा अवधि में अतिरिक्त महीने, जैसे 10 महीने, शामिल हों तो उन्हें कैलकुलेशन में नहीं जोड़ा जाता।

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नौकरी के दौरान छुट्टियां भुनाना पड़ेगा भारी

कई बार कर्मचारी पैसों की जरूरत होने पर या हर साल अपनी बची हुई छुट्टियों को नौकरी में रहते हुए ही भुना लेते हैं। टैक्स के लिहाज से ऐसा करना एक घाटे का सौदा साबित हो सकता है। नियम साफ कहते हैं कि यदि कोई कर्मचारी सेवा में रहते हुए ‘लीव एनकैशमेंट’ कराता है, तो वह पैसा पूरी तरह से टैक्सेबल होता है। उस पर किसी भी प्रकार की छूट नहीं मिलती।

मिहिर तन्ना बताते हैं, “टैक्स के नजरिए से रिटायरमेंट के लिए छुट्टियों को बचाकर रखना ज्यादा फायदेमंद है। हालांकि, अगर बची हुई छुट्टियों की वैल्यू 25 लाख रुपये से ऊपर जाने की उम्मीद है, तो टैक्स के हाई स्लैब से बचने के लिए बीच-बीच में छुट्टियों का इस्तेमाल कर लेना समझदारी हो सकती है।”

इसपर चांदनी आनंदन कहती हैं कि कि कर्मचारी अक्सर यह मान लेते हैं कि इस्तीफा देने पर हमेशा पूरी छूट मिलती है, जबकि ऐसा तब तक नहीं होता जब तक कि वह भुगतान कानून के तहत रिटायरमेंट से जुड़ी शर्तों को पूरा न करता हो।

ITR फाइल करते वक्त इन बातों का रखें ख्याल

अक्सर कर्मचारी फॉर्म 16 को देखकर यह मान लेते हैं कि उसमें जो पैसा अलग से दिखाया गया है, वह पूरी तरह टैक्स-फ्री है, जबकि ऐसा नहीं होता। ITR फाइल करते समय टैक्सपेयर्स को ‘लीव एनकैशमेंट’ की ग्रॉस राशि को ‘सैलरी एस पर सेक्शन 17(1)’ में दिखाना होता है और छूट वाले हिस्से को धारा 10(10AA) के तहत अलग से डिस्क्लोज करना पड़ता है।

मिहिर तन्ना बताते हैं, “यदि नौकरी के दौरान मिले एरियर या एनकैशमेंट पर धारा 89 के तहत रिलीफ का दावा करना है, तो ITR भरने से पहले ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म 10E भरना जरूरी है।”

चांदनी आनंदन सलाह देती हैं कि किसी भी तरह की पूछताछ से बचने के लिए टैक्सपेयर्स को कंपनी से मिला ‘लीव एनकैशमेंट’ स्टेटमेंट, इस्तीफा या रिटायरमेंट लेटर और पिछले 10 महीने की सैलरी की डिटेल संभाल कर रखना चाहिए। एक खास राहत यह भी है कि यदि किसी कर्मचारी की मौक के बाद उसके कानूनी वारिस को लीव सैलरी पेमेटं किया जाता है, तो उस पर कोई टैक्स नहीं लगता, क्योंकि उनके बीच एम्प्लॉयर और कर्मचारी का रिश्ता नहीं होता।

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First Published - June 2, 2026 | 4:19 PM IST

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