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Explainer: क्या सिर्फ परिवार की प्रॉपर्टी में रहने से मिल जाता है मालिकाना हक? जानिए कानून क्या कहता है

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एक्सपर्ट के मुताबिक, किसी घर में लंबे समय तक रहने से मालिकाना हक नहीं मिलता। असली अधिकार वैध वसीयत, उत्तराधिकार और कानूनी कागजातों से ही तय होता है

Last Updated- May 19, 2026 | 5:31 PM IST
property dispute
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

हमारे देश में परिवारों के भीतर संपत्ति को लेकर विवाद होना एक आम बात है। अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता के बनाए घर में उनके बच्चे, भाई-बहन या रिश्तेदार सालों तक साथ रहते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई एक बेटा या बेटी माता-पिता के साथ उनके आखिरी समय तक उसी घर में रहता है, उसकी देखरेख करता है और घर के सारे बिल भी भरता है। ऐसे में, सालों तक उस घर में रहने वाले व्यक्ति के मन में यह सोच बैठ जाती है कि इस प्रॉपर्टी पर उनका प्राकृतिक या कानूनी रूप से ज्यादा हक है।

लेकिन क्या वाकई किसी पारिवारिक संपत्ति में लंबे समय तक रहने मात्र से आप उसके मालिक बन जाते हैं? क्या देश का कानून भी इस बात को स्वीकार करता है? आइए, एक्सपर्ट से समझते हैं कि हमारे देश में इसको लेकर क्या नियम-कानून हैं।

कब्जा और मालिकाना हक: कानून की नजर में दोनों अलग-अलग बातें

प्रॉपर्टी के मामलों में सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि लोग ‘कब्जे’ (Possession) को ही ‘मालिकाना हक’ (Ownership) मान बैठते हैं। कानूनी रूप से इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) के एलुमनाई और लीगल प्रैक्टिशनर, एडवोकेट समर्थ लूथरा इस पर बहुत स्पष्ट राय रखते हैं। उनका कहना है, “सिर्फ कई साल तक किसी पारिवारिक संपत्ति में रहने भर से कोई व्यक्ति उसका कानूनी मालिक नहीं बन जाता। मालिकाना हक तभी माना जाता है, जब उसके पीछे कोई वैध कानूनी आधार हो। जैसे- विरासत, प्रॉपर्टी का बंटवारा (Partition), गिफ्ट डीड, वसीयत, रिलिनक्विशमेंट यानी हक छोड़ना, कोर्ट का आदेश या फिर परिवार के बीच हुआ कोई वैध समझौता “

समर्थ आगे बताते हैं कि किसी घर में लंबे समय तक रहने का मतलब सिर्फ इतना होता है कि आप वहां रह रहे थे, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि आप उस संपत्ति के मालिक कैसे बने। पारिवारिक मामलों में अक्सर लोग रिश्तों, सुविधा या माता-पिता की देखभाल की वजह से एक ही घर में रहने लगते हैं। कानून ऐसे लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के जबरन घर से निकालने (Forcible Dispossession) से कुछ हद तक सुरक्षा जरूर देता है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उन्हें उस संपत्ति पर मालिकाना हक मिल गया।

रियल एस्टेट और फिनटेक सेक्टर की कंपनी जस्टो रीयलफिनटेक लिमिटेड (JUSTO RealFintech Ltd) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, पुष्पमित्र दास भी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। वे कहते हैं, “कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी में रह तो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह उसका कानूनी मालिक भी है। घर में रहने का मतलब सिर्फ उस जगह पर कब्जा होना है, जबकि असली मालिकाना हक सेल डीड, वसीयत, बंटवारे के दस्तावेज या उत्तराधिकार से जुड़े कागजों से तय होता है।”

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बिजली बिल, टैक्स रसीद और आधार कार्ड: क्या ये हैं मालिकाना हक के सबूत?

आमतौर पर लोगों को लगता है कि अगर किसी घर के पते पर उनका आधार कार्ड बना हुआ है, बिजली-पानी के बिल उनके नाम पर आते हैं या वे कई सालों से उस घर का प्रॉपर्टी टैक्स भर रहे हैं, तो इससे कोर्ट में उनका मालिकाना दावा मजबूत हो जाता है। लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि कानून के नजरिए से यह एक बड़ी गलतफहमी है।

पुष्पमित्र इस पर चेतावनी देते हुए कहते हैं, “बिल्कुल नहीं। बिजली-पानी के बिल, आधार कार्ड, वोटर आईडी या टैक्स की रसीदें सिर्फ यह साबित करती हैं कि कोई व्यक्ति उस पते पर रह रहा था या उसका उस जगह से संबंध था। यहां तक कि प्रॉपर्टी टैक्स भरना या सरकारी रिकॉर्ड में म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) होना भी सिर्फ सहायक दस्तावेज माने जाते हैं। इन्हें मालिकाना हक का अंतिम और पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।”

समर्थ लूथरा इस कानूनी पहलू को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, “आधार कार्ड या बिजली बिल जैसे दस्तावेज मुख्य रूप से प्रशासनिक और वेरिफिकेशन (KYC) के काम आते हैं। प्रॉपर्टी विवाद में इनकी कानूनी अहमियत बहुत सीमित होती है। ये सिर्फ इतना दिखा सकते हैं कि कोई व्यक्ति वहां रह रहा था या उसका उस जगह पर कब्जा था, लेकिन ये कभी भी सेल डीड, गिफ्ट डीड या रजिस्टर्ड वसीयत की जगह नहीं ले सकते। ऐसे दस्तावेज किसी व्यक्ति को संपत्ति बेचने, गिरवी रखने या दूसरों को वहां आने से रोकने का कानूनी अधिकार नहीं देते।”

उन्होंने कहा कि यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी कई बार अपने फैसलों में साफ कर चुकी है कि म्यूनिसिपल या रेवेन्यू रिकॉर्ड में किसी का नाम दर्ज होना सिर्फ टैक्स वसूली और प्रशासनिक कामकाज के लिए होता है। इससे न तो किसी व्यक्ति का मालिकाना हक अपने आप बन जाता है और न ही खत्म होता है।

भावनाएं बनाम कानून: पारिवारिक प्रॉपर्टी विवादों की सबसे बड़ी गलतफहमियां

पारिवारिक संपत्ति के विवादों में अक्सर कानूनी तथ्यों से ज्यादा भावनाएं हावी हो जाती हैं। लोग उस घर से गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं, जहां उनका बचपन बीता हो और वे बड़े हुए हों।

पुष्पमित्र दास के मुताबिक, “पारिवारिक प्रॉपर्टी विवादों में सबसे आम गलतफहमी यही होती है कि लोग सोचते हैं, ‘मैं इतने सालों से यहां रह रहा हूं, इसलिए इस घर में मेरा भी हिस्सा है।’ कई लोगों को लगता है कि घर के रख-रखाव, मरम्मत या खर्चों में पैसा लगाने से उन्हें कानूनी हक मिल जाता है। लेकिन कानून भावनात्मक जुड़ाव और मालिकाना हक को पूरी तरह अलग मानता है।”

इसके अलावा, समाज में एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि अखबार में किसी बेटे, बेटी या परिवार के सदस्य को ‘बेदखल’ (Disown) करने का नोटिस छपवा देने से उसका संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है। लेकिन समर्थ बताते हैं कि कानूनी तौर पर मामला इतना सीधा नहीं होता और इसके पीछे कई जरूरी कानूनी पहलू जुड़े होते हैं।

समर्थ लूथरा कहते हैं, “अखबार में छपा ऐसा कोई नोटिस किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर विरासत से बाहर नहीं कर सकता। इससे सिर्फ इतना जाहिर होता है कि परिवार में रिश्ते खराब हैं या माता-पिता भविष्य में उसकी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। लेकिन इसे वसीयत नहीं माना जाता। अगर माता-पिता बिना वसीयत किए (Intestate) गुजर जाते हैं, तो संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार कानूनों के हिसाब से ही होगा। किसी को अपनी खुद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति (Self-Acquired Property) से अलग करने के लिए सही एस्टेट प्लानिंग और वैध वसीयत जरूरी होती है।”

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क्या कागजात में नाम न होने पर भी मिल सकता है अधिकार?

इस पूरे मामले का एक सकारात्मक पहलू भी है। दोनों एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर किसी असली वारिस का नाम प्रॉपर्टी के दस्तावेजों में दर्ज नहीं है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि उसका कानूनी दावा खत्म हो गया।

पुष्पमित्र बताते हैं, “पारिवारिक संपत्तियों में, खासकर ऐसी संपत्तियों में जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं और जिनके रिकॉर्ड समय पर अपडेट नहीं हुए, वहां सिर्फ कागजों में नाम न होने से किसी का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। अगर कोई व्यक्ति वैध कानूनी वारिस है, पुश्तैनी संपत्ति (Ancestral Property) में उसका हिस्सा बनता है, या वह किसी वसीयत या पारिवारिक समझौते का हिस्सा है, तो कोर्ट सिर्फ रिकॉर्ड में दर्ज नाम नहीं देखता। अदालत संपत्ति का इतिहास, परिवार की व्यवस्था और उत्तराधिकार कानूनों को भी ध्यान में रखती है।”

इसके साथ ही, समर्थ लूथरा यह भी जोड़ते हैं कि कई मामलों में मालिकाना हक न होने के बावजूद कानून किसी व्यक्ति को रहने का अधिकार देता है। उदाहरण के तौर पर, घरेलू हिंसा से ‘महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ के तहत महिलाओं को साझा घर में रहने की कानूनी सुरक्षा मिलती है, भले ही संपत्ति उनके नाम पर न हो। इसी तरह ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ बुजुर्ग माता-पिता को उनकी संपत्ति में शांतिपूर्वक रहने और भरण-पोषण का अधिकार देता है। यहां तक कि अगर उन्होंने संपत्ति बच्चों के नाम कर दी हो, तब भी कानून उन्हें सुरक्षा देता है।

निष्कर्ष के तौर पर समझें तो दोनों एक्सपर्ट्स इस बात से सहमत हैं कि भारतीय कानून में रहने का अधिकार और मालिकाना हक दो पूरी तरह अलग चीजें हैं। किसी घर में लंबे समय तक रहना आपको भावनात्मक जुड़ाव और संतुष्टि दे सकता है, लेकिन अदालत में फैसला हमेशा मजबूत कानूनी दस्तावेजों और वैध उत्तराधिकार के नियमों के आधार पर ही होता है।

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First Published - May 19, 2026 | 5:31 PM IST

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