ऋणदाता अब अच्छा भुगतान रिकॉर्ड रखने वाले ग्राहकों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसके चलते पिछले पांच वर्षों से समग्र ऋण बाजार में पहली बार ऋण लेने वालों का हिस्सा लगातार घट रहा है। इसकी वजह से कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, विशेष रूप से मोबाइल फोन के लिए कर्ज ने नए ग्राहकों के मामले में दोपहिया वाहन और कृषि ऋण की जगह ले ली है।
देश के खुदरा ऋण बाजार में कोरोना महामारी के बाद आए बदलाव पर प्रकाश डालते हुए भारत के सबसे बड़े क्रेडिट ब्यूरो ट्रांसयूनियन सिबिल के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी भावेश जैन ने कहा, ‘इसका मतलब यह नहीं है कि वित्तीय प्रणाली में प्रवेश करने वाले लोगों की संख्या में कमी आ रही है। इसका तात्पर्य यह है कि नए कर्जदार जोड़े जाने की दर की तुलना में समग्र ऋण बाजार तेजी से बढ़ रहा है।’
उन्होंने कहा कि बैंक और ऋणदाता पहले कर्ज लेने और चुकाने वाले (क्रेडिट इतिहास) ग्राहकों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि कर्ज आवंटन में विश्वास और पुनर्भुगतान व्यवहार अहम हो गया है।
जैन ने कहा, ‘कोविड से पहले कर्ज लेने वाले नए ग्राहक मुख्य रूप से कृषि ऋण, प्राथमिकता क्षेत्र वाले ऋण और दोपहिया वाहन ऋण के माध्यम से औपचारिक प्रणाली में प्रवेश करते थे। लेकिन अब टिकाऊ उपभोक्ता और खास तौर पर मोबाइल फोन के लिए कर्ज औपचारिक ऋण बाजार में प्रवेश होने का बड़ा माध्यम बन गया है।’
जैन ने कहा कि इस बदलाव के केंद्र में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) हैं। उन्होंने बताया, ‘एनबीएफसी इस परिवर्तन का नेतृत्व कर रही हैं क्योंकि वे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पारिस्थितिकी तंत्र को बड़े पैमाने पर फाइनैंस कर रही हैं। वे उपकरणों और छोटे-मोटे उपभोग के लिए व्यापक स्तर पर कर्ज देती हैं।’ उन्होंने कहा कि फिनटेक कंपनियां पर्सनल लोन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
पिछली कुछ तिमाहियों में एक और महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति स्वर्ण ऋण (गोल्ड लोन) में वृद्धि रही है। खुदरा ऋण श्रेणी में यह लगभग 20 लाख करोड़ रुपये के साथ दूसरे स्थान पर है। आवास ऋण लगभग 44 लाख करोड़ रुपये के साथ पहले स्थान पर बने हुए हैं।
जैन ने कहा, ‘पिछली चार से छह तिमाहियों में गोल्ड लोन का मूल्य और मात्रा दोनों में तेजी से वृद्धि हुई है। सरल शब्दों में कहें तो देश में आज लगभग हर दूसरा खुदरा ऋण प्रभावी रूप से गोल्ड लोन है।’ उन्होंने कहा कि गोल्ड लोन अब केवल खुदरा उत्पादों में से एक नहीं रह गया है बल्कि यह प्रमुख उत्पाद बन गया है। जैन ने कहा कि गोल्ड लोन ने यह उपलब्धि बहुत कम औसत राशि और बहुत कम समय के बावजूद हासिल की है। औसत आवास ऋण की राशि लगभग 37 से 38 लाख रुपये है वहीं गोल्ड लोन के मामले में यह लगभग 2 लाख रुपये है।
गोल्ड लोन जिसे कभी दक्षिण भारतीय चलन माना जाता था, अब पूरे देश में फैल चुका है। जैन ने कहा, ‘आज यह पूरे भारत में प्रचलित है। चाहे उत्तर प्रदेश हो, राजस्थान हो, गुजरात हो या पंजाब, हर कोई सोने के बदले ऋण ले और दे रहा है।’ यहां तक कि ऋण लेने वालों का प्रोफाइल भी व्यापक है। गोल्ड लोन लेने वाले हर 5 में से एक जेनज़ी पीढ़ी के हैं और करीब 40 फीसदी महिलाएं हैं।
हालांकि जैन ने इस क्षेत्र में उभरते जोखिमों की ओर इशारा किया। जैन ने कहा, ‘जब सोने की कीमतें कुछ ही महीनों में 30 से 40 फीसदी तक बढ़ जाती हैं तो इसका सीधा असर ऋण-मूल्य अनुपात (एलटीवी) और जोखिम प्रबंधन पर पड़ता है, खास कर छोटे ऋणों के मामले में।’
जैन ने इस बात पर जोर दिया कि भारत में ऋण चुकाने की संस्कृति में पिछले एक दशक में, विशेष रूप से कोविड-19 के बाद के पांच वर्षों में काफी सुधार हुआ है। उन्होंने कहा, ‘खुदरा और लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) में ऋण भुगतान में चूक का स्तर एक दशक के निचले स्तर पर है।’ जैन ने कहा कि अनिश्चितताओं से भरे वैश्विक परिवेश में खुदरा और एमएसएमई में ऋण भुगतान में चूक 2 फीसदी से नीचे बनाए रखना बड़ी उपलब्धि है।
जैन ने इस सुधार का श्रेय कर्जदारों के बीच ‘स्व-प्रेरित वित्तीय अनुशासन’ को दिया। उन्होंने कहा, ‘उन्होंने कहा, ‘आजकल जब कर्जदार अपनी सिबिल रिपोर्ट निकालते हैं तो उनमें से कई तुरंत सुधारात्मक कार्रवाई करते हैं। एक तिहाई मामलों में जब कोई कर्जदार क्रेडिट रिपोर्ट देखता है तो अगले 90 दिनों के भीतर वास्तव में भुगतान कर दिया जाता है।’
हालांकि उन्होंने कुछ ऐसे क्षेत्रों की ओर इशारा किया जिन पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिनमें संपत्ति के बदले सूक्ष्म ऋण और किफायती आवास शामिल हैं। इस सेगमेंट में व्यापक बाजार की तुलना में ऋण अदायगी चूक का स्तर अभी भी अधिक है। वाणिज्यिक वाहन क्षेत्र चिंता का एक अन्य क्षेत्र है।
जैन ने कहा, ‘इस क्षेत्र में कोई खास गिरावट नहीं आई है लेकिन अन्य खुदरा उत्पादों की तरह इसमें उतना सुधार नहीं हुआ है।’ उन्होंने बताया कि ईंधन की कीमतें, मालवहन लागत, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और वैश्विक अनिश्चितताएं परिवहन व्यवसाय की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं इसलिए वाणिज्यिक वाहन बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं।
जैन ने रिजर्व बैंक के पाक्षिक रिपोर्टिंग की जगह साप्ताहिक क्रेडिट रिपोर्टिंग करने के कदम का भी स्वागत किया और इसे देश के ऋण बुनियादी ढांचे में सबसे प्रगतिशील बदलाव में से एक बताया।
जैन ने कहा, ‘आरबीआई का यह कदम बेहद प्रगतिशील है क्योंकि इससे उपभोक्ताओं को सीधा लाभ मिलता है। ऋण संबंधी आंकड़े जितने नए होंगे, ऋण देने के निर्णय उतने ही बेहतर होंगे। साप्ताहिक रिपोर्टिंग से अर्थव्यवस्था कर्ज लेने वालों के व्यवहार और भुगतान के तरीकों में होने वाले बदलावों पर तेजी से प्रतिक्रिया दे पाती है।’ जैन के अनुसार भारत धीरे-धीरे जोखिम आधारित मूल्य निर्धारण की ओर बढ़ रहा है।