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छोटी सी गलती पड़ सकती है भारी! चोरी, एक्सीडेंट या क्लेम – इन 10 लापरवाहियों से खारिज हो सकता है आपका मोटर इंश्योरेंस दावा

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छोटी-छोटी लापरवाहियां जैसे बिना लाइसेंस ड्राइविंग, देरी से सूचना देना, या गलत उपयोग—मोटर बीमा के बड़े दावे खारिज कर सकती हैं।

Last Updated- April 06, 2026 | 7:28 AM IST
Insurance
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दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के पिछले दिनों आए एक फैसले से पता चलता है कि कैसे छोटी सी चूक भी बीमाधारकों के दावे खारिज करा सकती हैं। आयोग ने रमेश रावत बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि जो मारुति विटारा ब्रेजा कार चोरी हुई, उसके भीतर चाबी लगी छोड़ देना लापरवाही थी चाहे चाबी खराब ही क्यों न हो। इसीलिए बीमा का दावा खारिज किया जाना सही है।

इस फैसले से एक सच्चाई सभी के सामने आई। वाहन बीमा के दावे अक्सर इसीलिए खारिज नहीं किए जाते कि उनमें नियमों और शर्तों का गंभीर उल्लंघन होता है। कई बार दावे रोजमर्रा की अनदेखी के कारण भी नकार दिए जाते हैं।

वैध लाइसेंस बिना गाड़ी चलाना

अगर वाहन दुर्घटना के समय चालक वैध लाइसेंस के बगैर गाड़ी चला रहा हो तो यह मोटर यान अधिनियम, 1988 और वाहन बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है। बीमाकर्ता यह कहकर दावे को खारिज कर सकते हैं कि वाहन को अनधिकृत व्यक्ति चला रहा था, जो वैधानिक आवश्यकता का भी उल्लंघन है और बीमा कंपनी के साथ हुए करार का भी।

बजाज जनरल इंश्योरेंस के चीफ टेक्निकल ऑफिसर (कमर्शल) अमरनाथ सक्सेना कहते हैं, ‘वाहन बीमा पॉलिसी के अनुसार चालक के पास उसी श्रेणी के वाहन को चलाने का वैध लाइसेंस होना जरूरी है। यदि लाइसेंस एक्सपायर हो गया है, अवैध है या उस श्रेणी के वाहन के लिए उपयुक्त नहीं है तो बीमा कंपनियां दावा मानने से इनकार कर सकती हैं क्योंकि यह पॉलिसी बेचते समय माने गए जोखिमों से अलग जोखिम है।’

विवादों से बचने के लिए पॉलिसीधारकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका लाइसेंस वैध रहे, समय पर रीन्यू करा लिया जाए, जो वाहन चला रहे हैं उसके लिए हो और चालक को कानूनी तौर पर वाहन चलाने के लिए अयोग्य करार नहीं दिया गया हो।

नशे में गाड़ी चलाना

यदि दुर्घटना के समय चालक शराब या किसी दूसरे नशे में होता है तो बीमा कंपनी दावे को खारिज कर सकती है। यह मोटर यान अधिनियम, 1988 का भी उल्लंघन है और पॉलिसी की शर्तों का भी। वाहन बीमा पॉलिसी में इसे जानबूझकर की गई लापरवाही माना जाता है।
सक्सेना समझाते हैं, ‘नशे में गाड़ी चलाने पर फैसले लेने की क्षमता कम हो जाती है और दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए बीमा कंपनी का दावा खारिज करना सही है। दावा खारिज नहीं होने देना है तो नशे में गाड़ी कभी नहीं चलानी चाहिए और नशे की हालत में ड्राइवर या टैक्सी का इस्तेमाल करना चाहिए।’

निजी वाहन का व्यावसायिक उपयोग

सवारी ढोने या सामान की डिलिवरी करने जैसे व्यावसायिक कामों के लिए निजी वाहन का इस्तेमाल मोटर यान अधिनियम, 1988 का उल्लंघन है। इससे कानूनी परेशानी हो सकती है, बीमा का दावा खारिज हो सकता है और आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। पॉलिसीबाजार डॉट कॉम में हेड (मोटर इंश्योरेंस) पारस पसरीचा बताते हैं, ‘वाहन बीमा पॉलिसी बेचते समय पूछा जाता है कि गाड़ी का कैसा इस्तेमाल होना है और उससे जुड़े जोखिमों के हिसाब से ही प्रीमियम तय किया जाता है। व्यावसायिक इस्तेमाल से जोखिम बढ़ता है और गाड़ी के पुर्जे भी ज्यादा घिसते हैं। इसलिए अगर सही पॉलिसी नहीं ली गई है तो बीमा कंपनी पर्याप्त कवरेज नहीं होने की बात कहकर दावा खारिज कर सकती है।’ वाहन का इस्तेमाल पॉलिसी की शर्तों और कानूनी प्रावधानों के मुताबिक ही होना चाहिए। पसरीचा आगाह करते हैं, ‘किसी भी तरह का दुरुपयोग होने या परमिट का उल्लंघन होने पर बीमा पॉलिसी के तहत मिलने वाली सुरक्षा खत्म हो सकती है। इसीलिए निजी वाहनों का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत कामों के लिए ही किया जाए, उससे कमाई करने के चक्कर में व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं किया जाए।’

बीमाकर्ता को सूचित करने में देर

अगर पॉलिसीधारक पुलिस के पास प्राथमिकी दर्ज कराने या बीमा कंपनी को सूचना देने में देर करता है तो दावे और खास तौर पर चोरी के दावे खारिज किए जा सकते हैं। इंश्योरेंस समाधान की सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) शिल्पा अरोड़ा समझाती हैं, ‘पॉलिसी की शर्तों के अनुसार पुलिस और बीमा कंपनी को फौरन सूचना देना जरूरी है। अगर इसमें देर की जाती है तो उसे बीमा करार का उल्लंघन माना जाता है। लेकिन अगर देर किसी वास्तविक वजह से हुई हो और वह वजह ठीक तरीके से समझा दी गई हो तो अदालतें पॉलिसीधारक को राहत दे देती हैं। ऐसा उन मामलों में खास तौर पर होता है, जहां बीमा कंपनी को सूचना देर से दी जाती है मगर प्राथमिकी घटना के 24 घंटे के भीतर ही दर्ज करा दी जाती है।’ फिर भी विवाद से बचने के लिए पॉलिसीधारकों को चोरी होने के 24 घंटे के भीतर ही बीमा कंपनी को बता देना चाहिए और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) में भी सूचना पहुंचा देनी चाहिए ताकि वाहन का दुरुपयोग नहीं हो सके।

बीमा सर्वे से पहले ही चुपचाप मरम्मत

दुर्घटना आदि होने पर बीमा कंपनी अपने सर्वेयर को वाहन की जांच करने के लिए भेजती है। मगर सर्वेयर के आने से पहले ही अगर वाहन की मरम्मत करा ली जाती है तो अक्सर दावा खारिज कर दिया जाता है। शिल्पा का कहना है, ‘पॉलिसी की शर्तों के मुताबिक कम से कम या केवल उतनी फौरी मरम्मत कराई जा सकती है, जो वाहन को सर्विस सेंटर या वर्कशॉप तक ले जाने के लिए जरूरी है। वाहन को नुकसान किस वजह से पहुंचा है, पॉलिसी के दायरे में क्या-क्या आता है और मरम्मत का खर्च वाजिब है या नहीं, यह तय करने के लिए बीमा कंपनी को मरम्मत से पहले वाहन की जांच करनी होती है। साथ ही वाहन की मरम्मत से पहले मंजूरी हासिल करना भी जरूरी है।’ इससे धोखाधड़ी से बचने, हालिया दुर्घटना में हुई टूट-फूट को पुरानी टूट-फूट से अलग रखने, ज्यादा खर्च से बचने और पॉलिसी की शर्तों का पालन पक्का करने में मदद मिलती है।

वाहन में बिना बताए बदलाव

अगर वाहन में बदलाव किए जा रहे हैं मगर उनके बारे में बताया नहीं जा रहा है तो नतीजे गंभीर हो सकते हैं। इस सूरत में दावा तो खारिज हो ही सकता है, पॉलिसी को अमान्य भी करार दिया जा सकता है या दावे के एवज में मिलने वाली रकम काफी कम हो सकती है। बीमा कंपनियां बिना बताए सीएनजी किट लगाने पर तो अक्सर दावे खारिज ही कर देती हैं, चाहे चाहे दुर्घटना या टूट-फूट का सीएनजी किट से कोई वास्ता हो या नहीं हो। कंपनियों की सीधी दलील है कि इस तरह के बदलाव या मॉडिफिकेशन से वाहन के दुर्घटनाग्रस्त होने का जोखिम बढ़ जाता है।

शिल्पा बताती हैं, ‘ऐसे अनधिकृत मॉडिफिकेशन कराने पर वाहन का चालान भी हो सकता है और थर्ड पार्टी दावों में वाहन मालिक की देनदारी बढ़ जाती है। बीमा कंपनियां ऐसे दावों को सबसे पहले तो इसीलिए खारिज कर देती हैं क्योंकि मॉडिफिकेशन के बारे में बताया नहीं गया, वाहन के ढांचे या ईंधन में बिना मंजूरी बदलाव किया गया, जोखिम बढ़ गया और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) या आरटीओ के प्रमाणन के बगैर गैर-कानूनी ढंग से मॉडिफिकेशन किए गए। यह पॉलिसी की शर्तों और सद्भावना के सिद्धांतों का सरासर उल्लंघन है।’ दावा खारिज होने या पॉलिसी रद्द होने से बचना है तो वाहन में किसी भी तरह के बदलाव की सूचना बीमा कंपनी को फौरन देनी चाहिए।

मैकेनिकल खराबी और नुकसान

अगर इंजन, गियरबॉक्स या इलेक्ट्रिक सिस्टम काम करना बंद कर देता है या गड़बड़ हो जाता है तो उसे मैकेनिकल खराबी माना जाता है। दुर्घटना की वजह से पुर्जे टूटने-फूटने या खराब होने से यह बिल्कुल अलग होती है। मैकेनिकल खराबी की वजह से हुए नुकसान को शुरू में कोई खराबी होने के बाद हुए नुकसान में गिना जाता है।

बीएमआर लीगल के पार्टनर शैंकी अग्रवाल कहते हैं, ‘मोटर बीमा में आम तौर पर बाहर से किसी कारण हुआ आकस्मिक नुकसान ही शामिल किया जाता है। अगर गाड़ी में पहले से ही कोई दिक्कत है, इस्तेमाल के साथ पुर्जे घिस गए हैं या समय के साथ दूसरी टूट-फूट हुई है तो उसे बीमा के दायरे से बाहर रखा जाता है। वाहन में अगर किसी तरह की दिक्कत के संकेत आ रहे हैं मगर पॉलिसीधारक उसे चलाता रहता है तो इसे उसकी लापरवाही माना जाता है और दावा खारिज किया जा सकता है।’

हादसे से पहले पॉलिसी लैप्स

अगर दुर्घटना से ऐन पहले बीमा पॉलिसी लैप्स हो जाती है तो वाहन बीमा के दायरे से बाहर होता है और बीमा कंपनी की कोई जिम्मेदारी या देनदारी नहीं होती है क्योंकि लैप्स होने की वजह से हादसे के वक्त दोनों पक्षों के बीच कोई करार ही नहीं था। पॉलिसीधारकों को सही समय पर अपनी पॉलिसी रीन्यू करा लेनी चाहिए, इसके लिए रिमाइंडर लगाकर रखना चाहिए और संभव हो तो ऑटो रीन्यूअल सेट कर देना चाहिए ताकि बिना किसी दिक्कत के पॉलिसी  लगातार चलती रहे।

इफको-टोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी के महाप्रबंधक (मोटर अंडरराइटिंग) अभिषेक वर्मा कहते हैं, ‘पॉलिसी का रीन्यूअल समय पर नहीं किया गया तो इसके कई खमियाजे भुगतने पड़ सकते हैं। पॉलिसी लैप्स हो जाती है तो रीन्यू करने से पहले बीमा कंपनी एक बार फिर उसका पूरा जायजा लेती है। साथ ही अगर आपको नो क्लेम बोनस इकट्ठा हुआ है तो रीन्यूअल समय पर नहीं होने की सूरत में वह भी खत्म हो जाएगा।’

जरूरी कागज नहीं किए जमा तो

चोरी होने पर बीमा का दावा किया जाए तो कागज पूरे करना जरूरी होता है क्योंकि उससे यह साबित करने में मदद मिलती है कि वाकई में चोरी हुई है, वाहन बीमाधारक का ही था और उसने बीमा की सभी शर्तों का पालन किया है। जरूरी कागजों में आम तौर पर क्लेम फॉर्म, पॉलिसी की प्रति, वाहन का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी), प्राथमिकी, पुलिसी की अंतिम रिपोर्ट या गाड़ी नहीं मिलने की रिपोर्ट और असली चाबियां शामिल हैं।

अग्रवाल कहते हैं, ‘लापरवाही का मसला भी इस मौके पर बहुत उठता है। बीमा कंपनी देखती है कि वाहन के मालिक ने जरूरी एहतियात बरते थे या नहीं और चोरी की रिपोर्ट फौरन कराई थी या नहीं। चाबियां गाड़ी के भीतर ही छोड़ देने, वाहन को सुरक्षित नहीं रखने और सूचना देने में देर को पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन माना जाता है और ऐसे में दावा खारिज हो सकता है।’

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First Published - April 6, 2026 | 7:28 AM IST

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