Rupee Assets Investment: भारतीय रुपये में हालिया कमजोरी के बीच यह माना जा रहा है कि यह समय रुपये के खिलाफ दांव लगाने का नहीं, बल्कि रुपये आधारित एसेट्स में निवेश बढ़ाने का है। डीएसपी म्युचुअल फंड (DSP Mutual Fund) ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा कि रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER), कम महंगाई अंतर, मजबूत भुगतान संतुलन और आकर्षक वैल्यूएशन भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2026 के अंत तक रुपये का REER बीआईएस (BIS) के आंकड़ों के अनुसार 89.7 पर था। अनुमान है कि 20 मई 2026 को डॉलर-रुपया विनिमय दर 96.9 पार करने के बाद यह 88 से नीचे फिसल गया। यह स्थिति केवल 2013 के ट्विन डेफिसिट संकट और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट जैसी बड़ी आर्थिक घटनाओं के दौरान ही देखने को मिली थी। ट्रेड-वेटेड आधार पर रुपया अभी भी मूल रूप से अंडरवैल्यूड माना जा रहा है, जिससे निवेशकों को सुरक्षा का मजबूत मार्जिन मिलता है।
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भारत और अमेरिका के बीच महंगाई का अंतर अब आधुनिक इतिहास के सबसे निचले स्तरों में है। पहले यह अंतर औसतन 3.5 से 4 प्रतिशत के बीच रहता था, लेकिन अब भारत के कोर CPI और अमेरिका के कोर PCE की तुलना करने पर यह अंतर घटकर 1 से 2 प्रतिशत के दायरे में आ गया है। पिछले 12 महीनों में अमेरिका की औसत CPI महंगाई 2.8 प्रतिशत रही, जबकि भारत की CPI महंगाई 2.3 प्रतिशत रही। इसका मतलब है कि लंबे समय में डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट की रफ्तार धीमी हो सकती है।
रिपोर्ट का कहना है कि भारत के भुगतान संतुलन (BoP) को लेकर जो चिंता दिखाई दे रही है, वह वास्तविक संकट से ज्यादा ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों की आशंकाओं पर आधारित है। जब तक कच्चा तेल लंबे समय तक 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर नहीं रहता, तब तक भारत को 2011-13 जैसा गंभीर संकट झेलने की संभावना कम है।
भारत की सेवाओं का निर्यात सालाना 418 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है और हालिया मासिक रन रेट के आधार पर यह 447 अरब डॉलर वार्षिक स्तर के करीब पहुंच गया है। वहीं सेवाओं से सरप्लस लगभग 214 अरब डॉलर और प्रवासी भारतीयों से आने वाला धन 135 अरब डॉलर से अधिक है। इस तरह करीब 349 अरब डॉलर का ‘इनविजिबल शील्ड’ तैयार हो गया है, जो FY26 के लगभग 333 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को संतुलित करने में सक्षम है।
अगर कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर 12 महीने तक बना रहता है, तो भारत का चालू खाता घाटा GDP के 2.5 से 3 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। वहीं, सोने की रिकॉर्ड ऊंची कीमतों के कारण घरेलू ज्वेलरी मांग में लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। साथ ही सोने के आयात पर कर और शुल्क ढांचे में बदलाव के कारण आने वाले समय में चालू खाते पर दबाव कम रहने की उम्मीद है।
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विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में कमी का बड़ा कारण भारतीय शेयर बाजार का ऊंचा वैल्यूएशन रहा है। हालांकि, अब कई लार्ज-कैप कंपनियों के शेयर अपने लॉन्ग टर्म एवरेज वैल्यूएशन से नीचे कारोबार कर रहे हैं। कुछ बड़े शेयर 15X फॉरवर्ड अर्निंग्स से भी नीचे मिल रहे हैं और कुछ का वैल्यूएशन कोविड या वैश्विक वित्तीय संकट के समय के स्तर तक पहुंच गया है। रिपोर्ट का मानना है कि इससे विदेशी निवेशकों की बिकवाली पर रोक लग सकती है।
डीएसपी म्युचुअल फंड की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल RBI के विदेशी मुद्रा भंडार में 29 अरब डॉलर की कमी आई है। इसके साथ ही डॉलर फॉरवर्ड बुक को लेकर भी चिंता है, जो कुल भंडार का लगभग 13 प्रतिशत है। हालांकि यह असामान्य स्थिति नहीं है। मार्च 2025 में यह अनुपात 14 प्रतिशत और मार्च 2013 में 11 प्रतिशत था। RBI समय-समय पर इस इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करता रहा है।
FY25 और FY26 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से कुल 34 अरब डॉलर की बिकवाली की है। FY99 के बाद यह पहला मौका है जब लगातार दो वर्षों तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में नेट सेलर रहे हैं। रिपोर्ट का मानना है कि करेंसी, ब्याज दर और निवेश इनफ्लो साइक्लिक होते हैं और मौजूदा परिस्थितियों में रुपये के खिलाफ दांव लगाना कम संभावना वाला कदम हो सकता है। इसके विपरीत आंकड़े बताते हैं कि अब रुपये आधारित शेयर और बॉन्ड एसेट्स में निवेश बढ़ाने का समय है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)