पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारतीय यात्रियों की ट्रैवल प्लानिंग पर साफ दिखने लगा है। पहले जिन फ्लाइट्स का रूट खाड़ी देशों के ऊपर से गुजरता था, अब एयरलाइंस उन्हें बदल रही हैं। इसकी वजह से सफर लंबा हो रहा है और देरी, कनेक्टिंग फ्लाइट छूटने या कैंसिलेशन का खतरा बढ़ गया है। खासतौर पर अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिमी यूरोप और कनाडा जाने वाले यात्रियों को ज्यादा परेशानी हो सकती है।
ऐसे हालात में ट्रैवल इंश्योरेंस लेना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हर तरह की दिक्कत इसमें कवर नहीं होती। इसलिए यात्रा से पहले यह जान लेना बेहतर है कि फ्लाइट में देरी, रद्द होने, मेडिकल इमरजेंसी या सामान खोने जैसी स्थितियों में इंश्योरेंस कितना साथ देगा।
दरअसल, लंबी दूरी की ज्यादातर उड़ानें पश्चिम एशिया के एयरस्पेस या खाड़ी देशों के एयरपोर्ट के जरिए गुजरती हैं। मौजूदा तनाव को देखते हुए एयरलाइंस एहतियात के तौर पर इन रास्तों से बच रही हैं, जिससे शेड्यूल में बदलाव हो रहा है।
बजाज जनरल इंश्योरेंस के रिटेल बिजनेस के चीफ डिस्ट्रीब्यूशन ऑफिसर राकेश कौल के मुताबिक, अभी ज्यादातर फ्लाइट्स चल रही हैं, लेकिन देरी और कनेक्टिंग फ्लाइट मिस होने का जोखिम पहले के मुकाबले बढ़ गया है।
युद्ध जैसे हालातों में ट्रैवल इंश्योरेंस को लेकर अक्सर भ्रम बना रहता है। आम तौर पर बीमा पॉलिसी में साफ लिखा होता है कि अगर नुकसान सीधे तौर पर युद्ध या सैन्य टकराव की वजह से हुआ है, तो उसका कवर नहीं मिलेगा। लेकिन सिर्फ तनाव या भू-राजनीतिक हलचल होने भर से आपकी पॉलिसी बेकार नहीं हो जाती।
राकेश कौल का कहना है कि अगर फ्लाइट में देरी या कैंसिलेशन एयरलाइन के ऑपरेशन, खराब मौसम या तकनीकी वजहों से होता है, तो ऐसे मामलों में कवरेज मिल सकता है, बशर्ते उसका सीधा संबंध किसी संघर्ष से न हो।
ऐसी स्थिति में यात्री को अतिरिक्त होटल खर्च, खाने-पीने या वैकल्पिक यात्रा का खर्च बीमा के तहत मिल सकता है, हालांकि इसकी एक तय सीमा होती है। आसान शब्दों में समझें तो बीमा कंपनी आमतौर पर छोटे-मोटे अतिरिक्त खर्च यानी incidental costs को कवर करती है।
लेकिन अगर फ्लाइट रद्द होने या यात्रा में बाधा की वजह सीधे तौर पर युद्ध या सैन्य कार्रवाई बनती है, तो फिर पॉलिसी के नियमों के तहत क्लेम खारिज भी किया जा सकता है।
सरकार के आदेश या यात्रा पर लगी पाबंदियों की वजह से अगर आपकी ट्रिप रद्द हो जाती है, तो बीमा में इसका कवरेज मिल सकता है। यह सुविधा तब लागू होती है जब यात्रा की शुरुआत, गंतव्य या बीच के किसी ट्रांजिट पॉइंट पर सरकार या एविएशन अथॉरिटी ने प्रतिबंध लगाया हो और यह जानकारी पॉलिसी खरीदते समय पहले से सार्वजनिक न रही हो।
ऐसे मामलों में ट्रिप कैंसिलेशन, बीच में यात्रा रुकने या बढ़ने जैसी स्थितियों को बीमा में शामिल किया जाता है। बीमा कंपनियों का कहना है कि इसके लिए किसी अलग या खास ऐड-ऑन लेने की जरूरत नहीं होती।
बीमा विशेषज्ञ कौल के मुताबिक, सामान्य ट्रैवल इंश्योरेंस पॉलिसी में ही अचानक और अप्रत्याशित परिस्थितियों से होने वाले ट्रिप कैंसिलेशन या रुकावट के लिए वित्तीय सुरक्षा दी जाती है, इसलिए अतिरिक्त कवर लेने की जरूरत नहीं पड़ती।
हवाई यात्रा के दौरान फ्लाइट छूट जाना या अगली फ्लाइट मिस हो जाना यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी बन सकता है। ऐसे मामलों में ट्रैवल इंश्योरेंस मददगार हो सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें पूरी करना जरूरी है।
इंश्योरेंस एक्सपर्ट कौल के मुताबिक, अगर देरी ऑपरेशनल कारणों, तकनीकी दिक्कत या खराब मौसम की वजह से होती है, तो मिस्ड कनेक्शन के केस में क्लेम किया जा सकता है। फ्लाइट्स एक ही टिकट पर होना जरूरी नहीं है, लेकिन दोनों फ्लाइट्स के बीच कम से कम चार घंटे का अंतर होना चाहिए।
कौल का कहना है कि ऐसे मामलों में इंश्योरेंस कंपनी रीबुकिंग, होटल में ठहरने और अन्य जरूरी खर्चों को कवर कर सकती है। हालांकि, अगर देरी या कैंसिलेशन सीधे तौर पर युद्ध जैसी स्थिति की वजह से हुआ है, तो ज्यादातर पॉलिसी में यह कवर नहीं होता।
टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस के कंज्यूमर अंडरराइटिंग के वाइस प्रेसिडेंट चंद्रकांत सैद के अनुसार, अगर यात्री को पहले से युद्ध जैसी स्थिति की जानकारी थी और फिर भी उसने यात्रा की, तो बाद में फ्लाइट कैंसिल होने पर क्लेम मिलने की संभावना कम हो जाती है।
दिलचस्प बात यह है कि अगर एयरलाइन टिकट का पैसा वापस भी कर दे, तब भी इंश्योरेंस काम आ सकता है। यात्री टिकट का किराया दोबारा क्लेम नहीं कर सकता, लेकिन होटल, खाने-पीने, लोकल ट्रांसपोर्ट और अन्य छोटे खर्चों के लिए क्लेम किया जा सकता है। बशर्ते ये खर्च किसी ऐसी वजह से न जुड़े हों, जो पॉलिसी में बाहर रखी गई हो, जैसे युद्ध।
विदेश यात्रा की तैयारी कर रहे हैं तो ट्रैवल एडवाइजरी को नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है। अगर भारत सरकार किसी देश के लिए यात्रा पर रोक या सख्त चेतावनी जारी करती है, तो ऐसे मामलों में ट्रैवल इंश्योरेंस आमतौर पर कवर नहीं देता।
इंश्योरेंस एक्सपर्ट सईद के मुताबिक, अगर किसी देश में युद्ध या संघर्ष शुरू हो चुका है और उसके बाद कोई व्यक्ति वहां यात्रा करता है, तो बीमा पॉलिसी के तहत नुकसान की भरपाई मिलना मुश्किल होता है।
वहीं, ट्रिप कैंसिलेशन के मामले में क्लेम के लिए यात्रियों को जरूरी दस्तावेज जमा करने होते हैं। इसमें फ्लाइट टिकट, होटल बुकिंग, भुगतान की रसीद और कैंसिलेशन से जुड़े दस्तावेज शामिल होते हैं, जिनमें रिफंड या कटौती का ब्योरा हो।
पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के ट्रैवल इंश्योरेंस हेड मनस कपूर के अनुसार, क्लेम के कारण के आधार पर अलग-अलग दस्तावेज मांगे जाते हैं। जैसे बीमारी की स्थिति में मेडिकल रिपोर्ट या डॉक्टर का सर्टिफिकेट, परिवार में आपात स्थिति के लिए डेथ सर्टिफिकेट, या नौकरी से जुड़े कारण होने पर नियोक्ता की ओर से आधिकारिक सूचना। इसके अलावा भरा हुआ क्लेम फॉर्म, पॉलिसी कॉपी, केवाईसी दस्तावेज और बैंक डिटेल्स देना जरूरी होता है, तभी क्लेम की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
यात्रा के दौरान युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव जैसी स्थितियों से बचाव के लिए सिर्फ फ्लेक्सिबल बुकिंग पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है। इन विकल्पों में भी कई शर्तें लागू होती हैं और रिफंड सीमित हो सकता है। वहीं, सामान्य ट्रैवल इंश्योरेंस भी ऐसे कारणों से होने वाली कैंसिलेशन को कवर नहीं करता, जब तक कि ग्राहक “कैंसल फॉर एनी रीजन” जैसा एड-ऑन न ले।
विशेषज्ञ कपूर का कहना है कि यात्रियों को संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए। उनके मुताबिक, जहां संभव हो फ्लेक्सिबल बुकिंग का विकल्प चुनें और साथ में ऐसा इंश्योरेंस प्लान लें जिसकी शर्तों और अपवादों को अच्छी तरह समझ लिया गया हो।
फ्लाइट देरी के मामलों में भी इंश्योरेंस तभी काम करता है जब देरी एक तय समय सीमा से ज्यादा हो, जो आम तौर पर तीन से छह घंटे के बीच होती है। इसके साथ ही देरी की वजह भी पॉलिसी में शामिल होनी चाहिए, जैसे खराब मौसम, तकनीकी खराबी या एयरलाइन से जुड़ी समस्या। मुआवजा तय रकम के रूप में या खाने और ठहरने के खर्च की भरपाई के तौर पर दिया जाता है, जो पॉलिसी पर निर्भर करता है।
कपूर के अनुसार, अगर देरी की वजह युद्ध, दंगे, पहले से घोषित हड़ताल या पहले से दी गई सूचना हो, तो किसी तरह का भुगतान नहीं किया जाता। इसके अलावा, हर पॉलिसी में समय और रकम की सीमा तय होती है और क्लेम के लिए एयरलाइन की पुष्टि या जरूरी दस्तावेज देना जरूरी होता है।
विदेश यात्रा के दौरान अगर अचानक तबीयत बिगड़ जाए और अस्पताल में भर्ती होना पड़े, तो बीमा कंपनी को समय पर सूचना देना बेहद जरूरी होता है। आमतौर पर कैशलेस इलाज के लिए पहले से बीमाकर्ता या टीपीए से मंजूरी लेनी पड़ती है। इसके लिए मरीज या उसके साथ मौजूद व्यक्ति को तुरंत असिस्टेंस सेवा प्रदाता से संपर्क कर क्लेम दर्ज कराना चाहिए।
Shilpa Arora के मुताबिक, अगर सूचना देने में देरी होती है तो क्लेम की रकम कम हो सकती है। कई मामलों में एक तय सीमा, जैसे 1000 अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च होने पर पहले मंजूरी लेना जरूरी होता है, चाहे क्लेम बाद में ही क्यों न किया जाए।
हालांकि अगर आपात स्थिति में पहले मंजूरी नहीं ली जा सकी, तो क्लेम पूरी तरह खारिज नहीं होता। ऐसे मामलों में बीमा कंपनी खर्च की भरपाई कर सकती है, लेकिन यह कैशलेस की बजाय रिइम्बर्समेंट के रूप में होता है। वहीं अगर इलाज पहले से तय था और फिर भी मंजूरी नहीं ली गई, तो क्लेम खारिज होने की आशंका बढ़ जाती है।
जहां तक यात्रा बीच में छोड़कर वापस लौटने की बात है, ट्रैवल इंश्योरेंस आमतौर पर इमरजेंसी मेडिकल एवैक्युएशन और ट्रिप इंटरप्शन को कवर करता है। यानी अगर विदेश में अचानक गंभीर बीमारी हो जाए, तो मरीज को भारत वापस लाने का खर्च और अधूरी यात्रा के गैर-वापसी योग्य खर्च भी कवर किए जा सकते हैं। इसके लिए बीमा कंपनी को समय पर सूचना देना जरूरी है, ताकि जरूरी मंजूरी और सहायता मिल सके।
इस बारे में Shilpa Arora कहती हैं कि सही समय पर जानकारी देने से न सिर्फ क्लेम प्रोसेस आसान होता है, बल्कि जरूरत के वक्त कंपनी की पूरी मदद भी मिलती है।
सीनियर सिटीजन्स के लिए कई हेल्थ पॉलिसियों में उम्र के हिसाब से लिमिट तय होती है। उन्हें को-पेमेंट, रूम रेंट की सीमा और कुछ आधुनिक इलाज जैसे रोबोटिक सर्जरी या विशेष प्रोस्थेटिक्स पर लागू शर्तों को ध्यान से समझ लेना चाहिए।
विदेश यात्रा के दौरान बीमार पड़ना या दुर्घटना होना किसी के लिए भी मुश्किल स्थिति बन सकता है। ऐसे में ट्रैवल इंश्योरेंस मददगार होता है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि हर स्थिति इसमें कवर नहीं होती।
आम तौर पर ट्रैवल इंश्योरेंस पॉलिसी पहले से मौजूद बीमारियों को कवर नहीं करती। हालांकि, कुछ मामलों में बीमा कंपनियां राहत देती हैं। अगर पहले से मौजूद बीमारी अचानक गंभीर और जानलेवा रूप ले ले, और यात्रा से पहले एक तय समय तक वह बीमारी स्थिर रही हो, तो सीमित कवर मिल सकता है।
मेडिकल इमरजेंसी को लेकर बीमा विशेषज्ञ अरुण अरोड़ा कहते हैं कि विदेश में ऐसी स्थिति आने पर घबराने के बजाय सही कदम उठाना जरूरी है।
अगर आप विदेश में हैं और अचानक मेडिकल इमरजेंसी आ जाती है, तो सबसे पहले नजदीकी अस्पताल या इमरजेंसी सेवा से संपर्क करें। इसके बाद तुरंत अपनी बीमा कंपनी को जानकारी दें। जरूरत पड़ने पर अपने देश के दूतावास या कांसुलेट से भी सहायता ली जा सकती है।
बीमा कंपनियां आमतौर पर अचानक आने वाली गंभीर बीमारियों और हादसों को कवर करती हैं। जैसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, गंभीर चोट या एक्सीडेंट, या जानलेवा संक्रमण। ऐसे मामलों में इलाज कैशलेस भी हो सकता है या बाद में खर्च की भरपाई की जाती है।
मेडिकल क्लेम के लिए कुछ जरूरी दस्तावेज जमा करने होते हैं। इनमें भरा हुआ क्लेम फॉर्म, अस्पताल का डिस्चार्ज सारांश, इलाज और जांच की रिपोर्ट, बिल और रसीदें शामिल हैं। इसके अलावा डॉक्टर की पर्ची, दवाओं के बिल, और जरूरत पड़ने पर पुलिस रिपोर्ट या एमएलसी भी मांगी जा सकती है। साथ ही केवाईसी दस्तावेज, पॉलिसी की कॉपी और बैंक डिटेल्स भी देना होता है।
यात्रा से पहले अपनी पॉलिसी की शर्तों को ध्यान से पढ़ना जरूरी है, ताकि इमरजेंसी में किसी तरह की परेशानी न हो।