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हथियार बाजार में बिखराव, भारत के लिए बढ़त बनाने का बड़ा मौका

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दशकों से वैश्विक हथियार व्यवस्था अमेरिका के दबदबे, रूसी प्रतिस्पर्धा, यूरोप की चुनिंदा विशेषता और निर्भर आयातकों की एक बड़ी दुनिया से बनी हुई थी। लेकिन यह युग परिवर्तनशील है

Last Updated- June 16, 2026 | 11:29 PM IST
Defence

करीब आठ दशक तक जापान के संवैधानिक ढांचे ने यह सुनिश्चित किया कि उसका रक्षा उत्पादन प्राथमिक तौर पर घरेलू जरूरतों को पूरा करने पर केंद्रित रहेगा और वह भूराजनीतिक प्रभाव या वाणिज्यिक साधन की भूमिका नहीं निभाएगा। लेकिन इस साल अप्रैल में यह निर्णय लिया गया कि घातक सैन्य साजो-सामान के निर्यात को शिथिल किया जाएगा। यह हमें बताता है कि बड़ी शक्तियां अब उभरते भूराजनीतिक माहौल को किस तरह देखती हैं।

दशकों से वैश्विक हथियार व्यवस्था अमेरिका के दबदबे, रूसी प्रतिस्पर्धा, यूरोप की चुनिंदा विशेषता और निर्भर आयातकों की एक बड़ी दुनिया से बनी हुई थी। लेकिन यह युग परिवर्तनशील है। नए आपूर्तिकर्ता विश्वसनीय औद्योगिक क्षमताओं के साथ बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। पारंपरिक आपूर्तिकर्ता या तो घरेलू सामरिक मांग में व्यस्त हैं या भू-राजनीतिक परिस्थितियों से बाधित हैं। वहीं खरीदार अब किसी एक स्रोत पर सैन्य तकनीक या आपूर्ति के लिए निर्भर रहने से लगातार हिचकिचा रहे हैं।

खाड़ी देशों, विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब, जो पारंपरिक रूप से बड़े खरीदार रहे हैं। वे अब तेजी से वैकल्पिक मॉडल विकसित करने की ओर देख रहे हैं। परिणामस्वरूप यह पुराने क्रम का पतन नहीं बल्कि एक अधिक विविध और प्रतिस्पर्धी बाजार का क्रमिक उदय दिख रहा है जिसमें खरीदारों के लिए रणनीतिक स्वायत्तता एक प्रमुख सिद्धांत बन गई है।

अमेरिकी रक्षा निर्यात कभी भी केवल वाणिज्यिक लेनदेन नहीं होते हैं। वे एक व्यापक राजनीतिक और रणनीतिक संरचना में निहित हैं जो सैन्य खरीद को गठबंधन ढांचों, खुफिया संबंधों, पारस्परिक संचालन व्यवस्थाओं और व्यापक भू-राजनीतिक संरेखण से जोड़ती है। यह मॉडल प्रभावशाली बना हुआ है लेकिन अब पहले जैसी आभा नहीं रखता। अमेरिकी सैन्य शक्ति समग्र क्षमता में बेजोड़ हो सकती है, लेकिन उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं को कई क्षेत्रों में बनाए रखने की इच्छा, क्षमता और विश्वसनीयता पर बहस हो रही है।  भारत के लिए यहां एक दिलचस्प विरोधाभास है।

पिछले दो दशकों में भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। अमेरिकी विमान, हेलीकॉप्टर, तोपखाने, निगरानी प्लेटफॉर्म और समुद्री संसाधन भारत के सैन्य आधुनिकीकरण के महत्त्वपूर्ण घटक बन गए। भारत ने अमेरिकी तकनीक और सहयोग का स्वागत किया लेकिन उन गठबंधन ढांचों को नहीं अपनाया जो आमतौर पर अन्य जगहों पर ऐसे सैन्य संबंधों के साथ आते हैं। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ अमेरिकी जुड़ाव ने हालात को और जटिल बना दिया है। ऐसा जुड़ाव सीमित होने के बाद भी भारत की विविध स्रोतों से खरीद की सहज प्रवृत्ति को मजबूत करता है। हाल ही में अमेरिकी प्लेटफॉर्मों की तुलना में यूरोपीय प्लेटफॉर्मों को प्राथमिकता देने में यह परिलक्षित होता है।

रूस का रक्षा औद्योगिक आधार प्रतिबंधों से जुड़ी बाधाओं, श्रम की कमी और घरेलू सैन्य आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने के कारण भारी दबाव में है। निर्यात प्रतिबद्धताएं धीमी हो गई हैं, रखरखाव की समयसीमाएं अनिश्चित हो गई हैं और एशिया, अफ्रीका तथा पश्चिम एशिया में रूसी आपूर्ति श्रृंखलाओं की दीर्घकालिक विश्वसनीयता का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है। जो बाजार ऐतिहासिक रूप से रूसी प्लेटफॉर्मों पर निर्भर थे वे अब सेवा, कलपुर्जों और रखरखाव के लिए वैकल्पिक साझेदारों की तलाश कर रहे हैं। साथ ही वे नई आपूर्ति भी चाहते हैं जिनमें विश्वसनीय तकनीक हो और बहुत अधिक राजनीतिक शर्तें न हों। भारत के पास रूसी प्लेटफॉर्मों पर व्यापक औद्योगिक क्षमता है। वह इस खालीपन को भर सकता है।

चीन का रक्षा-औद्योगिक विस्तार किफायत, तेज आपूर्ति, वित्तीय लचीलेपन और सीमित राजनीतिक शर्त के संयोजन संचालित है। यह उसे एक उभरते वैश्विक प्रतिस्पर्धी के रूप में स्थापित कर रहा है। विशेषकर लागत के लिहाज से संवेदनशील बाजारों में। जहाज निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स में चीन का विनिर्माण पैमाना अब बेहद मजबूत है।  यूक्रेन संघर्ष और अमेरिका द्वारा यूरोपीय देशों पर नाटो में अहम भूमिका निभाने का दबाव यूरोपीय रक्षा खर्च में बढ़ोतरी की वजह बना है और इसने उन्हें घरेलू सैन्य तैयारी रखने पर विचार करने पर विवश किया है।

यूरोप अभी भी एरोस्पेस इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उच्चस्तरीय रक्षा विनिर्माण में उन्नत क्षमताओं का मालिक है। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन औद्योगिक क्षमताओं को दोबारा तैयार करने में भारी निवेश कर रहे हैं जो पहले ही कम हो गई थीं। यह आंतरिक उन्मुखता अस्थायी रूप से यूरोपीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा की तीव्रता को कम कर सकती है खासकर उन निर्यात बाजारों में जो उनके तत्काल रणनीतिक वातावरण से बाहर हैं।

इसी नए संदर्भ में नए एशियाई आपूर्तिकर्ताओं का उदय विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है। दक्षिण कोरिया तोपखाना, बख्तरबंद प्रणालियों और जहाज निर्माण में एक प्रतिस्पर्धी निर्यातक के रूप में उभरा है। तुर्किये ने मानवरहित प्रणालियों का उपयोग करके अपने तत्काल क्षेत्र से कहीं आगे तक सामरिक प्रभाव बनाया है। जापान का प्रवेश विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसके औद्योगिक आधार का पैमाना और परिष्कार अत्यधिक है।

जहाज निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सामग्री इंजीनियरिंग और सटीक प्रणालियों में जापानी विनिर्माण क्षमताएं लंबे समय से वैश्विक स्तर पर सम्मानित रही हैं। नई नीति लागू होने के साथ जापानी रक्षा विनिर्माण की बाहरी भूमिका और अधिक संभव हो गई है। भारत के लिए यह परिवर्तन अवसर और रणनीतिक जटिलता दोनों प्रस्तुत करता है। भारत स्वयं दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक देश से अब एक महत्त्वपूर्ण रक्षा निर्माता और निर्यातक बनने की ओर अग्रसर है।

उभरती प्रौद्योगिकियां जैसे कि  ड्रोन, अंतरिक्ष, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, साइबर युद्ध आदि वे क्षेत्र हैं जहां भारत की बढ़ती क्षमताएं पारंपरिक सैन्य-औद्योगिक कमियों की भरपाई कर सकती हैं। निर्यात की संख्यात्मक वृद्धि से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है भारत की स्थिति का स्वरूप। हथियार निर्यात बाजार में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को अब एक परिसंपत्ति के रूप में देखा जा रहा है। भारत के पास भू-राजनीतिक विश्वसनीयता, बढ़ती तकनीकी क्षमता और एक समृद्ध रक्षा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र है।

भारत इस अवसर का पूरा लाभ ले पाएगा या नहीं यह इस पर निर्भर करेगा कि वह गुणवत्ता, विश्वसनीयता, वित्तपोषण, सेवा और तकनीकी नवाचार को बड़े पैमाने पर प्रदान करने में कितना सक्षम है। शीत युद्ध के बाद के लंबे काल में अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार को नियंत्रित करने वाली रणनीतिक निश्चितताएं अब धीरे-धीरे एक अधिक बहुल और प्रतिस्पर्धी व्यवस्था को रास्ता दे रही हैं। वे देश जो इस परिवर्तन के साथ जल्दी अनुकूलन करेंगे आने वाले हथियार बाजार की संरचना को आकार देंगे। भारत के पास उनमें से एक बनने की संभावना है।


(लेखक संघ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन और पूर्व रक्षा सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - June 16, 2026 | 11:25 PM IST

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