सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्मों के विरुद्ध सरकार के साथ माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की गणना को लेकर चल रहे विवाद में दिए गए निर्णय को पिछली तारीखों से लागू किया है। दूसरे शब्दों में, इन प्लेटफॉर्मों को अपने पिछले लेनदेन पर अधिक जीएसटी चुकाना होगा, जिसकी राशि कथित रूप से लाखों करोड़ रुपयों तक पहुंच सकती है।
बड़े पैमाने पर पिछली तारीखों से कराधान के कई मामले पहले भी रहे हैं। पिछले दो दशकों के उदाहरणों में 2012 में कर कानून में बदलाव (और 2021 में उनका आंशिक उलट) से उत्पन्न केयर्न एनर्जी और वोडाफोन से जुड़े कर विवाद , 2019 का दूरसंचार समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) मामला, 2024 का खनन रॉयल्टी मामला और अब 2026 का ऑनलाइन गेमिंग मामला शामिल हैं। इसके अलावा राज्यों के स्तर पर भी बड़े और छोटे पैमाने पर पिछली तारीखों से नीतिगत बदलाव हुए हैं।
पिछली तारीखों से कराधान के लाभ एकदम स्पष्ट हैं। यह सरकार को कर नीति में मौजूद खामियों को बाद में बेहतर जानकारी मिलने पर उलटने की अनुमति देता है। इस तरह से वसूला गया राजस्व अपनी अतीत की प्रकृति के कारण हाल की देनदारियों से कई गुना अधिक हो सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि जो लोग व्यवस्था की कमियों का लाभ उठाते हैं उन्हें बाद में भुगतान करना पड़ सकता है।
इस प्रकार यह तर्क दिया जा सकता है कि इससे पिछली तारीखों से नीति-निर्माण में अनजाने में हुई नीतिगत त्रुटियों को सुधारने में मदद मिलती है। यह भी कहा जा सकता है कि यदि निवेशकों को पता हो कि असाधारण रूप से उच्च लाभ पर पिछली तारीखों से कर लगाया जा सकता है तो वे कमियों का लाभ उठाने की कोशिश कम करेंगे।
ऑनलाइन गेमिंग-जुआ पर हालिया निर्णय इसका उदाहरण है। यह ऐसा क्षेत्र नहीं है जो बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करता हो न ही यह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करता है। वास्तव में यह अत्यधिक असमान व्यवसाय है। इसमें लत का जोखिम है और परिणामस्वरूप घरेलू स्तर पर गहरी परेशानी का खतरा है।
इसलिए इसे उच्चतम कर दर में वर्गीकृत करने का कुछ औचित्य है। और यदि यह शुरुआत में नहीं किया गया था तो पिछली तारीखों से ऐसा करना उन सभी संस्थाओं को सही संदेश देगा जो ग्राहकों और सरकार का निजी लाभ के लिए शोषण करना चाहती हैं। हालांकि, पिछली तारीखों से समाधान एक दोधारी तलवार है और इसका दूसरा पहलू राजस्व हासिल करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे पहलू की तुलना में ज्यादा तीखा और नुकसानदेह है।
अदालतों में अपनी दलीलों और अन्य मंचों पर केंद्र सरकार के अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि पिछली तारीखों से कराधान से गंभीर नुकसान हुआ है। कई मामलों में केंद्र सरकार ने पिछली तारीखों से करों का विरोध भी किया है। इसका कारण यह है कि नुकसान केवल उन कंपनियों तक सीमित नहीं है जिन्हें पिछली तारीखों से भुगतान करने के लिए कहा जाता है, बल्कि उन निवेशकों तक भी पहुंचता है जो नए निवेश की योजना बना रहे होते हैं।
यहां मुख्य बात यह है कि सरकार को जो लाभ मिलता है वह सीमित और संकीर्ण दायरे में होता है लेकिन पूरे तंत्र को जो नुकसान होता है वह व्यापक और प्रणालीगत स्तर पर होता है। कई क्षेत्रों में अदालतों ने विभिन्न राज्य सरकारों, सार्वजनिक क्षेत्र या अन्य सरकारी-संबद्ध संस्थाओं के पक्ष में निर्णय दिया है जो पिछली तारीखों से कर वसूल रहे थे। चिंताजनक बात यह है कि ऐसा अतीत में कई बार हुआ है। यह आज भी जारी है और ऐसा कर कई वर्षों पीछे जाकर पिछली तारीखों से लगाया जा सकता है। इससे लागत बढ़ती है, अनिश्चितताएं बढ़ती हैं और परिणामस्वरूप परियोजनाओं की व्यवहार्यता घट जाती है।
भारत की कर संहिता, नियम और नीतियां अत्यधिक जटिल मानी जाती हैं। लेकिन कारोबारी सुगमता में सुधार, अपराधमुक्तिकरण के प्रयास और कानूनों की संख्या में कमी ने भारत में व्यापार करने की जटिलता को कम करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन यह अब भी एक विशाल महासागर है और आज भी व्यापारिक वातावरण कंपनियों को ऐसे क्षेत्र में काम करने के लिए बाध्य करता है जहां एक ओर कानूनों और नीतियों में स्पष्ट रूप से दर्ज प्रावधान हैं तो दूसरी ओर वे बातें भी हैं जो दर्ज नहीं हैं। यह धुंधला क्षेत्र है, जहां यह स्पष्ट नहीं होता कि क्या अनुमति है और क्या नहीं।
कंपनियों को कई संस्थाओं के साथ काम करना पड़ता है और इन संपर्कों में कई अस्पष्टताएं मौजूद रहती हैं। इससे बड़ा और छोटा, वैश्विक और राष्ट्रीय, प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो, हर प्रकार का निवेश प्रभावित होता है। ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक सिद्धांत बाजार विफलता की भविष्यवाणी करता है जिसमें निवेश कम हो जाते हैं और विडंबना यह है कि अधिक जोखिम वाली परियोजनाओं को अपनाने की आशंका बढ़ जाती है।
उम्मीद की जा सकती है कि न्यायपालिका निष्पक्ष निर्णय देगी। लेकिन न्यायपालिका निवेशकों का समर्थन नहीं कर पाएगी क्योंकि वर्तमान कानून और केस लॉ दोनों ही पिछली तारीखों से कराधान नीतियों की अनुमति देते हैं। पिछली तारीखों से नीति को सीमित करने वाले कानून केवल आपराधिक क्षेत्रों और 2012 से पहले के अप्रत्यक्ष कराधान तक ही सीमित हैं। लेकिन कई क्षेत्रों में जैसे उपकर, रॉयल्टी, शुल्क और यहां तक कि प्रत्यक्ष करों में भी ऐसी संभावनाएं बनी हुई हैं और इसका प्रणालीगत नुकसान बहुत बड़ा है।
यह सर्वविदित है कि 2012 के बाद से कॉरपोरेट क्षेत्र के निवेश वास्तव में नहीं बढ़ पाए हैं। यह भी सर्वविदित है कि 2021 से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और जीडीपी के अनुपात में गिरावट आ रही है। इस अवधि में भारत ने प्रभावशाली जीडीपी वृद्धि, नियंत्रित मुद्रास्फीति, अच्छा व्यापक आर्थिक प्रबंधन और उल्लेखनीय बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है। फिर भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की प्रतिक्रिया ठंडी रही है। यह भी स्पष्ट है कि जहां कठोर आर्थिक आंकड़ों का सवाल है, वहां निजी क्षेत्र के निवेश के कमजोर निवेश की कोई ठोस वजह नहीं दिखती।
सरकार के किसी हिस्से द्वारा भविष्य में किसी समय, कई वर्षों पीछे जाकर पिछली तारीखों से कार्रवाई की आशंका कई व्यवसायों और उद्यमियों को दिवालिया बना सकती है। तो सरकार को क्या करना चाहिए? पिछली तारीखों से नीति सरकार के किसी भी हिस्से द्वारा लागू की जा सकती है इसलिए भारत को एक व्यापक कानूनी समाधान की आवश्यकता है जहां सरकार के सभी हिस्सों को पिछली तारीखों से भुगतान की मांग करने से रोका जाए।
ऐसे कानून में कुछ लचीलापन होना चाहिए, लेकिन मौजूदा व्यवस्था, जिसमें सरकार का कोई भी हिस्सा अपनी मर्जी से कितने भी साल पीछे जाकर जांच करने की पूरी स्वतंत्रता रखता है, उस पर रोक लगाने की जरूरत है। भारत ने कई मौकों पर काले धन की माफी योजनाएं प्रस्तुत की हैं और कोई राजनीतिक-आर्थिक प्रतिक्रिया नहीं हुई। तो क्यों न एक ऐसे तंत्र पर विचार किया जाए जहां सरकार के सभी हिस्से अतीत को छोड़ दें?
(लेखक सीएसईपी के प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं)