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अगर आरबीआई का प्रबंधन नहीं होता, तो रुपया कहीं अधिक अस्थिर होता

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कोविड की चोट से दुनिया ने जैसे-तैसे उबरना शुरू ही किया था कि फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण से आपूर्ति तंत्र फिर अस्त-व्यस्त हो गया और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ गया

Last Updated- April 29, 2026 | 9:56 PM IST
Rupee VS Dollor

कोविड-19 महामारी के दिनों से उथल-पुथल की शिकार हुई दुनिया एक के बाद एक नई चुनौतियों से जूझ रही है। कोविड महामारी की चोट से दुनिया ने जैसे-तैसे उबरना शुरू ही किया था कि फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण से आपूर्ति तंत्र फिर अस्त-व्यस्त हो गया और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ गया। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद ऊर्जा के प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश रूस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगा दिए। इस बीच, मुद्रास्फीति अधिकांश प्रमुख केंद्रीय बैंकों के लिए एक चुनौती बन गई। कोविड महामारी के कारण आपूर्ति तंत्र में उत्पन्न व्यवधान और कुछ हद तक नीतिगत स्तर पर अधिक रियायत इसके लिए जिम्मेदार थे।

उदाहरण के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने मार्च 2022 और जुलाई 2023 के बीच नीतिगत ब्याज दरों में 5 फीसदी अंक से अधिक इजाफा कर दिया। अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने भी इसी तरह के कदम उठाए जिससे वैश्विक मुद्रा बाजारों में अस्थिरता काफी बढ़ गई।

हालात पूरी तरह सुधरे भी नहीं थे कि डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद अनिश्चितता का एक नया दौर शुरू हो गया। ट्रंप की नीतियों ने वैश्विक व्यवस्था को झकझोर दिया। उन्होंने ‘अमेरिका को दोबारा महान बनाने’ के नाम पर ऐसे उपाय किए जिनसे पूरी दुनि​या में अफरा-तफरी मच गई। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए जवाबी शुल्कों ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता बढ़ा दी। रूस से तेल आयात करने पर भारत पर अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाए गए।

हालांकि, भारत और अमेरिका ने इस साल की शुरुआत में एक व्यापार समझौता किया मगर अमेरिका के शीर्ष न्यायालय ने जवाबी शुल्कों को अवैध घोषित कर प्रभावी शुल्कों में काफी कमी कर दी। इसके बावजूद, शुल्क ट्रंप के एजेंडे का एक अहम हिस्सा हैं और वे इन्हें अलग-अलग कानूनों के तहत फिर से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।

दुनिया के लिए एक नई मुसीबत तब शुरू हो गई जब अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया। ईरान युद्ध के भू-राजनीतिक परिणाम समय के साथ सामने दिखेंगे मगर इससे भारत और दुनिया के लिए भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है।

व्यापार में व्यवधान और आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव के लिए व्यापक नीतिगत प्रतिक्रिया आवश्यक है मगर वैश्विक झटके सबसे पहले पूंजी प्रवाह और मुद्रा की चाल पर असर डालते हैं। इससे नीतिगत बहस छिड़ जाती है जैसा कि वर्तमान में हो रहा है। इस पृष्ठ पर लिखने वाले टिप्पणीकारों सहित कई लोगों का तर्क है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) को रुपये में गिरावट थामने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इस तर्क में दम है। भारत की भुगतान संतुलन स्थिति बिगड़ गई है और कमजोर मुद्रा विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय वस्तुओं एवं परिसंपत्तियों को सस्ता बनाकर संतुलन बहाल करने में मदद करेगी। मगर यह बहस का विषय है कि क्या आरबीआई को मुद्रा बाजार से पूरी तरह दूर रहना चाहिए जैसा कि तर्क दिया जा रहा है। वर्ष 2020 के बाद की घटनाओं का संक्षिप्त विवरण इस संदर्भ में सहायक होगा।

हाल के वर्षों का लेखा-जोखा

कोविड महामारी से संबंधित अनिश्चितताओं के कारण जनवरी से अप्रैल 2020 के मध्य तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 7 फीसदी गिर गया। मार्च 2020 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 15 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के भारतीय शेयर और बॉन्ड बेचे। हालांकि, दुनिया भर में सक्रिय नीतिगत उपायों के साथ स्थिति में तेजी से बदलाव आया। रुपये में सुधार हुआ लेकिन आरबीआई द्वारा भंडार बढ़ाने के कारण इसकी वृद्धि सीमित रही।

वर्ष 2020 में आरबीआई ने अपने भंडार में लगभग 120 अरब डॉलर की वृद्धि की। वर्ष 2022 में जब फेडरल रिजर्व सहित दूसरे केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाईं तो स्पष्ट कारणों से रुपये पर दबाव पड़ा। आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद उस वर्ष रुपये में 11 फीसदी से अधिक की गिरावट आई। वर्ष 2022 के पहले नौ महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 100 अरब डॉलर कम हो गया। आरबीआई ने बाद में अपना भंडार दोबारा तैयार किया जो वर्ष 2025 में 700 अरब डॉलर से अधिक हो गया।

वित्त वर्ष 2025-26 में व्यापार तनाव के कारण रुपये में लगभग 10 फीसदी की गिरावट आई। वर्ष 2020 की शुरुआत से अब तक रुपये का मूल्य डॉलर के मुकाबले लगभग 71.2 से गिरकर लगभग 94 हो गया है। लिहाजा यह तर्क देना कठिन है कि आरबीआई रुपये को समायोजित होने नहीं दे रहा है। वास्तव में व्यापार-भारित 40-मुद्रा वास्तविक प्रभावी विनिमय दर यह दर्शाती है कि रुपया अवमूल्यित है जो वर्तमान परिस्थितियों में सहायक होगा। आरबीआई की घोषित नीति यह है कि वह किसी भी स्तर को लक्षित नहीं करता और केवल अत्यधिक अस्थिरता कम करने के लिए हस्तक्षेप करता है।

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों से स्पष्ट है कि अगर आरबीआई बाजार से दूर रहता तो मुद्रा में अस्थिरता कहीं अधिक होती। अतः यह प्रश्न पूछना उचित है कि आरबीआई इस दौरान बाजार से दूर रहता तो भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में होती? वैश्विक वित्तीय संकट के बाद के वर्षों में आरबीआई ने काफी हद तक निष्क्रिय दृष्टिकोण अपनाया। इसका परिणाम अच्छा नहीं रहा और भारत को वर्ष 2013 में लगभग मुद्रा संकट का सामना करना पड़ा। रुपया स्थिर करने के लिए उसे प्रवासी भारतीयों से जमा को लेकर उत्साह दिखाने का आह्वान करना पड़ा। इस तरह की बार-बार होने वाली घटनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्वास जगाने की उम्मीद को कमजोर करती हैं।

धारणाओं पर पुनर्विचार की जरूरत

हाल के घटनाक्रम और भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए एक अन्य जरूरी पहलू पर ध्यान देने की आवश्यकता है। भारतीय नीति निर्माताओं ने लंबे समय से यह मान लिया है कि देश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 2.0 से 2.5 फीसदी चालू खाते के घाटे (सीएडी) के साथ आगे बढ़ सकता है और विदेशी पूंजी प्रवाह से घरेलू बचत में आई कमी की पूर्ति हो सकती है। विदेशी बचत की उपलब्धता राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन ढांचे में भी अंतर्निहित है।

अब चूंकि, जीडीपी के लगभग1.0 से 1.5 फीसदी के मामूली सीएडी का वित्तपोषण भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है इसलिए ऐसी मान्यताओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता हो सकती है। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिका में बजट घाटा संरचनात्मक रूप से उच्च स्तर पर पहुंच गया है जिससे अधिक वैश्विक बचत का उपयोग हो सकता है और विदेशी पूंजी की लागत बढ़ सकती है। लिहाजा अधिक बाह्य स्थिरता के लिए भारत को घरेलू बचत को बढ़ावा देने और सामान्य सरकारी बजट घाटे को उपलब्ध वित्तीय बचत के अनुरूप समायोजित करने की आवश्यकता है।

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First Published - April 29, 2026 | 9:47 PM IST

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