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पश्चिम एशिया संकट: क्या भारत बनेगा खाड़ी देशों का नया और सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार?

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पश्चिम एशिया संकट के बीच खाड़ी देश नए साथी की तलाश में हैं। ऐसे में भारत अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता, मजबूत आर्थिक और ऐतिहासिक रिश्तों के साथ बेहतरीन विकल्प बन सकता है

Last Updated- May 19, 2026 | 9:27 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

कई दशकों तक खाड़ी देश एक सरल सूत्र का पालन करते रहे। जैसे कि अमेरिकी सुरक्षा खरीदो, सभी को तेल बेचो और बाकी जगहों पर भी अपने विकल्प खुले रखो। इस कारण इस क्षेत्र में बहुत समृद्धि आई लेकिन अब पश्चिम एशिया संकट ने इसका विरोधाभास उजागर कर दिया है। मसलन, अपनी सुरक्षा को उस महाशक्ति पर छोड़ देना जिसके हित कभी पूरी तरह से अपने ही हितों से मेल नहीं खाते। इसके अलावा जिन विकल्पों पर खाड़ी देशों ने विचार किया जैसे चीन, तुर्किये या ईरान, उनकी अपनी संरचनात्मक सीमाएं थीं। अब नतीजा यह है कि खाड़ी देश अमेरिका पर निर्भर हैं लेकिन उन्हें ईरान से खतरा है, वे इजरायल को लेकर सतर्क हैं जबकि चीन के प्रति इनका आकर्षण है और अब भी एक भरोसेमंद साझेदार की तलाश में हैं।

1960 के दशक के अंत में ब्रिटेन के पीछे हटने से सुरक्षा के मोर्चे पर एक शून्य पैदा हुआ और तब अमेरिका खाड़ी देशों का मुख्य रक्षक बन गया। यह भूमिका ईरानी क्रांति, ईरान-इराक युद्ध और कुवैत पर इराक के आक्रमण के बाद और गहरी हो गई। लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका का ध्यान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर बढ़ा, खाड़ी देशों ने अस्थिरता से बचने के उपाय करने शुरू किए। आर्थिक समृद्धि और वैश्विक संपर्कों ने किसी एक संरक्षक पर पूरी तरह निर्भर रहना मुश्किल बना दिया।

पुराने मॉडल में सुरक्षा बाहरी ताकतों पर छोड़ी जाती थी लेकिन अब धीरे-धीरे इसमें बदलाव आ रहा है और रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश हो रही है। सऊदी अरब का ईरान से संपर्क, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के चीन के साथ रिश्ते, और ओमान तथा कतर की स्वतंत्र कूटनीति इस बदलाव को दर्शाती है। अक्टूबर 2025 के बाद सऊदी अरब ने इजरायल के साथ तालमेल नहीं बनाया, जिससे अब्राहम समझौते पर संदेह पैदा होने लगा। सऊदी अरब और यूएई, यमन को लेकर भी अलग दृष्टिकोण रखते हैं और हर देश अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा रहा है।

हालांकि वर्ष 2023 में चीन की मध्यस्थता में सऊदी-ईरान रिश्ते को सुधारने के प्रयास पूरी तरह विफल रहे जिसका उद्देश्य पारस्परिक आर्थिक निर्भरता के जरिये राजनीतिक दुश्मनी को कम करना था। व्यापार बढ़ने, नए राजनयिक संबंध बनाने और खाड़ी में तनाव से बचने के प्रयासों के बावजूद, ईरान ने सऊदी पर हमला किया। यहां तक कि कतर और ओमान भी ईरान की मिसाइलों की मार से प्रभावित हुए जो इस क्षेत्र के सबसे सक्रिय मध्यस्थ रहे हैं।

मौजूदा संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका ​के सुरक्षा संबंध उसकी घरेलू राजनीति और बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं पर निर्भर हैं। अमेरिका का किसी क्षेत्र में बल का इस्तेमाल अपने उद्देश्यों के लिए, अपनी शर्तों पर और अपनी समय-सीमा के आधार पर होता है न कि खाड़ी देशों की प्राथमिकताओं के अनुसार। सबसे बुरी बात यह है कि किसी भी अमेरिकी कार्रवाई का परिणाम खाड़ी देशों को भुगतना पड़ता है। 

चीन की पश्चिम एशिया में मुख्य दिलचस्पी क्षेत्रीय सुरक्षा में नहीं बल्कि ऊर्जा प्रवाह और बाजार तक पहुंच बनाने में है। चीन, दुनिया का सबसे बड़ा तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयातक है और कतर तथा यूएई उसकी कुल एलएनजी आयात के लगभग 30 फीसदी हिस्से की आपूर्ति करते हैं। लेकिन ईरान भी चीन का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक साझेदार है और 2021 के व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते के तहत ईरान बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का हिस्सा बन गया। ये गहरे रिश्ते किसी भी खाड़ी संकट में चीन के हितों को विभाजित कर देते हैं।

तुर्किये अपने बंटे हुए समर्थन की वजह से भरोसेमंद नहीं है। यह अरब दुनिया में प्रभाव चाहता है, मुस्लिम ब्रदरहुड नेटवर्क से तार जोड़े हुए हैं, साथ ही यह ऑटोमन साम्राज्य के युग की याद दिलाता रहता है और पूर्वी भूमध्यसागर और पश्चिम एशिया में मह त्त्वाकांक्षी कदम उठाता है।

इस तरह के टूटे हुए गठबंधनों और अलग-अलग हितों की पृष्ठभूमि के बीच, भारत का पश्चिम एशिया के साथ रिश्ता बुनियादी रूप से अलग है। यह वास्तव में पांच हजार वर्षों की सभ्यता पर आधारित है। सिंधु घाटी के व्यापारी और कोझिकोड तथा मस्कट को जोड़ने वाले मार्ग इस क्षेत्र के हर आधुनिक राष्ट्र से भी पहले के हैं।

भारत के 17 करोड़ से अधिक मुसलमानों में से कई के खाड़ी देशों के साथ गहरे सामाजिक और पारिवारिक संबंध हैं। पश्चिम एशिया में 95 लाख से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं, जिनमें 35 लाख लोग सिर्फ यूएई में हैं। लाखों भारतीय मुस्लिम परिवारों के लिए हिजाज़ की यात्रा जीवन भर का सपना होती है। खाड़ी में बॉलीवुड का भी एक बड़ा दर्शक समूह है। भारतीय भोजन, दुबई से लेकर मस्कट तक आम है। भारतीय भाषाएं खाड़ी देशों के बाजारों में उतनी ही सामान्य हैं जितनी अरबी भाषा।

गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) भारत का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक समूह है, जिसकी वित्त वर्ष 2025 में भारत के कुल व्यापार में 15.4 फीसदी हिस्सेदारी है। पश्चिम एशिया भारत के कच्चे तेल की जरूरत के 60 फीसदी से अधिक की आपूर्ति करता है जबकि भारत के बाहरी व्यापार का 80 फीसदी हिस्सा इस क्षेत्र से होकर गुजरता है।

वर्ष 2022 में भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता सिर्फ 88 दिनों में पूरा हुआ जो साझा हित और ऐतिहासिक विश्वास को दर्शाता है। हालांकि, भारत ने अभी तक अपने रिश्ते में सुरक्षा के आयाम को पूरी तरह जोड़ने में तेजी नहीं दिखाई है। संयुक्त सैन्य अभ्यास होते हैं लेकिन इस क्षेत्र से भारत के सुरक्षा संबंध श्रीलंका, मालदीव, फिलीपींस या मॉरीशस जैसे सक्रिय नहीं है। 

वर्तमान संकट से यह सवाल खड़े होते हैं कि क्या भारत और खाड़ी देशों को अपने रिश्ते को रणनीतिक स्तर पर ले जाना चाहिए। भारत की इस क्षेत्र में कोई क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा नहीं है। भारत ने कभी इस क्षेत्र का उपयोग अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ संघर्ष में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष युद्धभूमि के रूप में नहीं किया। भारत के सभ्यता और जनसंख्या से जुड़े गहरे संबंध, स्थिरता को लेकर वास्तविक साझा हित पैदा करते हैं।

इसका आर्थिक दायरा बढ़ रहा है और सबसे महत्त्वपूर्ण, भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता है कि वह सभी पक्षों, खाड़ी देशों, ईरान, इजरायल और वैश्विक ताकतों के साथ संबंध बनाए रख सकता है। भारत एकमात्र महत्त्वपूर्ण शक्ति है जिस पर सभी पक्ष भरोसा करते हैं या कम से कम अविश्वास नहीं करते हैं। भारत को इस क्षेत्र का सुरक्षा रक्षक बनने की आवश्यकता नहीं है।

संभवतः कुछ और अधिक स्थायी और संतुलित विकल्प हो सकता है जैसे कि भारत-खाड़ी देशों के बीच एक गहरी रणनीतिक साझेदारी, जिसमें भारत खाड़ी देशों की सुरक्षा में हिस्सेदार हो और खाड़ी देश भारत की आर्थिक प्रगति में हिस्सेदार हों। इस साझेदारी का ढांचा कई आयामों में विकसित किया जा सकता है।

इसमें भारत-खाड़ी सुरक्षा और समुद्री समझौता शामिल हो सकता है, जो नौ सेना समन्वय, समुद्री क्षेत्र की सतर्कता, ड्रोन-रोधी सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और क्षेत्र में समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर केंद्रित हो। इसके साथ ही भारत-खाड़ी रक्षा औद्योगिक साझेदारी भी संभव है, जिसमें ड्रोन, मिसाइल प्रणाली, साइबर और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस निगरानी, सुरक्षित संचार और रखरखाव केंद्रों के संयुक्त उद्यम शामिल हों। यह साझेदारी खाड़ी देशों की पूंजी और भारत के बढ़ते रक्षा नवाचार को जोड़ सकती है।

सरकारी समर्थन के साथ भारतीय स्टार्टअप के दायरे को बढ़ाया जा सकता है और ब्रह्मोस जैसी प्रणाली खाड़ी देशों की सुरक्षा को और मजबूत कर सकती हैं। एक ऊर्जा-प्रौद्योगिकी कॉरिडोर बनाया जा सकता है जो रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, एलएनजी, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और महत्त्वपूर्ण खनिजों को शामिल करे। इसके अलावा, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर के तेज क्रियान्वयन को बंदरगाहों, लॉजिस्टिक क्षेत्रों और रेल नेटवर्क के माध्यम से और मजबूत किया जा सकता है।

निश्चित रूप से भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) को खाड़ी के वित्तीय नेटवर्क से जोड़कर आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को और प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि खाड़ी की टूटी हुई सुरक्षा व्यवस्था की दिशा को ईमानदारी से देखा जाए, तो रास्ता भारत की ओर जाता ही दिखता है।

(लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष हैं और पूर्व रक्षा सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - May 19, 2026 | 9:27 PM IST

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