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बंगाल चुनाव 2026: पश्चिम बंगाल में वादे तो बड़े, पर आर्थिक गुंजाइश कम

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वर्ष 2016 और 2021 के विधान सभा चुनावों में भी 82 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ ​था, फिर भी सत्ता बदलने के बजाय सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की ​स्थिति मजबूत ही हुई

Last Updated- April 27, 2026 | 10:52 PM IST
Mamta Banerjee

पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चुनाव राजनीति के साथ-साथ जनभागीदारी के लिए भी चर्चित रहे हैं। यहां मतदाताओं का वोट प्रतिशत हमेशा 80 प्रतिशत से ऊपर ही रहा है और इस तरह यह सबसे अ​धिक मतदान वाले राज्यों की कतार में खड़ा दिखता है। इसमें प्रत्येक चुनाव केवल पसंद के राजनीतिक दल को सत्ता सौंपने का नहीं, बल्कि जनसमूह को जुटाने की राजनीतिक दलों की परीक्षा बन जाता है। वर्ष 2011 के विधान सभा चुनाव में 84.3 प्रतिशत वोट पड़े थे और वह निर्णायक साबित हुआ, जिसमें ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चा के लगातार 34 वर्षों के शासन का अंत कर दिया। लेकिन ऐसा नहीं है कि उच्च मतदान से हर बार सत्ता परिवर्तन ही हुआ हो।

वर्ष 2016 और 2021 के विधान सभा चुनावों में भी 82 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ ​था, फिर भी सत्ता बदलने के बजाय सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की ​स्थिति मजबूत ही हुई और भाजपा से मिली कड़ी टक्कर के बावजूद उसने अपनी कुर्सी बरकरार रखी। प​श्चिम बंगाल में अत्य​धिक मतदान लोगों की चुनाव में अ​धिक भागीदारी को तो दर्शाता है, लेकिन यह सत्ता परिवर्तन की गारंटी नहीं देता।

पहले चरण में 23 अप्रैल को आधे से अधिक सीटों पर मतदान हो चुका है और बाकी पर दूसरे चरण में 29 अप्रैल को वोट पड़ेंगे। इस बार का चुनाव एक सामान्य राजनीतिक मुकाबले से बढ़कर राज्य में निर्णायक क्षण जैसा दिख रहा है। दोनों पक्ष एक ही आंकड़े को अपने-अपने नजरिए से पेश कर रहे हैं। अ​धिक मतदान में भाजपा सत्ता-विरोधी भावना देख रही है तो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस लोगों की एकजुटता। परिणाम क्या होगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है। चुनाव प्रचार दोनों दलों का लगभग एक जैसा है। आश्चर्यजनक रूप से दोनों प्रति​द्वंद्वियों के घोषणापत्रों में काफी समानताएं हैं।

तृणमूल कांग्रेस महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए 1,500 रुपये प्रति माह, भूमिहीन मजदूरों के लिए 4000 रुपये और धान खरीद के लिए 2,500 रुपये देने का वादा करती है। भाजपा इन आंकड़ों को महिलाओं और युवाओं के लिए 3,000 रुपये, किसानों के लिए 9,000 रुपये और चावल खरीदने के लिए 3,100 रुपये तक बढ़ा देती है। एक पक्ष मानक तय करता है, तो दूसरा उसे बढ़ाता है। एक पक्ष ‘विकसित बंगाल’ की बात करता है, जबकि दूसरा 40 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था बनाने का ख्वाब दिखाता है। श्रम सुरक्षा, मजदूरी वृद्धि और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता पर दोनों के घोषणा पत्रों में एक ही रुख दिखता है।

पश्चिम बंगाल के वित्तीय संकेतकों में तो स्थिरता है, लेकिन इसमें गुंजाइश बहुत अ​धिक नहीं दिखती। मौटे तौर पर राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 3 और 4 प्रतिशत के बीच बना हुआ है, जो वित्त वर्ष 24 में लगभग 4 प्रतिशत तक बढ़ गया था और फिर कम हुआ। महामारी के दौरान जो राजस्व घाटा बढ़ा था, वह आज भी कम नहीं हुआ है। कर्ज भी जीएसडीपी के 38 से 40 प्रतिशत के स्तर पर है। ये आंकड़े बहुत अ​धिक संकट की ​स्थिति तो नहीं दर्शाते, लेकिन विस्तार की गुंजाइश भी नहीं छोड़ते। बजट की संरचना इसे और कस देती है।

आ​र्थिक तस्वीर मजबूत नहीं

राज्य में बेरोजगारी अपेक्षाकृत कम है और यह राष्ट्रीय औसत से नीचे बनी हुई है, लेकिन अधिकांश अन्य संकेतक पिछड़ रहे हैं। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि हाल के वर्षों में महामारी से पहले 13 से घटकर लगभग 9 प्रतिशत हो गई है। लगभग 1.63 लाख रुपये के साथ पश्चिम बंगाल 23 राज्यों में 16वें स्थान पर है, जो राष्ट्रीय औसत 2.05 लाख रुपये से काफी नीचे है। दिल्ली और तेलंगाना से तो काफी पीछे है।

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First Published - April 27, 2026 | 10:26 PM IST

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