तमिलनाडु की राजनीति में रविवार का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। जब 51 वर्षीय सी. जोसेफ विजय ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री (मुधलवर) के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक शपथ ग्रहण समारोह नहीं था, बल्कि एक नए युग का आगाज था। जो विजय कभी सिल्वर स्क्रीन पर विरोधियों को धूल चटाते थे, उन्होंने हकीकत के चुनावी दंगल में सूबे की सबसे बड़ी द्रविड़ पार्टी DMK और एम.के. स्टालिन जैसे दिग्गज नेता को शिकस्त देकर सत्ता की कमान अपने हाथ में ले ली है।
जब विजय ने अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) लॉन्च की थी और दावा किया था कि 2026 का चुनाव सीधे तौर पर उनकी पार्टी और सत्ताधारी DMK के बीच होगा, तब कई राजनीतिक पंडितों ने इसे हल्के में लिया था। लेकिन आज नतीजों ने साबित कर दिया है कि विजय का विजन और उनकी रणनीति पारंपरिक राजनीति से कोसों आगे थी।
विजय की इस जीत ने चुनावी कैंपेन के पुराने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया। जहां दूसरी पार्टियां हर निर्वाचन क्षेत्र में रैलियां कर रही थीं, वहीं विजय ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने पारंपरिक अर्थों में न तो हर सीट का दौरा किया और न ही बड़ी-बड़ी रैलियों को संबोधित किया। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार भी नहीं उतारे थे।
विजय ने मीडिया से दूरी बनाए रखी, न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की और न ही इंटरव्यू दिए। उन्होंने ‘सीधा संवाद’ का रास्ता चुना और सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उनके संदेश उनके प्रशंसकों और फॉलोअर्स द्वारा ‘वर्ड ऑफ माउथ’ के जरिए घर-घर पहुंचाए गए। विजय ने एक बहुत ही अनूठी रणनीति अपनाई, उन्होंने किशोरों और बच्चों को अपना लक्ष्य बनाया, ताकि वे अपने माता-पिता को TVK को वोट देने के लिए प्रेरित कर सकें।
विजय की राजनीतिक सफलता के पीछे उनकी पार्टी की विचारधारा का भी बड़ा हाथ रहा। उन्होंने बहुत ही चतुराई से द्रविड़ विचारधारा और तमिल राष्ट्रवाद को एक साथ पिरोया। उनकी यह ‘हाइब्रिड’ विचारधारा राज्य के युवाओं और उन लोगों को काफी पसंद आई जो पुराने राजनीतिक ढर्रे से ऊब चुके थे।
अगर हम 25-30 साल पीछे मुड़कर देखें, तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह शर्मीला और मृदुभाषी लड़का, जिसे ‘पूवे उनक्कागा’ जैसी फिल्मों में देखा गया था, एक दिन राज्य का मुख्यमंत्री बनेगा। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पुरानी फोटो वायरल हुई थी, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि बैठे हैं और उनके पीछे छोटा सा विजय खड़ा है। आज लोग हैरान हैं कि क्या उस वक्त करुणानिधि ने कभी सोचा होगा कि उनके पीछे खड़ा यह बच्चा एक दिन उनके बेटे स्टालिन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और विजेता बनेगा।
विजय के फिल्मी करियर की शुरुआत भले ही धीमी रही हो, लेकिन उनकी ब्रांडिंग बहुत पहले ही शुरू हो गई थी। 1994 में उनकी तीसरी फिल्म ‘रसिगन’ के दौरान ही उनके परिवार ने उन्हें “इलाया थलपति” (युवा कमांडर) के रूप में पेश किया था। जैसे-जैसे उनकी फिल्में, जो पारिवारिक भावनाओं, कॉमेडी और एक्शन का मिश्रण होती थीं, हिट होने लगीं, वह निर्विवाद “थलपति” बन गए।
लेकिन विजय केवल एक अभिनेता नहीं बने रहना चाहते थे। उन्होंने बहुत पहले ही राजनीति की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था। 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में जब उनके संगठन ‘विजय मक्कल इयक्कम’ (VMI) के पदाधिकारियों ने उनकी तस्वीर का इस्तेमाल कर जीत हासिल की, तभी यह साफ हो गया था कि तमिलनाडु की जनता उन्हें राजनीति में देखने के लिए तैयार है। आज वही ‘थलपति’ अब ‘मुधलवर’ (मुख्यमंत्री) और ‘थलाइवा’ (नेता) के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
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विजय की फिल्मों ने समय-समय पर उनके राजनीतिक झुकाव को दर्शाया है। 2013 में जब उनकी फिल्म ‘थलाइवा’ का टैगलाइन “बॉर्न टू लीड” (Born to Lead) आया, तो पहली बार उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा खुलकर सामने आई। हालांकि उस समय की AIADMK सरकार के दबाव में इस टैगलाइन को हटाना पड़ा और फिल्म भी देरी से रिलीज हुई।
इसके बाद 2014 की ‘कत्थी’ में किसानों के मुद्दे उठाने हों, या 2017 की ‘मेर्सल ‘ में GST पर कटाक्ष, विजय की फिल्में सामाजिक और राजनीतिक संदेशों से भर गईं। ‘मेर्सल’ के समय तो उनके ईसाई धर्म को लेकर भी विवाद पैदा करने की कोशिश की गई, लेकिन इससे विजय का कद और बढ़ा ही। 2018 में थूथुकुडी पुलिस फायरिंग के पीड़ितों से मिलना और उन्हें आर्थिक मदद देना, उनके ‘रियल लाइफ हीरो’ वाली छवि को मजबूत कर गया।
विजय ने जनता से जुड़ने के लिए दिवंगत नेताओं जयललिता और करुणानिधि की तरह अपनी एक अलग पहचान बनाई। जयललिता की तरह वह कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे, तो सीधे दिल पर चोट करते थे। उनका सिग्नेचर संबोधन “एन नेनजिल कुदियिरुक्कुम… ननबा, ननबी” (मेरे दिल में बसने वाले दोस्तों) उनके समर्थकों के साथ एक अटूट बंधन बना चुका था।
सार्वजनिक मंचों पर उनके द्वारा दिए गए छोटे-छोटे टिप्स जैसे “उसुप्पेथुरवंकिट्टा उम्मन्नुम” (विरोधियों को खामोशी से नजरअंदाज करो और आगे बढ़ो) युवाओं के बीच मंत्र बन गए। फिल्मों के डायलॉग जैसे ‘आई एम वेटिंग’ (I am waiting) को उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा के लिए हकीकत में बदल दिया।
1984 में एक बाल कलाकार के रूप में ‘वेत्री’ फिल्म से शुरू हुआ सफर, आज तमिलनाडु की सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गया है।