पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, प्रवासी भारतीय मतदाताओं की चिंताएं और एलपीजी किल्लत जैसे प्रमुख कारक प. बंगाल, तमिलनाडु, केरलम, असम और पुदुच्चेरी में होने वाले विधान सभा चुनावों के लिए राजनीतिक दलों के एजेंडे को आकार दे रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एमके स्टालिन जैसे दिग्गज और कांग्रेस के नेता एलपीजी किल्लत को केंद्र की विदेश नीति की विफलता करार दे रहे हैं। वे केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए इसे कतार वाली अर्थव्यवस्था कह कर तंज कस रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित कई राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के दौरान पेट्रोलियम की कम खपत के लिए लोगों को जागरूक करने का अभियान चला रहे हैं। इसके तहत कार्यकर्ताओं को इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करने और लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाने को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
केरलम में बिज़नेस स्टैंडर्ड ने जब किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता एस. जयसूर्यन से संपर्क किया तो वह कोट्टयम जिले के पाला निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव प्रचार अभियान का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विरोधियों द्वारा यह गलत धारणा फैलाई जा रही है कि राज्य भारी एलपीजी किल्लत से जूझ रहा है। मगर पश्चिम एशिया संकट और ऊर्जा क्षेत्र पर उसके प्रभाव को देखते हुए उनकी पार्टी ईंधन कम खर्च करने के उपायों पर जोर दे रही है।
जयसूर्यन ने कहा, ‘आम तौर पर चुनाव प्रचार के दौरान हम होटलों में खाना खाते हैं जहां काफी एलपीजी का उपयोग किया जाता है। मगर अब हम अपनी पूरी टीम के लिए घर से भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं ताकि खाना पकाने के लिए लकड़ी के चूल्हे और बिजली का इस्तेमाल किया जा सके। हमने कारों की संख्या भी कम कर दी है और कम ईंधन खपत वाली बाइकों का इस्तेमाल बढ़ा दिया है। इसके अलावा हमने अपनी टीम के सदस्यों से कहा है कि अधिक से अधिक इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग किया जाए।’
मितव्ययिता के ये उपाय केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं हैं। पास के पुतुपल्ली निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार उम्मेन चांडी के पुत्र चांडी उम्मेन ईंधन की मौजूदा चिंताओं को देखते हुए एक कदम आगे बढ़ रहे हैं। वह हाइब्रिड साइकिल चलाकर अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं। वह अपने प्रचार अभियान में बड़ी तादाद में वाहनों का इस्तेमाल करने से भी बच रहे हैं।
कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावी खर्च पर सीमा पर सख्ती बरतने के कारण भी कम ईंधन खर्च करने उपायों पर जोर दिया जा रहा है। आयोग ने प्रचार
अभियान के दौरान मांसाहारी भोजन पर खर्च को 350 रुपये और शाकाहारी भोजन पर खर्च को 110 रुपये तक सीमित कर दिया है। इसके अलावा चुनाव प्रचार संबंधी लॉजिस्टिक्स पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं। भले ही मितव्ययिता एक कारक है मगर एलपीजी संकट कई राज्यों में वोटों को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक बन सकता है।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर (मतदाता सूची में संशोधन) और सूची से नाम हटाए जाने पर विवाद के बीच एलपीजी संकट एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभर रहा है।
राज्य में निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की तारीखों की घोषणा किए जाने के एक दिन बाद यानी 16 मार्च को मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने कोलकाता में कॉलेज स्क्वायर से सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट के डोरिना क्रॉसिंग तक एक विरोध मार्च का नेतृत्व किया। एलपीजी सिलिंडरों के चित्र और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि वाले पोस्टरों को पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की कथित विफलता के तौर पर प्रदर्शित किया गया।
एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि यह कोई अचरज की बात नहीं है कि एलपीजी संकट चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया है। दरअसल एलपीजी किल्लत ने शहरी मध्यवर्गीय परिवारों के अलावा रेहड़ी पटरी पर खानेपीने के सामान बेचने वालों पर काफी दबाव डाल दिया है। यहां तक कि कोलकाता के कारोबारी हलकों में भी इस संकट की काफी चर्चा है।
बनर्जी बार-बार इसी मुद्दे को उठा रही हैं जिससे माहौल काफी गर्म हो गया है। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है। बनर्जी ने गुरुवार को पश्चिम बर्धमान में एक प्रचार अभियान के दौरान केंद्र पर आरोप लगाते हुए कहा कि लोगों को खाना पकाने और परिवहन के आदिम तरीकों की ओर धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले एक घरेलू एलपीजी सिलिंडर की कीमत 400 रुपये थी जो अब बढ़कर करीब 1,100 रुपये हो चुकी है।
तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने शुक्रवार को एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती दी कि वे घोषणा करें कि बंगाल चुनावों के बाद एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि नहीं की जाएगी। पार्टी केंद्र पर 2016 के नोटबंदी से लेकर 2020 में ऑक्सीजन संकट, एसआईआर और 2026 में एलपीजी संकट तक ‘कतार अर्थव्यवस्था’ लाने का आरोप लगाते हुए व्यंग्य भी कर रही है। कुछ सप्ताह पहले एक्स पर जारी एक पोस्ट में तृणमूल कांग्रेस ने लिखा, ‘कतार वाली अर्थव्यवस्था में आपका स्वागत है। 2016 से 2026: @नरेंद्र मोदी के न्यू इंडिया में कतार में खड़े होने का एक दशक।’
केवल टीएमसी ही नहीं बल्कि वाम मोर्चा भी इस मुद्दे को उठा रहा है। इस महीने की शुरुआत में एक विरोध रैली के दौरान एलपीजी किल्लत के साथ-साथ पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल की आक्रामकता को भी उठाया गया था।
तमिलनाडु की बात करें तो द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) और उसके सहयोगी दलों ने भी पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया जहां केंद्र पर निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने में विफलता का आरोप लगाया गया।
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा, ‘भाजपा सरकार के गलत फैसले के कारण विदेश नीति में भी एक ‘विफल मॉडल’ बन गया है। नतीजतन एलपीजी सिलिंडर की गंभीर किल्लत हो गई है। सरकार की दूरदर्शिता में कमी और एहतियाती उपाय न किए जाने के कारण लोगों को परेशान होना पड़ रहा है।’
दक्षिण भारतीय राज्यों में एलपीजी संकट के कारण प्रवासी मजदूरों को अपने गृह राज्यों की ओर पलायन करना पड़ा है। असम में भी असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने एलपीजी किल्लत और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को स्थिर रखने में सरकार की अक्षमता को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। पार्टी ने पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन का आयोजन करते हुए इसे परिवारों पर डाला गया अनुचित आर्थिक बोझ बताया है।
पश्चिम एशिया संकट के बारे में चिंताएं केवल एलपीजी और ऊर्जा की उपलब्धता तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि इसका दायरा एनआरआई (अनिवासी भारतीय) मतदाताओं और चुनाव के दौरान अपने गृह राज्य आने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं के एक बड़े मतदाता वर्ग तक फैल गया है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पश्चिम एशिया में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के संयोजक मंसूर पल्लूर से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि अधिकतर एनआरआई मतदाता इस बार मतदान नहीं कर पाएंगे।
पुद्दुच्चेरी के माहे के निवासी पल्लूर ने कहा कि आम तौर पर सऊदी अरब की राजधानी दम्मम से केरलम के कन्नूर तक की उड़ान का किराया करीब 24,000 रुपये होता था जो अब बढ़कर 1 लाख रुपये से अधिक हो चुका है। उन्होंने कहा, ‘आम तौर पर चुनाव के दौरान पश्चिम एशिया से 2-3 लाख लोग केरलम में आते रहे हैं। मगर इस बार ऐसा नहीं होगा और इसका उन निर्वाचन क्षेत्रों पर काफी प्रभाव पड़ेगा जहां कांटे का मुकाबला है।’ उनके निर्वाचन क्षेत्र माहे में पिछले चुनाव के दौरान जीत का अंतर कुछ सौ वोटों का ही था।
बहरहाल रसोई गैस संकट के कारण मितव्ययिता हो या राजनीतिक दोषारोपण अथवा हवाई किराये में वृद्धि, इतना तो तय है कि भारत में विधान सभा चुनावों पर भी पश्चिम एशिया संघर्ष की छाप पड़ने लगी है।