पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। विधानसभा चुनाव के नतीजों में बीजेपी को 207 सीटों के साथ भारी बहुमत मिलने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हार स्वीकार कर इस्तीफा दे देंगी। लेकिन मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि वह किसी भी कीमत पर इस्तीफा नहीं देंगी। उन्होंने चुनाव परिणामों को जनता का जनादेश मानने से इनकार करते हुए इसे एक बड़ी ‘साजिश’ करार दिया है। ममता ने दो टूक शब्दों में कहा कि वह हार नहीं गई हैं, बल्कि उन्हें जबरन और धोखाधड़ी से हराया गया है।
ममता बनर्जी का कहना है कि उनकी पार्टी टीएमसी की यह लड़ाई बीजेपी के साथ नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के साथ थी। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में काम किया। ममता बनर्जी ने कहा, “मेरे इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। हम जनता के वोट से नहीं, बल्कि एक साजिश की वजह से हारे हैं। मैं हार नहीं मानी है और मैं राजभवन (लोक भवन) नहीं जाऊंगी।”
ममता बनर्जी ने चुनाव और गिनती की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि करीब 100 सीटों पर मिले जनादेश को ‘लूट’ लिया गया। ममता बनर्जी के मुताबिक, मतगणना के दौरान जानबूझकर गिनती की रफ्तार धीमी की गई ताकि टीएमसी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा जा सके। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक ‘काला अध्याय’ बताया।
इतना ही नहीं, ममता ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचला है। वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का मुद्दा उठाते हुए ममता ने कहा कि 90 लाख नाम काट दिए गए थे, जिनमें से अदालत के हस्तक्षेप के बाद 32 लाख बहाल हुए। उनका दावा है कि इसके बाद भी रहस्यमयी तरीके से 7 लाख नए नाम जोड़ दिए गए, जिसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ममता बनर्जी बेहद भावुक और आक्रामक नजर आईं। उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना केंद्र पर उनके साथ शारीरिक बदसलूकी की गई। उन्होंने कहा, “उन लोगों ने मुझे ठीक से चलने भी नहीं दिया। मुझे मारा गया और धक्का देकर मतगणना केंद्र से बाहर निकाल दिया गया। एक महिला होने के नाते मैं महसूस कर सकती हूं कि उन्होंने मेरे साथ कैसा व्यवहार किया।”
उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर बंगाल में आतंक फैलाने का आरोप लगाया। ममता ने दावा किया कि बीजेपी के गुंडों ने टीएमसी कार्यकर्ताओं और एससी/एसटी परिवारों को निशाना बनाया है। उन्होंने यहां तक आरोप लगाया कि महिलाओं को डराया-धमकाया जा रहा है। ममता ने सवाल उठाया कि क्या ये केंद्रीय बल ‘जवान वाहिनी’ हैं या ‘गुंडा वाहिनी’? उन्होंने कहा कि पुलिस पूरी तरह निष्क्रिय रही और उनकी आंखों के सामने अत्याचार होते रहे।
भले ही आंकड़ों में बीजेपी ने 15 साल पुराने टीएमसी के शासन को खत्म कर दिया हो, लेकिन ममता बनर्जी का कहना है कि यह उनकी ‘नैतिक जीत’ है। उन्होंने ऐलान किया है कि वह अब राजभवन की जगह सड़कों पर रहकर जनता के लिए संघर्ष करेंगी। ममता ने कहा, “मुझे सत्ता की कुर्सी की परवाह नहीं है, मुझे लोगों की परवाह है। अब मैं एक आजाद पक्षी हूं और अपनी पूरी ताकत विपक्षी एकता को मजबूत करने में लगाऊंगी।”
ममता बनर्जी ने बताया कि हार के बाद सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव समेत ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के कई बड़े नेताओं ने उन्हें फोन कर एकजुटता दिखाई है। उन्होंने बताया कि अखिलेश यादव जल्द ही उनसे मिलने बंगाल आ रहे हैं। राज्य में कथित तौर पर हो रही हिंसा की जांच के लिए ममता ने एक 10 सदस्यीय ‘फैक्ट-फाइंडिंग’ कमेटी बनाने का भी ऐलान किया है, जो प्रभावित इलाकों का दौरा करेगी।
ममता बनर्जी के इस्तीफे न देने के फैसले ने कानूनी जानकारों को भी हैरान कर दिया है। वरिष्ठ वकील शेखर नाफड़े ने न्यूज वेबसाइट इंडिया टूडे से कहा कि ममता का यह अड़ियल रुख संविधान के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चूंकि बंगाल सरकार का कार्यकाल 6 मई को खत्म हो रहा है और चुनाव आयोग ने नतीजों का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, इसलिए मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना ही होगा।
नाफड़े के अनुसार, यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं, तो राज्यपाल के पास सरकार को बर्खास्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। कानूनन, चुनाव के नतीजों को केवल अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन जब तक कोई अदालत इन नतीजों पर रोक नहीं लगाती, तब तक घोषित परिणाम ही मान्य होंगे। ऐसे में ममता बनर्जी का राजभवन न जाने का फैसला राज्य को एक बड़े संवैधानिक संकट की ओर धकेल सकता है।