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Kerala Elections: केरल चुनाव में माकपा-कांग्रेस के लिए ‘आर या पार’ की जंग, भाजपा की भी अग्निपरीक्षा

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माकपा के लिए देश में अपने अंतिम गढ़ को बचाने के लिए जीत बेहद जरूरी है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सत्ता से बेदखल होने के बावजूद केरल में माकपा की प्रासंगिकता बनी हुई है।

Last Updated- April 09, 2026 | 9:08 AM IST
CPI

Kerala Elections 2026: केरल में 9 अप्रैल को होने वाले विधान सभा चुनाव सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लिए ‘आर या पार’ जैसी स्थिति है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए यह एक तरह की कसौटी है कि क्या पार्टी पिछले लोक सभा और हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों से मिली जीत को आगे बढ़ा सकती है और विधान सभा में अपना खाता फिर से खोलकर केरल की राजनीति में तीसरे ध्रुव के रूप में उभर सकती है।

माकपा के लिए देश में अपने अंतिम गढ़ को बचाने के लिए जीत बेहद जरूरी है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सत्ता से बेदखल होने के बावजूद केरल में माकपा की प्रासंगिकता बनी हुई है। उसके नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) ने पिछले चार विधान सभा चुनावों में से तीन में जीत हासिल की है। यहां तक कि 2011 में, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) से उसे हार मिली थी, तब भी हार का अंतर बहुत कम था। हालांकि, राज्य की जनता लोक सभा चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करना पसंद करती है। स्थानीय निकाय चुनावों में हालिया हार के बावजूद पार्टी सत्ता में वापसी को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है।

माकपा के महासचिव एमए बेबी ने कहा, ‘हमें पूरा भरोसा है। अगर हम अपने अच्छे कामों का संदेश हर घर और हर मतदाता तक पहुंचा सकें, तो हमें पूरा विश्वास है कि हम तीसरी बार सत्ता में आएंगे। पिछले दस वर्षों में घोर गरीबी का उन्मूलन एक बड़ी उपलब्धि रही है। बुनियादी ढांचे के विकास में हम पहले पिछड़े हुए थे, और उसमें भी हमने उल्लेखनीय प्रगति की है। पिछले दस वर्षों में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है। केरल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां सांप्रदायिक तनाव नहीं है, और विभिन्न धर्मों के लोग पूर्ण सद्भाव से रहते हैं। इसमें भी एलडीएफ प्रशासन ने अहम भूमिका निभाई है।’ हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में मिली करारी हार के बारे में पूछे जाने पर, बेबी ने कार्यकर्ताओं के बीच व्याप्त आत्मसंतुष्टि की भावना को इसका कारण बताया।

बेबी ने कहा, ‘हमारी पार्टी के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाया गया था, और भाजपा और यूडीएफ के बीच एक रणनीतिक समझौता था। उन्होंने तिरुवनंतपुरम और कोल्लम नगर निगमों में जीत हासिल करने और अन्य स्थानीय निकायों में बढ़त बनाने में एक-दूसरे की मदद की। हम भी अतिआत्मविश्वास में थे। कार्यकर्ताओं का मानना था कि चुनाव से पहले राज्य सरकार द्वारा घोषित नए कल्याणकारी उपायों और हमारे मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क के बल पर हम आसानी से जीत जाएंगे। अब हम सतर्क हो गए हैं और हमने अपने पार्टी सहयोगियों को चेतावनी दी है कि अतिआत्मविश्वास घातक साबित होगा।’
लेकिन कुछ विश्लेषक पंचायत चुनावों में मिली हार को सत्ता विरोधी लहर का संकेत मानते हैं।

तिरुवनंतपुरम स्थित वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन ने कहा, ‘पंचायत चुनाव के परिणाम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थे क्योंकि वामपंथी दल पारंपरिक रूप से स्थानीय निकाय चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करते रहे हैं और अतीत में उन्हें शायद ही कभी हार का सामना करना पड़ा है। हालांकि, इस बार उनके खराब प्रदर्शन से संकेत मिलता है कि सत्ता विरोधी लहर काफी प्रबल हो गई थी।’
केरल में परंपरागत रूप से वामपंथी और कांग्रेस के नेतृत्व वाले या समर्थित गठबंधन बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं।

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First Published - April 9, 2026 | 9:07 AM IST

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