पिछले दो दशक में भारतीय कंपनियों द्वारा किए गए बड़े अधिग्रहण से शेयरधारकों को कोई खास लाभ नहीं हुआ है। 10 में से 8 मौकों पर महत्त्वपूर्ण संपत्तियों को खरीदने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने वाली कंपनियों के शेयरों की चाल अधिग्रहण के बाद व्यापक बाजार से काफी सुस्त पड़ गई है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड के नमूने में शामिल 10 सबसे बड़े अधिग्रहणकर्ता फर्मों में से केवल दो हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और भारती एयरटेल ही बाजार से बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहीं। हालांकि इन दोनों के मामले में भी यह संदेह है कि शेयरों में हालिया उछाल घरेलू कारकों के कारण है या विदेशी अधिग्रहण से हुए लाभ के कारण।
उदाहरण के लिए भारत के प्रमुख एल्युमीनियम और तांबा उत्पादकों में से एक हिंडाल्को ने फरवरी 2007 में 5.7 अरब डॉलर में नोवेलिस का अधिग्रहण किया था और इसके करीब 17 साल बीतने के बाद भी कंपनी का शेयर भाव दो साल पहले ही निफ्टी 50 के प्रदर्शन से आगे निकलने लगा है। हालांकि इसके मजबूत प्रदर्शन का श्रेय नोवेलिस की उच्च आय के बजाय औद्योगिक धातुओं की कीमतों में वैश्विक उछाल को दिया जा सकता है।
भारती एयरटेल की बात करें तो पिछले दो वर्षों में उसका मजबूत वित्तीय प्रदर्शन और उसके परिणामस्वरूप शेयरों में तेजी का श्रेय मार्च 2010 में जेन टेलीकॉम के अफ्रीकी कारोबार के 10.7 अरब डॉलर में अधिग्रहण के बजाय घरेलू दूरसंचार बाजार में दो कंपनियों के बढ़ते वर्चस्व को दिया जा सकता है।
अपने हालिया बेहतर प्रदर्शन के बाद हिंडाल्को इंडस्ट्रीज का शेयर मूल्य नोवेलिस के अधिग्रहण के बाद से 583 फीसदी बढ़ा है जबकि इस अवधि में बेंचमार्क निफ्टी 50 में 474 फीसदी की वृद्धि हुई है।
दूसरी ओर, भारती एयरटेल के शेयर मूल्य में जेन टेलीकॉम के अफ्रीकी कारोबार के अधिग्रहण के बाद से 573 फीसदी की वृद्धि हुई है जबकि इस अवधि में निफ्टी 50 में 359 फीसदी की तेजी आई है।
टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, ओएनजीसी, यूपीएल, रिलायंस इंडस्ट्रीज, बायोकॉन, कोफोर्ज और अदाणी ग्रीन अधिग्रहण पर अरबों डॉलर खर्च करने के बाद बेंचमार्क सूचकांकों से बेहतर प्रदर्शन करने में विफल रहे हैं।
टाटा स्टील ने 2006 में 12.78 अरब डॉलर में कोरस समूह का अधिग्रहण किया था, जो किसी भारतीय कंपनी विदेश में किया गया सबसे बड़ा अधिग्रहण था। लेकिन इस अधिग्रहण के 20 साल बाद भी कंपनी के शेयर का प्रदर्शन कमजोर रहा है। अधिग्रहण के बाद से स्टील विनिर्माता का शेयर मूल्य 397 फीसदी बढ़ा है जबकि इस अवधि में निफ्टी 50 में 551 फीसदी की वृद्धि हुई है।
पूर्ववर्ती टाटा मोटर्स (अब दो कंपनियों में विभाजित) ने मार्च 2008 में फोर्ड मोटर कंपनी से जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) का 2.3 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था। लेकिन मार्च 2008 से अक्टूबर 2025 के बीच कंपनी व्यापक बाजार को पीछे छोड़ने के लिए जूझती दिखी।
ओएनजीसी ने भी अगस्त 2008 में इम्पीरियल एनर्जी कॉर्प पीएलसी का 2.6 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था। कंपनी का शेयर मूल्य तब से केवल 78 फीसदी बढ़ा है जबकि निफ्टी 50 में इस अवधि में 458 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
हाल के वर्षों में भी अधिग्रहण से शेयरधारकों को उतना लाभ नहीं मिला है। उदाहरण के लिए कृषि रसायन बनाने वाली कंपनी यूपीएल ने जुलाई 2018 में एरिस्टा लाइफसाइंसेज का 4.2 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था लेकिन उसके बाद से कंपनी के शेयर का प्रदर्शन कमजोर बना हुआ है।
बायोकॉन द्वारा 2022 में वियाट्रिस के बायोसिमिलर व्यवसाय को खरीदने के बाद और रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा नवंबर 2023 में 8.5 अरब डॉलर में वॉल्ट डिज्नी के इंडिया कारोबार के अधिग्रहण के बाद भी यही कहानी है।
अदाणी ग्रीन एनर्जी और कोफोर्ज के शेयर की कीमत भी अपने बड़े अधिग्रहण के बाद निफ्टी 50 से पीछे रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे अधिग्रहण से होने वाले खराब रिटर्न का कारण उस पर खर्च की गई अग्रिम पूंजी और अधिग्रहीत संपत्तियों द्वारा उत्पन्न वित्तीय रिटर्न के बीच दिखता बेमेल है।
इक्विनॉमिक्स रिसर्च के संस्थापक और सीईओ जी चोकालिंगम ने कहा, ‘इनमें से अधिकांश कंपनियां शार्क बनने के लिए बड़ी मछलियों को निगलने की कोशिश करने वाली छोटी मछलियों की तरह हैं। इसके लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, जिसका बड़ा हिस्सा ऋण से आता है। लेकिन जब मांग में कमी आती है या रुपये में नरमी आती है तो यह वित्तीय बाधाएं पैदा करता है जिससे कंपनी का प्रदर्शन भी प्रभावित होता है।’
यह अधिग्रहण की लागत और अधिग्रहण से पहले अधिग्रहणकर्ता की शुद्ध संपत्ति के बीच अंतर में दिखाई देता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी को छोड़कर, अन्य सभी कंपनियों के लिए अधिग्रहण की लागत उनकी शुद्ध हैसियत के कई गुना अधिक थी। कंपनियों ने बड़े उधार के माध्यम से अधिग्रहण के लिए धन जुटाए मगर वित्तीय मंदी के दौरान यह उनके लिए आर्थिक बोझ बन गया।
संपत्तियों की अधिग्रहण लागत अधिग्रहणकर्ता की शुद्ध संपत्ति से औसतन लगभग चार गुना थी, जिससे इन कंपनियों पर कर्ज का बोझ काफी बढ़ गया। इससे कंपनियों के नेटवर्थ पर रिटर्न में तेज गिरावट आई। वास्तव में, इन कंपनियों में से अधिकांश का नेटवर्थ पर रिटर्न अधिग्रहण से पहले की तुलना में अब भी कम है। नेटवर्थ पर कम रिटर्न होने से लंबे समय में कंपनियों की विकास क्षमता प्रभावित होती है और उनके इक्विटी मूल्यांकन और शेयर मूल्य प्रदर्शन पर दबाव पड़ता है।